अमलेन्दु उपाधयाय
गाजियाबाद के पीएफ धोटाले के मुख्य अभियुक्त आशुतोष अस्थाना की मौत पर दो पंक्तियों में सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है-'अंधोरों ने हमारे अंजुमन की आबरू रख ली/ न जाने कितने चेहरे रोशनी में आ गए होते।' दीपावली वाले दिन अस्थाना की गाजियाबाद की जिला जेल में रहस्यमय मौत हो गई थी। इससे पहले भी गाजियाबाद की जिला जेल में कई अन्य हाई प्रोफाइल केस के अभियुक्तों की रहस्यमय मौतें हो चुकी हैं। लेकिन आशुतोष अस्थाना की मौत समूची न्यायिक प्रणाली की विष्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगा रही है।
आशुतोष अस्थाना पीएफ घोटाले का मुख्य अभियुक्त था और अपने इकबालिया बयान में वह छत्ताीस न्यायाधीशों के नाम उगल चुका था कि इन न्यायाधीशों के सहयोग और आदेष से उसने इस घोटाले को अंजाम दिया था। बताया तो यह भी जा रहा है कि अस्थाना अदालत में कोई और इकबालिया बयान देने जा रहा था और सीबीआई भी फाइनल चार्जषीट लगाने जा रही थी लेकिन वह समय आता उससे पहले ही अस्थाना सीने में बहुत से राज छिपाए हुए इस दुनिया से रूखसत हो गया।
समाचार पत्रों में यह खबर प्रमुखता से प्रकाशित हुई है कि अस्थाना के परिवारवालों ने कहा है कि उन्होंने पुलिस को कम से कम दो बार ये सूचना दी थी कि अस्थाना को जान का खतरा है। परिवार वालों ने इस मामले की सीबीआई जांच करवाने की मांग भी की है। हालांकि गाजियाबाद के पुलिस अधाीक्षक का बयान भी सभी समाचार पत्रों में प्रमुखता से प्रकाषित हुआ है जिसमें उन्होंने इस बात से इंकार किया है कि अस्थाना ने अपनी जान को खतरा बताया था। यहां सवाल यह है कि अगर अस्थाना ने पुलिस से सुरक्षा की गुहार नहीं भी की थी तो क्या यह पुलिस का काम नहीं था कि इतने महत्वपूर्ण हाई प्रोफाइल केस के मुख्य अभियुक्त की सुरक्षा के इंतजामात किए जाते? आईजी जेल सुलखान सिंह ने एक निजी टीवी चैनल के सामने स्वीकार भी किया है कि पहले भी कोर्ट में पेशी के दौरान अस्थाना के साथ मारपीट की गई थी।
बताया जा रहा है कि आशुतोष अस्थाना से एक दिन पहले ही सीबीआई ने कई घंटे तक पूछताछ की थी और इसके एक दिन बाद उसकी मौत होना सवाल खड़े करती है। क्या इस पूछताछ में भी कुछ रहस्य छिपा हुआ है? यह भी कहा जा रहा है कि पिछले कई रोज से सीबीआई अधिकारी जेल में उससे पूछताछ कर रहे थे और अस्थाना अदालत में अपने बयान देने वाला था जिसमें कई बड़े नाम लपेटे में आने वाले थे। इससे पहले भी अपने बयान में वह तीन न्यायाधाीषों को लपेट चुका था। बताया जाता है कि अनुच्छेद 164 के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष दिए बयान में अस्थाना ने खुलासा किया था कि उसे पुलिस से छिपने में तीन न्यायाधीशों ने मदद की थी। अस्थाना को हाईकोर्ट के तीन न्यायधीशों ने भरोसा दिया था कि जांच पूरी होने के बाद वे मामले को देख लेगें। तीनों न्यायधीशों का नाम घोटाले से लाभ कमाने वालों की सूची में भी बताया जाता है।
यह केस कितना गम्भीर था इसी बात से समझा जा सकता है कि जाँच करने में सीबीआई के भी पसीने छूट गए। समझा जा सकता है कि जाँच टीम भी किस मानसिक दबाव से गुजर रही होगी कि उसे सर्वोच्च न्यायालयसे अपील करनी पड़ी कि घोटाले से संबंधित मामले की जांच दिल्ली में कराई जाए ताकि जांच एजेंसी को अपने मुख्यालय से जांच कराना सुविधाजनक हो। इतना ही नहीं उत्तार प्रदेष सरकार भी इस केस की सीबीआई जांच कराने से कन्नी काटती रही लेकिन जब गाजियाबाद बार एसोसिएशन के पूर्व अधयक्ष नाहर सिंह यादव ने मोर्चा खोला और अधिवक्ता एकजुट हुए तब सीबीआई जाँच बैठाई गई। स्वयं सर्वोच्च न्यायालयकी तीन बेंच में यह मुकदमा स्थानान्तरित हुआ और सुनवाई करने वाले विद्वान न्यायाधीशों पर पक्षपात करने के आरोप भी लगे।
अस्थाना का फ्रॉड का केस भी बहुत नाटकीय अंदाज में खुला। यह आम चर्चा है कि अस्थाना का गाजियाबाद की जिला कोर्ट में इतना रुतबा था कि सीजेएम और एडीजे स्तर के अधिाकारी भी उससे अनुमति लेकर उसके कमरे में दाखिल होते थे। और तुतीय व चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी तो उसके कमरे में जूते बाहर उतारकर दाखिल होते थे। गाजियाबाद में किस जिला न्यायाधीश की नियुक्ति हो रही है यह अस्थाना को पहले से मालूम रहता था। जाहिर है एक क्लर्क का यह रूतबा बिना ऊपर के आशीर्वाद के नहीं बना होगा। उसका यह घोटाला पकड़ा भी नहीं जाता अगर वह एक ईमानदार महिला न्यायाधीश से न उलझा होता। चर्चा है कि अस्थाना सीबीआई की स्पेशल न्यायाधीश रमा जैन, जो उस समय नजारत की इंचार्ज भी थी से एक फर्जी बिल पास कराने पहुँचा। बतातें हैं कि रमा जैन ने वह बिल पास करने से मना कर दिया। इस पर अस्थाना ने उन्हें घुड़़की दी कि यह बिल तो पास होंगे ही लेकिन इंचार्ज बदल जाएगा और अगले दिन ही रमा जैन से वह चार्ज छिन गया। इस पर महिला न्यायाधीश ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से शिकायत की कि गाजियाबाद की अदालतों में कुछ ऐसा है जो गलत है। इस पर जैन को जाँच का जिम्मा मिला और उन्होंने आते ही एकाउन्ट्स और नजारत को सील किया फिर जब जाँच की तो अस्थाना का फर्जीवाड़ा सामने आया। तब रमा जैन ने स्वयं गाजियाबाद के थाना कविनगर में एफआईआर दर्ज कराई। यह वही रमा जैन हैं, जिन्होंने निठारी केस में पंधोर और कोली को फाँसी की सजा सुनाई थी।
अपनी गर्दन फँसती देखकर अस्थाना ने अदालत में सेक्शन 164 के तहत इकबालिया बयान दर्ज कराकर पोल खोल दी कि यह फर्जीवाड़ा तो वह न्यायाधीशों के सहयोग से कर रहा था और यह राशि भी न्यायाधीशों के ऊपर ही खर्च होती थी। उसने बाकायदा कई बिल भी उपलब्ध कराए जो उसके बयान की पुश्टि करते हैं।
भले ही आशुतोष अस्थाना की मौत स्वाभाविक रूप से हुई हो लेकिन अगर निश्पक्ष जांच न हुई, ऐसी जाँच जिसमें कोई न्यायिक अधिाकारी षामिल न हो, बल्कि कई संवैधनिक संस्थाओं के लोग शामिल हों, तो लोग भरोसा नहीं करेंगे। केस की गम्भीरता को देखकर लगता है कि अस्थाना की मौत एक रहस्य ही बनी रहेगी। इसीलिए पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी मौत का कारण अभी तक सामने नहीं आया है। जिस केस में 36 बड़े न्यायाधीश फँस रहे हों, जिनमें से एक सर्वोच्च न्यायालयऔर ग्यारह हाई कोर्ट के न्यायाधीश हों, उस केस के मुख्य अभियुक्त की मौत से रहस्य से पर्दा इतनी आसानी से उठ भी कैसे सकता है? उप्र सरकार अस्थाना की मौत की जाँच की घोषणा कर चुकी है। लेकिन जाँच कौन करेगा? वही पुलिस, जिसके कप्तान साहब अस्थाना के इकबालिया बयान पर सर्वोच्च न्यायालयके मुख्य न्यायाधीश से न्यायाधीशों से पूछताछ करने की अनुमति मांग रहे थे!
यह अभी भी रहस्य बना हुआ है कि अस्थाना की मौत कैसे हुई। बताया जाता है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी कुछ कह पाने की स्थिति में नहीं है। जैसा कि संदेह व्यक्त किया जा रहा है कि उसकी मौत जहर खाने से हुई तो सवाल ये है कि तो उसे जेल में जहर कहां से मिला। दूसरा बड़ा सवाल ये कि उसने ये जहर खुद खाया या फिर किसी ने उसे जबरन जहर खिलाया। अगर उसने खुद जहर खाया तो खुदकुशी की वजह क्या थी और उसने जहर खाने के बाद किसी से इसका जिक्र क्यों नहीं किया। इसलिए अगर यह संदेह सही है कि मौत जहर खाने से ही हुई तो निश्चित रूप से यह हत्या का मामला ही नजर आता है।
इस बीच सर्वोच्च न्यायालयने न्यायिक जाँच के आदेश दिए हैं। लेकिन संभवत: यह पहला अवसर है कि न्यायिक जाँच के निष्पक्ष होने पर ही संदेह व्यक्त किया जा रहा है। सवाल सिर्फ अस्थाना की मौत की निश्पक्ष जांच का नहीं है बल्कि पूरी की पूरी न्याय प्रणाली की विष्वसनीयता संकट में है। इसलिए जांच किसी स्वतंत्र जांच एजेंसी से ही होनी चाहिए। यह इसलिए भी जरूरी हो जाता है क्योंकि जब पुलिस ने आरोपित न्यायाधीशों से पूछताछ करने की अनुमति मांगी तब मुख्य न्यायाधीश ने पुलिस से संभावित सवालों की सूची माँगी। इससे जनमानस में यह संदेष गया कि क्या मुल्क में दो कानून हैं? न्यायाधीशों के लिए एक और आम आदमी के लिए अलग?
अक्सर न्यायपालिका पर उंगलिया उठती रही हैं। मसलन सूचना के अधिकार की परिधि में न्यायाधीश साहब क्यों नहीं आते हैं? सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति की क्या प्रक्रिया है? न्यायाधीश साहब की जवाबदेही किसके प्रति है इस देष के संविधान के प्रति, सरकार के प्रति या जनता के प्रति या किसी के प्रति नहीं?
एक टीवी चैनल के स्टिंग ऑप्रेशन में कुछ सांसद रंगे हाथ रिश्वत लेते हुए पकड़े गए थे। लेकिन संसद ने एक स्वर से उन दागी सांसदों की सदस्यता रद्द करके बाहर का रास्ता दिखाया और अपनी विश्वसनीयता बचाकर एक नजीर पेश की। लेकिन आश्चर्य इस बात का है कि अस्थाना ने जिन न्यायाधीशों के नाम अपने इकबालिया बयान में लिए वह अभी तक बदस्तूर न्यायिक काम निपटा रहे हैं और जो काम नहीं भी कर रहे हैं वह महज इसलिए क्योंकि वे सेवानिवृत्त हो चुके हैं। इतना ही नहीं जिन तीन न्यायाधीशों के नाम अस्थाना ने अपने इकबालिया बयान में लिए थे कि किस तरह इन न्यायाधीशों ने उसे गिरफ्तारी से बचने में मदद की और छिपाया उन न्यायाधीशों के खिलाफ भी अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है।
भले ही कानून मंत्री वीरप्पा मोइली कह रहे हों कि अस्थाना की मौत से इस केस की जांच पर कोई असर नहीं पड़ेगा लेकिन इतिहास बताता है कि अंजाम क्या होगा?
जिस तरह से न्यायाधीशों की संपत्तिा के मामले पर सर्वोच्च न्यायालयके मुख्य न्यायाधाीष की पहल पर न्यायाधीशों ने स्वयं अपनी संपत्तिा सार्वजनिक करने का साहसिक निर्णय लिया था उसी तरह की नजीर पीएफ घोटाले में भी पेष की जानी चाहिए और उन न्यायाधीशों से सारा न्यायिक काम छीन लिया जाना चाहिए जिनके नाम अस्थाना ने अपने इकबालिया बयान में लिए थे। अस्थाना की मौत के बाद ऐसी निश्पक्षता का प्रदर्षन और जरूरी हो जाता है ताकि न्याय केवल हो ही नहीं बल्कि होता हुआ दिखाई भी दे। क्या ऐसा साहस दिखा पाएंगे मी लॉर्ड!!!!!!!!!!!
शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2009
न्याय प्रणाली की विष्वसनीयता संकट
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बुधवार, 7 अक्टूबर 2009
कोबाड़ का रास्ता!
कोबाड़ का रास्ता!
अमलेन्दु उपाध्याय
पिछले महीने गिरफ्तार किए गए नकसली नेता कोबाड़ गांधी की दिल्ली में गिरफ्तारी से देष में एक बहस छिड़ गई है। पहले जब नक्सल समस्या पर बहस होती थी तब इसे कुंठित युवाओं की सत्ता लालसा या भटके हुए वामपंथी अतिवादी बताकर इसे कानून व्यवस्था का प्रष्न बता दिया जाता था और राजकाज चलता रहता था। लेकिन इस बार बहस कुछ नए किस्म की है।
कोबाड़ गांधी इसके लिए बधाई के पात्र हैं कि उनके बहाने ही सही नक्सलवाद एक बार फिर चर्चा में है और उनकी गिरफ्तारी के बहाने ही सही, माओवादी आन्दोलन को फिर से समझने की जरूरत महसूस की जाने लगी है। भले ही गृह मंत्री पी. चिदंबरम नक्सलवाद को सबसे बड़ा खतरा बता रहे हों लेकिन उनकी सरकार में ही लोग उनके इस विचार से पूर्णतया सहमत नहीं दिखते हैं। स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह यह कहने को मजबूर हो गए हैं कि नक्सलवाद सिर्फ कानून व्यवस्था का मामला नहीं है। और यह बात सही भी है। कानून व्यवस्था के मसले दषकों तक नहीं चला करते हैं। नक्सलवाद इस देष में लगभग तीन दषक से भी ज्यादा समय से पनप रहा है और इसका प्रभाव कम होने के बजाए लगातार बढ़ता ही गया है। किसी भी आतंकवादी आन्दोलन के पूरे दौर में जितने आतंकवादी मारे जाते होंगे उससे कहीं ज्यादा नक्सली हर साल पुलिस के हाथों मारे जाते हैं। अकेले छत्तीसगढ़ में एक वर्श में चार सौ के आसपास कथित नक्सली मारे गए हैं। लेकिन कोई तो बात है जो नक्सलवाद का जुनून बढ़ता ही जाता है।
दिल्ली की गद्दी पर बैठे हुक्मरानों और पूॅंजीवादी रुझान के बुद्धिजीवियों के माथे पर इस प्रष्न को लेकर चिंता की लकीरें गहरी हो गई हैं कि आखिर क्या बात है कि कोबाड़ गांधी जैसे लोग अपने कैरियर, घरबार और व्यापार को छोड़कर इस तरह के आन्दोलन से न केवल जुड़ जाते हैं बल्कि अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देते हैं। ताज्जुब इसलिए भी होता है कि अतिवामपंथी आंदोलन से जुड़ने वाले लोग न तो धर्म के पहरूए हैं, न जेहादी हैं, न जातिवादी आन्दोलन से निकलकर आए हैं। फिर उन्हें यह जुनून कहाॅं से मिलता है?
यहाॅं यह याद रखना चाहिए कि कोबाड़ गांधी इस तरह का पहला उदाहरण नहीं हैं, जिन्होंने माक्र्सवाद के सिद्धान्तों के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया हो। इससे पहले भी ईएमएस नंबूदरीपाद जैसे लोग भी हुए हैं जिनका राजघराने से ताल्लुक रहा और उनकी जमींदारी देष में सर्वाधिक मालगुजारी वसूलने वाली रियासत समझी जाती थी। लेकिन नम्बूदरीपाद अपनी सारी संपत्ति कम्युनिस्ट पार्टी को सौंपकर पूर्णकालिक कार्यकर्ता बन गए थे। कोबाड़ गांधी के जुनून को एक और तरीके से समझा जा सकता है। गौतम बुद्ध भी अपना सारा राजपाट छोड़कर दुख के निदान की तलाष में ही भिक्षु बन गए थे। लेकिन बुद्ध का रास्ता अध्यात्म का था, पलायन का था और कोबाड़ ने जो रास्ता चुना, वह है तो बुद्ध के समानान्तर ही लेकिन वह विचार का रास्ता है, संघर्श का रास्ता है, पलायन का नहीं।
यह भी बात गौेर करने लायक है कि नक्सलवाद से प्रभावित क्षेत्र वही ज्यादा हैं जहाॅं जंगल और आदिवासी ज्यादा हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि जंगल नक्सलवादियों की मदद करते हैं। बल्कि समस्या की तह तक जाना होगा। नब्बे के दषक में जब इस मुल्क में नरसिंहाराव और मनमोहन सिंह मार्का उदारीकरण आया जिसे चिदंबरम जैसे हार्वर्ड उत्पादित अर्थषास्त्रियों ने और धार दी तो देष में नए किस्म का पूॅंजीवाद आया और सरकारों की भूमिका भी बदलने लगी। नब्बे के दषक से पहले सरकार की भूमिका कल्याणकारी राज्य की मानी जाती थी। दिखावे के लिए ही सही ‘गरीबी हटाओ’ के नारे लगते थे। लेकिन नरसिंहाराव-वाजपेयी-मनमोहन की तिकड़ी ने सरकारों की भूमिका एक एनजीआंे की बना दी और सरकारें बड़े पूॅंजीपतियों और घोटालेबाजों की जेब की गुलाम बनकर रह गईं और अब तो प्रधानमंत्री जनता को नसीहत भी देने लगे हैं कि वह और महॅंगाई के लिए तैयार रहे।
उदारीकरण की आंधी में औद्योगिकीकरण और तथाकथित विकास के नाम पर किसानों की जमीनें हथियाए जाने लगीं और जंगल से आदिवासियों को बेदखल करके कारखाने लगने लगे। क्या संयोग है कि सारी बड़ी कंपनियों के काॅरपोरेट दफ्तर तो मुंबई और कोलकाता में हैं लेकिन कई कई हजार एकड़ में लगने वाले उनके प्लांट छत्तीसगढ़ और झारखण्ड के जंगलों में लग रहे हैं। बाॅंध बन तो रहे हैं विकास के नाम पर लेकिन यह बाॅंध बलि ले रहे हैं हजारों गांवों के लोगों की। इस विकास और औद्योगिकीकरण से एक आम आदमी को लाभ होने के बजाए नुकसान ही हुआ है।
काफी पहले दो छोटी सी खबरें अलग अलग अखबारों में पढ़ी थीं। एक हाल ही की घटना राजस्थान की थी। उस खबर के मुताबिक कुछ आदिवासियों को पुलिस ने पकड़ा था जिन से लगभग बारह हजार रूपए मूल्य का आंवला पकड़ा गया था। सरकार का तर्क था कि इस आंवले पर अधिकार उस ठेकेदार का है जिसे वन उपज का ठेका दिया गया है। दूसरी खबर के मुताबिक मुकेष अंबानी के जामनगर रिफाइनरी प्लांट में कई सैकड़ा एकड़ में बेहतरीन आम के पेड़ लगे हुए हैं और उन आमों का निर्यात विदेषों को किया जाता है।
अगर आपके पास दृश्टि है तो नक्सलवाद के बढ़ते प्रभाव को समझने और समझाने के लिए यह छोटी सी दो खबरें काफी हैं। राजस्थान की घटना बताती है कि जंगल से आदिवासियों का अधिकार खत्म कर दिया गया है। और अंबानी की खबर बताती है कि जामनगर का प्लांट हजारों लोगों को विस्थापित करके ही स्थापित हुआ होगा और किसानों को उनकी जमीन से बेदखल करके मुकेष अंबानी अब आम की खेती भी कर रहे हैं। इन्हीं विस्थापित लोगों के समर्थन से नक्सलवाद का विस्तार हो रहा है। यह कटु सत्य है और इसे चिदंबरम चाहे स्वीकार करें या न करें - इस विस्थापित आम आदमी के समर्थन से ही नक्सलवाद को षह मिल रही है। खुद सरकारी आंकडें बताते हैं कि वर्श 2006 में 1,509 नक्सली वारदातें हुई। जबकि वर्श 2007 में 1,565 वारदातें हुई। इन वारदातों में वर्श 2006 में 157 सुरक्षा बलों के जवान और 521 नागरिक मारे गए जबकि वर्श 2007 में 236 सुरक्षा बलों के जवान और 460 नागरिक मारे गए।
मीडिया में जो खबरें आ रही हैं, उनके मुताबिक नक्सलवाद प्रभावित राज्यों में पुलिस बल के आधुनिकीकरण के नाम पर कई हजार करोड़ रूपए सरकार खर्च करेगी। जाहिर है इसमें से अधिकांष रूपया अत्याधुनिक हथियारों की खरीद पर खर्च किया जाएगा और एक बड़ी रकम खुफिया नेटवर्क बनाने के नाम पर खर्च होगी, जिसका कोई हिसाब किताब पुलिस अफसरों को नहीं देना होता है। जाहिर है जब तक इस नेटवर्क के नाम पर और हथियारों की खरीद के नाम पर सरकार यह धन मुहैया कराती रहेगी तब तक नक्सलियों के नाम पर आम गरीब आदिवासी पुलिस मुठभेड़ों में मरता रहेगा और प्रतिषोध में इन गरीबों का समर्थन नक्सलियों को ही मिलता रहेगा। सवाल यह भी है कि आतंकवाद नक्सलवाद प्रभावित राज्यों में विकास के नाम पर जो धन राज्यों को दिया जाता है उस धन का क्या प्रयोग होता है? अगर यह धन विकास पर ही खर्च हो रहा है तो वह विकास कहाॅं हो रहा है? अक्सर समाचारपत्रों में रिपोटर््स प्रकाषित होती हैं कि नक्सली अपने क्षेत्रों में ठेकेदारों से लेवी वसूल करते हैं। खबरें सही होती भी हैं। लेकिन यही खबरें प्रष्न भी छोड़ती हैं कि नक्सली यह लेवी किन लोगों से वसूलते हैं? आम गरीब आदमी तो लेवी देता नहीं हैं। लेवी देता है भ्रश्ट ठेकेदार और इंजीनियर। जाहिर है कि अगर यह नक्सलियों को लेवी नहीं भी देगा तो उस पैसे को विकास में नहीं लगाएगा बल्कि अपनी जेब भरेगा।
इसलिए चिदंबरम जी को समझना होगा कि नक्सलवाद विचार है और विचार बन्दूकों से कुचले नहीं जाते। इसके लिए खुद चिदंबरम जी को इस व्यवस्था में सुधार करना होगा और खुद भी एक वैचारिक व्यक्ति बनना होगा। सरकार को एनजीओ की भूमिका छोड़ कर कल्याणकारी राज्य की भूमिका निभानी होगी और विकास का पैमाना बदलना होगा विस्थापन की बुनियाद पर विकास नहीं चलेगा। वरना आप एक कोबाड़ को पकड़ेंगे दस नए कोबाड़ पैदा हो जाएंगे। अभी तक का इतिहास तो यही बताता है कि नक्सली पैदा होता नहीं है बल्कि यह व्यवस्था( जिसके पैरोकार चिदंबरम और मनमोहन हैं) बनाती है। नक्सलियों का हिंसा का रास्ता एकदम गलत है , लेकिन उनका उद्देष्य गलत कहा जाए? कोबाड़ की गिरफ्तारी या छत्तीसगढ़ में नक्सलियों के नाम पर आदिवासियों का सामूहिक नरसंहार समस्या का हल कभी नहीं बन सकेगा।
अमलेन्दु उपाध्याय
पिछले महीने गिरफ्तार किए गए नकसली नेता कोबाड़ गांधी की दिल्ली में गिरफ्तारी से देष में एक बहस छिड़ गई है। पहले जब नक्सल समस्या पर बहस होती थी तब इसे कुंठित युवाओं की सत्ता लालसा या भटके हुए वामपंथी अतिवादी बताकर इसे कानून व्यवस्था का प्रष्न बता दिया जाता था और राजकाज चलता रहता था। लेकिन इस बार बहस कुछ नए किस्म की है।
कोबाड़ गांधी इसके लिए बधाई के पात्र हैं कि उनके बहाने ही सही नक्सलवाद एक बार फिर चर्चा में है और उनकी गिरफ्तारी के बहाने ही सही, माओवादी आन्दोलन को फिर से समझने की जरूरत महसूस की जाने लगी है। भले ही गृह मंत्री पी. चिदंबरम नक्सलवाद को सबसे बड़ा खतरा बता रहे हों लेकिन उनकी सरकार में ही लोग उनके इस विचार से पूर्णतया सहमत नहीं दिखते हैं। स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह यह कहने को मजबूर हो गए हैं कि नक्सलवाद सिर्फ कानून व्यवस्था का मामला नहीं है। और यह बात सही भी है। कानून व्यवस्था के मसले दषकों तक नहीं चला करते हैं। नक्सलवाद इस देष में लगभग तीन दषक से भी ज्यादा समय से पनप रहा है और इसका प्रभाव कम होने के बजाए लगातार बढ़ता ही गया है। किसी भी आतंकवादी आन्दोलन के पूरे दौर में जितने आतंकवादी मारे जाते होंगे उससे कहीं ज्यादा नक्सली हर साल पुलिस के हाथों मारे जाते हैं। अकेले छत्तीसगढ़ में एक वर्श में चार सौ के आसपास कथित नक्सली मारे गए हैं। लेकिन कोई तो बात है जो नक्सलवाद का जुनून बढ़ता ही जाता है।
दिल्ली की गद्दी पर बैठे हुक्मरानों और पूॅंजीवादी रुझान के बुद्धिजीवियों के माथे पर इस प्रष्न को लेकर चिंता की लकीरें गहरी हो गई हैं कि आखिर क्या बात है कि कोबाड़ गांधी जैसे लोग अपने कैरियर, घरबार और व्यापार को छोड़कर इस तरह के आन्दोलन से न केवल जुड़ जाते हैं बल्कि अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देते हैं। ताज्जुब इसलिए भी होता है कि अतिवामपंथी आंदोलन से जुड़ने वाले लोग न तो धर्म के पहरूए हैं, न जेहादी हैं, न जातिवादी आन्दोलन से निकलकर आए हैं। फिर उन्हें यह जुनून कहाॅं से मिलता है?
यहाॅं यह याद रखना चाहिए कि कोबाड़ गांधी इस तरह का पहला उदाहरण नहीं हैं, जिन्होंने माक्र्सवाद के सिद्धान्तों के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया हो। इससे पहले भी ईएमएस नंबूदरीपाद जैसे लोग भी हुए हैं जिनका राजघराने से ताल्लुक रहा और उनकी जमींदारी देष में सर्वाधिक मालगुजारी वसूलने वाली रियासत समझी जाती थी। लेकिन नम्बूदरीपाद अपनी सारी संपत्ति कम्युनिस्ट पार्टी को सौंपकर पूर्णकालिक कार्यकर्ता बन गए थे। कोबाड़ गांधी के जुनून को एक और तरीके से समझा जा सकता है। गौतम बुद्ध भी अपना सारा राजपाट छोड़कर दुख के निदान की तलाष में ही भिक्षु बन गए थे। लेकिन बुद्ध का रास्ता अध्यात्म का था, पलायन का था और कोबाड़ ने जो रास्ता चुना, वह है तो बुद्ध के समानान्तर ही लेकिन वह विचार का रास्ता है, संघर्श का रास्ता है, पलायन का नहीं।
यह भी बात गौेर करने लायक है कि नक्सलवाद से प्रभावित क्षेत्र वही ज्यादा हैं जहाॅं जंगल और आदिवासी ज्यादा हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि जंगल नक्सलवादियों की मदद करते हैं। बल्कि समस्या की तह तक जाना होगा। नब्बे के दषक में जब इस मुल्क में नरसिंहाराव और मनमोहन सिंह मार्का उदारीकरण आया जिसे चिदंबरम जैसे हार्वर्ड उत्पादित अर्थषास्त्रियों ने और धार दी तो देष में नए किस्म का पूॅंजीवाद आया और सरकारों की भूमिका भी बदलने लगी। नब्बे के दषक से पहले सरकार की भूमिका कल्याणकारी राज्य की मानी जाती थी। दिखावे के लिए ही सही ‘गरीबी हटाओ’ के नारे लगते थे। लेकिन नरसिंहाराव-वाजपेयी-मनमोहन की तिकड़ी ने सरकारों की भूमिका एक एनजीआंे की बना दी और सरकारें बड़े पूॅंजीपतियों और घोटालेबाजों की जेब की गुलाम बनकर रह गईं और अब तो प्रधानमंत्री जनता को नसीहत भी देने लगे हैं कि वह और महॅंगाई के लिए तैयार रहे।
उदारीकरण की आंधी में औद्योगिकीकरण और तथाकथित विकास के नाम पर किसानों की जमीनें हथियाए जाने लगीं और जंगल से आदिवासियों को बेदखल करके कारखाने लगने लगे। क्या संयोग है कि सारी बड़ी कंपनियों के काॅरपोरेट दफ्तर तो मुंबई और कोलकाता में हैं लेकिन कई कई हजार एकड़ में लगने वाले उनके प्लांट छत्तीसगढ़ और झारखण्ड के जंगलों में लग रहे हैं। बाॅंध बन तो रहे हैं विकास के नाम पर लेकिन यह बाॅंध बलि ले रहे हैं हजारों गांवों के लोगों की। इस विकास और औद्योगिकीकरण से एक आम आदमी को लाभ होने के बजाए नुकसान ही हुआ है।
काफी पहले दो छोटी सी खबरें अलग अलग अखबारों में पढ़ी थीं। एक हाल ही की घटना राजस्थान की थी। उस खबर के मुताबिक कुछ आदिवासियों को पुलिस ने पकड़ा था जिन से लगभग बारह हजार रूपए मूल्य का आंवला पकड़ा गया था। सरकार का तर्क था कि इस आंवले पर अधिकार उस ठेकेदार का है जिसे वन उपज का ठेका दिया गया है। दूसरी खबर के मुताबिक मुकेष अंबानी के जामनगर रिफाइनरी प्लांट में कई सैकड़ा एकड़ में बेहतरीन आम के पेड़ लगे हुए हैं और उन आमों का निर्यात विदेषों को किया जाता है।
अगर आपके पास दृश्टि है तो नक्सलवाद के बढ़ते प्रभाव को समझने और समझाने के लिए यह छोटी सी दो खबरें काफी हैं। राजस्थान की घटना बताती है कि जंगल से आदिवासियों का अधिकार खत्म कर दिया गया है। और अंबानी की खबर बताती है कि जामनगर का प्लांट हजारों लोगों को विस्थापित करके ही स्थापित हुआ होगा और किसानों को उनकी जमीन से बेदखल करके मुकेष अंबानी अब आम की खेती भी कर रहे हैं। इन्हीं विस्थापित लोगों के समर्थन से नक्सलवाद का विस्तार हो रहा है। यह कटु सत्य है और इसे चिदंबरम चाहे स्वीकार करें या न करें - इस विस्थापित आम आदमी के समर्थन से ही नक्सलवाद को षह मिल रही है। खुद सरकारी आंकडें बताते हैं कि वर्श 2006 में 1,509 नक्सली वारदातें हुई। जबकि वर्श 2007 में 1,565 वारदातें हुई। इन वारदातों में वर्श 2006 में 157 सुरक्षा बलों के जवान और 521 नागरिक मारे गए जबकि वर्श 2007 में 236 सुरक्षा बलों के जवान और 460 नागरिक मारे गए।
मीडिया में जो खबरें आ रही हैं, उनके मुताबिक नक्सलवाद प्रभावित राज्यों में पुलिस बल के आधुनिकीकरण के नाम पर कई हजार करोड़ रूपए सरकार खर्च करेगी। जाहिर है इसमें से अधिकांष रूपया अत्याधुनिक हथियारों की खरीद पर खर्च किया जाएगा और एक बड़ी रकम खुफिया नेटवर्क बनाने के नाम पर खर्च होगी, जिसका कोई हिसाब किताब पुलिस अफसरों को नहीं देना होता है। जाहिर है जब तक इस नेटवर्क के नाम पर और हथियारों की खरीद के नाम पर सरकार यह धन मुहैया कराती रहेगी तब तक नक्सलियों के नाम पर आम गरीब आदिवासी पुलिस मुठभेड़ों में मरता रहेगा और प्रतिषोध में इन गरीबों का समर्थन नक्सलियों को ही मिलता रहेगा। सवाल यह भी है कि आतंकवाद नक्सलवाद प्रभावित राज्यों में विकास के नाम पर जो धन राज्यों को दिया जाता है उस धन का क्या प्रयोग होता है? अगर यह धन विकास पर ही खर्च हो रहा है तो वह विकास कहाॅं हो रहा है? अक्सर समाचारपत्रों में रिपोटर््स प्रकाषित होती हैं कि नक्सली अपने क्षेत्रों में ठेकेदारों से लेवी वसूल करते हैं। खबरें सही होती भी हैं। लेकिन यही खबरें प्रष्न भी छोड़ती हैं कि नक्सली यह लेवी किन लोगों से वसूलते हैं? आम गरीब आदमी तो लेवी देता नहीं हैं। लेवी देता है भ्रश्ट ठेकेदार और इंजीनियर। जाहिर है कि अगर यह नक्सलियों को लेवी नहीं भी देगा तो उस पैसे को विकास में नहीं लगाएगा बल्कि अपनी जेब भरेगा।
इसलिए चिदंबरम जी को समझना होगा कि नक्सलवाद विचार है और विचार बन्दूकों से कुचले नहीं जाते। इसके लिए खुद चिदंबरम जी को इस व्यवस्था में सुधार करना होगा और खुद भी एक वैचारिक व्यक्ति बनना होगा। सरकार को एनजीओ की भूमिका छोड़ कर कल्याणकारी राज्य की भूमिका निभानी होगी और विकास का पैमाना बदलना होगा विस्थापन की बुनियाद पर विकास नहीं चलेगा। वरना आप एक कोबाड़ को पकड़ेंगे दस नए कोबाड़ पैदा हो जाएंगे। अभी तक का इतिहास तो यही बताता है कि नक्सली पैदा होता नहीं है बल्कि यह व्यवस्था( जिसके पैरोकार चिदंबरम और मनमोहन हैं) बनाती है। नक्सलियों का हिंसा का रास्ता एकदम गलत है , लेकिन उनका उद्देष्य गलत कहा जाए? कोबाड़ की गिरफ्तारी या छत्तीसगढ़ में नक्सलियों के नाम पर आदिवासियों का सामूहिक नरसंहार समस्या का हल कभी नहीं बन सकेगा।

शनिवार, 3 अक्टूबर 2009
सादगी पर सियासत
सादगी पर सियासत
अमलेन्दु उपाध्याय
पिछले दिनों षताब्दी में आम आदमी बनकर या़त्रा करने के बाद राहुल बाबा अचानक लखनऊ के पास बाराबंकी जिले के रामनगर के पास एक दलित गाॅंव में जा पहुॅंचे और लोकसभा चुनाव से पहले जिस तरह उन्होंने एडिसन के बल्ब की तरह ‘कलावती’ का आविश्कार किया था उसी तरह बाराबंकी में उन्होंने ‘जलवर्शा’ की सफल खोज की। कांग्रेसी युवराज राहुल बाबा का अगला टारगेट उत्तर प्रदेष है। इसलिए उनके मीडिया मैनेजर कायदे से मीडिया प्रबंधन कर रहे हैं और उनकी छवि निर्माण में व्यस्त हैं। लिहाजा उनकी सादगी के चर्चे कुछ ज्यादा ही हो रहे हैं और सोने पर सुहागा यह है कि राहुल बाबा बिना बताए दलितों के घर भी पहुॅंच रहे हैं और उनके घर पर भोजन भी कर रहे हैं।
राहुल बाबा के इस महान कार्य की तारीफ होनी चाहिए थी, सो हुई भी और बहन जी को धक्का लगना था सो लगा ही। जाहिर है यह सारी नौटंकी उत्तर प्रदेष में होने के कारण दलित की बेटी बहन मायावती का क्रोधित होना स्वाभाविक है। लेकिन इस तू-तू- मैं-मैं में असल सवाल पीछे छूटता जा रहा है कि राहुल बाबा के इस कलावती-जलवर्शा नाटक से आम दलितों का क्या भला हो रहा है? क्या इस नौटंकी से दलितों की रोजी रोटी के अवसर बढ़ गए? या दलितों को बराबरी का हक मिल गया? अगर ऐसा है या हमारे कांग्रेसी विद्वजन ऐसा मानते हैं कि राहुल बाबा के तूफानी दौरों ने दलितों का जीवन बदल दिया है और अब आम दलित की रोजाना मजदूरी पचास रूपये प्रतिदिन से बढ़कर इक्यावन रूपये प्रतिदिन हो गई है, तब तो मानना पड़ेगा कि राहुल बाबा कांग्रेस के सपूत हैं और जिस काम को इंदिरा और राजीव नहीं कर पाए उसे राहुल बाबा करके अपनी सात पुष्तों के गुनाहों का प्रायष्चित कर रहे हैं।
जहां तक राहुल बाबा की सादगी का सवाल है तो यह सादगी की मुहिम तब षुरू हुई जब विदेषमंत्री एसएम कृश्णा और विदेष राज्य मंत्री षषि थरूर की विलासिता की पोल देष के सामने खुली कि किस तरह से ‘कांग्रेस का हाथ/ आम आदमी के साथ’ का नारा देने वाले कांग्रेसी भद्रजन जनता की मेहनत की कमाई पर गुलछर्रे उड़ा रहे हैं। उसके बाद राहुल बाबा ने षताब्दी में यात्रा की। उनकी षताब्दी यात्रा को मीडिया में प्रचारित किया गया कि राहुल ने आम आदमी की तरह षताब्दी में सफर किया। मुबारक हो! अब भद्र कांग्रेसजनों और उनके मीडियाई पिछलग्गुओं ने आम आदमी की परिभाशा भी बदल दी। अब आम आदमी षताब्दी में यात्रा करता है और विमान की इकाॅनाॅमी क्लास में मवेषी यात्रा करते हैं। इस हिसाब से पैसेंजर ट्रेन में या रेलगाड़ी के जनरल डिब्बे में कीड़े मकोड़े यात्रा करते हैं। यह एक शडयन्त्र है। राहुल की षताब्दी यात्रा के बहाने आम आदमी की परिभाशा बदली जा रही है। राहुल को अगर साधारण आदमी बनने का इतना ही षौक है तो जरा किसी रेल की जनरल बोगी में सफर कर लें आम आदमी बनने का सारा नषा काफूर हो जाएगा।
इससे पहले राहुल बाबा को भी सादगी याद नहीं आई थी अचानक सारे कांग्रेसियों के सिर पर सादगी का भूत सवार हांे गया। राहुल बाबा ने बाराबंकी में ‘दलित ग्राम प्रधान’ के घर पर भोजन तो किया लेकिन वहां से 250 किमी दूर उस गोरखपुर जाने की जहमत नहीं उठा पाए जहां जापानी बुखार से तीन सौ से ज्यादा दलितों के बच्च्ेा पिछले दो माह में ही मारे गए हैं। वैसे राहुल बाबा समझदार हैं इसीलिए वह दलितों के घर जाकर तो खाना खा रहे हैं, लेकिन किसी दलित को दस जनपथ लाकर खाना नहीं खिला रहे हैं यह बात दीगर है कि दस जनपथ पर एक इफ्तार पार्टी पर ही लगभग एक करोड़ रूपया खर्च हो जाता है। क्या राहुल बाबा अपने इस दलित अभियान के तहत अगली यात्रा बिहार की करना पसंद करेंगे जहां वह दलित जाति ‘मुसहरों के टोले में रात गुजारें और उनके साथ भोजन करके यह जानने का प्रयास करेंगे कि यह लोग जिस भोजन (चूहे) को खाने की वजह से मुसहर नाम से जाने जाते हैं उसे और लोग क्यों नहीे खाते?
यह राहुल गांधी का दुर्भाग्य है कि जब वह गांव में गए तो उन्हें लोगों ने पहचाना ही नहीं और उन्हें बताना पड़ा कि वह राजीव गांधी के बेटे हैं। केवल यही एक घटना राहुल की सादगी की पोल पट्टी खोलने के लिए काफी है। क्या राजीव गांधी को कभी बताने की जरूरत पड़ी थी कि वह इंदिरा गांधी के बेटे हैं? या इंदिरा गांधी को कभी बताने की जरूरत पड़ी थी कि वह जवाहर लाल नेहरू की बेटी हैं? लेकिन राहुल गांधी को बताना पड़ रहा है कि वह राजीव गांधी के बेटे हैं।
राहुल अपने नाटक से कांग्रेस के लिए ही मुसीबतें खड़ी कर रहे हैं। अब अगर राहुल दलित इलाकों का विकास न होने के लिए कोस रहे हैं, तो किसको? इस देष पर पांच दषक तक कांग्रेस का षासन रहा। लिहाजा विकास न होने का दोश तो सबसे अधिक कांग्रेस के ही सिर पर है। फिर राहुल सवाल किससे कर रहे हैं?
रहा सवाल राहुल की सादगी का, अगर आज इंदिरा गांधी जीवित होतीं तो क्या कीतीं? मनोहर ष्याम जोषी ने इंदिरा गांधी का एक बार साक्षात्कार लिया था जब इंदिरा जी प्रधानमंत्री थीं। जोषी जी ने कांग्रेसी नेताओं की सादगी पर उनसे सवाल पूछा तो इंदिरा जी ने जबाव दिया-”यह सही है कि कांग्रेस को सादगी और जनसेवा की दिषा में नेतृत्व देना चाहिए लेकिन जो लोग यह समझते हैं कि बॅंगला छोड़कर झोपड़ी में जा बसना चाहिए नेताओं को, वह बात एक दिखावटी षगल सी मालूम होती है। कुछ सहूलियतें जरूरी होती हैं सरकारी कामकाज के लिए, सुरक्षा और गोपनीयता के भी कुछ तकाजे होते हैं। उनके पूरे किए जाने का मतलब षानो-षौकत नहीं है। हाॅं उससे अधिक कुछ होता तो वह ठीक नहीं।“ कुछ समझे राहुल बाबा! आपकी दादी स्व. इंदिरा जी आपकी सादगी को एक दिखावटी षगल बता रही हैं। इसलिए युवराज अब तो आम आदमी बनने का नाटक करके गरीबों की गरीबी का मजाक उड़ाना बन्द करो!!!
(लेखक राजनीतिक समीक्षक हैं और ‘दि संडे पोस्ट’ में सह संपादक हैं।)
अमलेन्दु उपाध्याय
पिछले दिनों षताब्दी में आम आदमी बनकर या़त्रा करने के बाद राहुल बाबा अचानक लखनऊ के पास बाराबंकी जिले के रामनगर के पास एक दलित गाॅंव में जा पहुॅंचे और लोकसभा चुनाव से पहले जिस तरह उन्होंने एडिसन के बल्ब की तरह ‘कलावती’ का आविश्कार किया था उसी तरह बाराबंकी में उन्होंने ‘जलवर्शा’ की सफल खोज की। कांग्रेसी युवराज राहुल बाबा का अगला टारगेट उत्तर प्रदेष है। इसलिए उनके मीडिया मैनेजर कायदे से मीडिया प्रबंधन कर रहे हैं और उनकी छवि निर्माण में व्यस्त हैं। लिहाजा उनकी सादगी के चर्चे कुछ ज्यादा ही हो रहे हैं और सोने पर सुहागा यह है कि राहुल बाबा बिना बताए दलितों के घर भी पहुॅंच रहे हैं और उनके घर पर भोजन भी कर रहे हैं।
राहुल बाबा के इस महान कार्य की तारीफ होनी चाहिए थी, सो हुई भी और बहन जी को धक्का लगना था सो लगा ही। जाहिर है यह सारी नौटंकी उत्तर प्रदेष में होने के कारण दलित की बेटी बहन मायावती का क्रोधित होना स्वाभाविक है। लेकिन इस तू-तू- मैं-मैं में असल सवाल पीछे छूटता जा रहा है कि राहुल बाबा के इस कलावती-जलवर्शा नाटक से आम दलितों का क्या भला हो रहा है? क्या इस नौटंकी से दलितों की रोजी रोटी के अवसर बढ़ गए? या दलितों को बराबरी का हक मिल गया? अगर ऐसा है या हमारे कांग्रेसी विद्वजन ऐसा मानते हैं कि राहुल बाबा के तूफानी दौरों ने दलितों का जीवन बदल दिया है और अब आम दलित की रोजाना मजदूरी पचास रूपये प्रतिदिन से बढ़कर इक्यावन रूपये प्रतिदिन हो गई है, तब तो मानना पड़ेगा कि राहुल बाबा कांग्रेस के सपूत हैं और जिस काम को इंदिरा और राजीव नहीं कर पाए उसे राहुल बाबा करके अपनी सात पुष्तों के गुनाहों का प्रायष्चित कर रहे हैं।
जहां तक राहुल बाबा की सादगी का सवाल है तो यह सादगी की मुहिम तब षुरू हुई जब विदेषमंत्री एसएम कृश्णा और विदेष राज्य मंत्री षषि थरूर की विलासिता की पोल देष के सामने खुली कि किस तरह से ‘कांग्रेस का हाथ/ आम आदमी के साथ’ का नारा देने वाले कांग्रेसी भद्रजन जनता की मेहनत की कमाई पर गुलछर्रे उड़ा रहे हैं। उसके बाद राहुल बाबा ने षताब्दी में यात्रा की। उनकी षताब्दी यात्रा को मीडिया में प्रचारित किया गया कि राहुल ने आम आदमी की तरह षताब्दी में सफर किया। मुबारक हो! अब भद्र कांग्रेसजनों और उनके मीडियाई पिछलग्गुओं ने आम आदमी की परिभाशा भी बदल दी। अब आम आदमी षताब्दी में यात्रा करता है और विमान की इकाॅनाॅमी क्लास में मवेषी यात्रा करते हैं। इस हिसाब से पैसेंजर ट्रेन में या रेलगाड़ी के जनरल डिब्बे में कीड़े मकोड़े यात्रा करते हैं। यह एक शडयन्त्र है। राहुल की षताब्दी यात्रा के बहाने आम आदमी की परिभाशा बदली जा रही है। राहुल को अगर साधारण आदमी बनने का इतना ही षौक है तो जरा किसी रेल की जनरल बोगी में सफर कर लें आम आदमी बनने का सारा नषा काफूर हो जाएगा।
इससे पहले राहुल बाबा को भी सादगी याद नहीं आई थी अचानक सारे कांग्रेसियों के सिर पर सादगी का भूत सवार हांे गया। राहुल बाबा ने बाराबंकी में ‘दलित ग्राम प्रधान’ के घर पर भोजन तो किया लेकिन वहां से 250 किमी दूर उस गोरखपुर जाने की जहमत नहीं उठा पाए जहां जापानी बुखार से तीन सौ से ज्यादा दलितों के बच्च्ेा पिछले दो माह में ही मारे गए हैं। वैसे राहुल बाबा समझदार हैं इसीलिए वह दलितों के घर जाकर तो खाना खा रहे हैं, लेकिन किसी दलित को दस जनपथ लाकर खाना नहीं खिला रहे हैं यह बात दीगर है कि दस जनपथ पर एक इफ्तार पार्टी पर ही लगभग एक करोड़ रूपया खर्च हो जाता है। क्या राहुल बाबा अपने इस दलित अभियान के तहत अगली यात्रा बिहार की करना पसंद करेंगे जहां वह दलित जाति ‘मुसहरों के टोले में रात गुजारें और उनके साथ भोजन करके यह जानने का प्रयास करेंगे कि यह लोग जिस भोजन (चूहे) को खाने की वजह से मुसहर नाम से जाने जाते हैं उसे और लोग क्यों नहीे खाते?
यह राहुल गांधी का दुर्भाग्य है कि जब वह गांव में गए तो उन्हें लोगों ने पहचाना ही नहीं और उन्हें बताना पड़ा कि वह राजीव गांधी के बेटे हैं। केवल यही एक घटना राहुल की सादगी की पोल पट्टी खोलने के लिए काफी है। क्या राजीव गांधी को कभी बताने की जरूरत पड़ी थी कि वह इंदिरा गांधी के बेटे हैं? या इंदिरा गांधी को कभी बताने की जरूरत पड़ी थी कि वह जवाहर लाल नेहरू की बेटी हैं? लेकिन राहुल गांधी को बताना पड़ रहा है कि वह राजीव गांधी के बेटे हैं।
राहुल अपने नाटक से कांग्रेस के लिए ही मुसीबतें खड़ी कर रहे हैं। अब अगर राहुल दलित इलाकों का विकास न होने के लिए कोस रहे हैं, तो किसको? इस देष पर पांच दषक तक कांग्रेस का षासन रहा। लिहाजा विकास न होने का दोश तो सबसे अधिक कांग्रेस के ही सिर पर है। फिर राहुल सवाल किससे कर रहे हैं?
रहा सवाल राहुल की सादगी का, अगर आज इंदिरा गांधी जीवित होतीं तो क्या कीतीं? मनोहर ष्याम जोषी ने इंदिरा गांधी का एक बार साक्षात्कार लिया था जब इंदिरा जी प्रधानमंत्री थीं। जोषी जी ने कांग्रेसी नेताओं की सादगी पर उनसे सवाल पूछा तो इंदिरा जी ने जबाव दिया-”यह सही है कि कांग्रेस को सादगी और जनसेवा की दिषा में नेतृत्व देना चाहिए लेकिन जो लोग यह समझते हैं कि बॅंगला छोड़कर झोपड़ी में जा बसना चाहिए नेताओं को, वह बात एक दिखावटी षगल सी मालूम होती है। कुछ सहूलियतें जरूरी होती हैं सरकारी कामकाज के लिए, सुरक्षा और गोपनीयता के भी कुछ तकाजे होते हैं। उनके पूरे किए जाने का मतलब षानो-षौकत नहीं है। हाॅं उससे अधिक कुछ होता तो वह ठीक नहीं।“ कुछ समझे राहुल बाबा! आपकी दादी स्व. इंदिरा जी आपकी सादगी को एक दिखावटी षगल बता रही हैं। इसलिए युवराज अब तो आम आदमी बनने का नाटक करके गरीबों की गरीबी का मजाक उड़ाना बन्द करो!!!
(लेखक राजनीतिक समीक्षक हैं और ‘दि संडे पोस्ट’ में सह संपादक हैं।)
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