ममता मीडिया की कारस्तानी और सरडीहा का सच
अमलेन्दु उपाध्याय
ममता मीडिया की कारस्तानी और सरडीहा का सच
अमलेन्दु उपाध्याय
पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले में सरडीहा के पास हुई रेल दुर्घटना के तुरंत बाद देश भर में मचे बवंडर ने एक बारगी यह सोचने को मजबूर कर दिया था कि क्या वास्तव में भारत के नक्सलवादी नरपिशाच हैं? दुर्घटना स्थल पर पहुंची रेल मंत्री ममता बनर्जी ने जिस बेशर्मी और बेहूदगी से इसके लिए नक्सलवादियों को जिम्मेदार ठहराते हुए अपनी और अपने विभाग के निकम्मेपन से पल्ला झाड़ा और हमारे लोकतंत्र के तथाकथित चैथे स्तंभ बड़े पूंजीपतियों के टुकड़ों पर पलने वाले राष्ट्रीय मीडिया ने जिस निर्लज्जता के साथ इस दुर्घटना को नक्सली हमला करार दिया उसने मीडिया, नक्सलवाद और लोकतंत्र में नैतिकता के प्रश्नों पर एकबारगी फिर सोचने पर मजबूर कर दिया है।
पहली बात तो नक्सलियों की ही की जाए। नक्सलवादियों के लाख दावे के बावजूद कि वह आम आदमी की लड़ाई लड़ रहे हैं, उनके हथियारबंद संघर्ष को जायज नहीं ठहराया जा सकता। सिर्फ इसलिए नहीं कि भारत में लोकतंत्र नाम की कोई चीज सुनाई पड़ती है। बल्कि इसलिए भी कि नक्सली जिस क्रांति की बात करते हैं वह क्रांति उनके इस तरह के रास्ते से नहीं आ सकती है। क्रांति की भूमिका के लिए जो तीन चार प्रमुख कारण बताए जाते है,ं उनमें से कई महत्वपूर्ण कारण अभी भारत में मौजूद नहीं हैं और जब तक यह कारण नहीं होंगे क्रांति सफल नहीं हो सकती है। क्रांति की अनिवार्य षर्त है कि देश के अंदर गृह युद्ध के हालात होने चाहिए और राजनीतिक उठापटक का माहौल होना चाहिए, किसी बाहरी देश के आक्रमण का खतरा हो और राजसत्ता लाचार हो। लेकिन भारत में इस तरह के कोई हालात अभी तो नहीं हैं। सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों की आर्थिक नीतियां एक सी हैं और उनमें नीतिगत कोई मतभेद नहीं है बल्कि दोनों एक ही हैं। वहीं देश के अंदर बड़ी तेजी से एक संस्कारविहीन, फर्जीवाड़े की अर्थव्यवस्था की कोख से एक ऐसा उच्च मध्य वर्ग पैदा हुआ है जो स्वयं को पढ़ा लिखा कहता तो है लेकिन है फूहड़। इस वर्ग को नरसिंहराव- मनमोहन- वाजपेयी की तिकड़ी ने फलने फूलने का अवसर दिया है। यह वर्ग राजसत्ता का हिमायती हेै और उसके हर जुल्म- औ- सितम का हिमायती है। ऐसे में गरीबों के हितों की खातिर की जाने वाली कोई भी सशस्त्र क्रांति फलीभूत नहीं हो सकती है।
तो क्या नक्सलियों को आम आदमी की लड़ाई लड़ना बंद कर देना चाहिए? बिल्कुल नहीं! लेकिन उन्हें अपना रास्ता बदल देना चाहिए। पहले आम जनता के बीच जाकर समझाएं कि वह करना क्या चाहते हैं और उनका आम आदमी से कोई बैर नहीं है और पूंजीवादी मीडिया उनके खिलाफ मिथ्या प्रचार कर रहा है। वरना यही होगा जो सरडीहा के मामले में मीडिया ने ममता बनर्जी के सहयोग से किया। ममता ने घटनास्थल पर जाकर कहा कि विस्फोट किया गया है। जबकि खुद गृह मंत्रालय और वित्त मंत्री इस आरोप से सहमत नहीं हैं। मीडिया में ही जो रिपोर्ट्स आईं उनके मुताबिक वहां पचास मीटर तक फिश प्लेट्स उखाड़ी गई थीं और मौके पर लगता था कि ट्रैक की कई घंटों से जांच नहीं की गई थी। लेकिन हमारे न्यूज चैनल्स ममता बनर्जी के बयान को ही ले उड़े। हर चैनल चिल्ला रहा था नक्सली हमले में 76 मरे, रेलवे पर लाल हमला। बताया गया कि घटनास्थल से नक्सली समर्थक पीसीपीए के पोस्टर मिले हैं जिसमें इस घटना की जिम्मेदारी ली गई है। लेकिन किसी भी समाचार वाचक ने यह रहस्य खोलने की जहमत नहीं उठाई कि पीसीपीए नक्सलवादी नहीं है, उसे सिर्फ नक्सलियों की हिमायत हासिल है। पीसीपीए मुखिया छत्रधर महतो बाकायदा तृणमूल कांग्रेस का पदाधिकारी था और पिछले विधानसभा चुनाव में पीसीपीए ने तृणमूल कांग्रेस को समर्थन दिया था। इस लिहाज से अगर यह पीसीपीए का काम है तब तो इसके लिए ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ही ज्यादा जिम्मेदार है। वैसे भी तृणमूल जब तब बंगाल में रेलवे ट्रैक पर हमला करती रहती है और फिश प्लेट्स उखाड़ने में उसे महारत हासिल है।
वैसे भी अभी तक की घटनाओं में जब भी नक्सलियों ने रेलवे को कोई नुकसान पहुंचाया है तो तत्काल नजदीक के केबिन और रेलवे स्टेषन को सूचना पहुंचाई है ताकि कोई दुर्घटना न हो। सवाल यह है कि क्या हमारा मीडिया सकलडीहा का ठीकरा नक्सलियों के सिर फोड़कर ममता बनर्जी को निर्दोष साबित करना चाहता है? क्या यह सही नहीं है कि मृतकों में से पचास से भी अधिक ने दुर्धटना के 48 घंटे बाद सरकारी अव्यवस्था के चलते दम तोड़ा है? क्या यह भी सही नहीं है कि राहत ट्रेन दुर्घटनास्थल पर दो धंटे बाद और क्रेन आठ घंटे बाद पहुंची? क्या यह भी सही नहीं है कि रेलवे के सभी बड़े अफसर दुर्घटना स्थल पर ममता बनर्जी के साथ ही अगले दिन पहुंचे ? क्या इसके लिए भी नक्सली ही जिम्मेदार हैं? कायदे से इस दुर्घटना के लिए ममता बनर्जी को ततकाल त्यागपत्र दे देना चाहिए और प्रधानमंत्री को भी चाहिए कि इस हादसे की जांच में ममता की लापरवाही और साजिष की भी निष्पक्ष जांच करवाएं। एक तरफ ममता का कहना है कि घटना स्थल पर फिश प्लेटें बैल्ड की गई थीं और पेंड्रोल क्लिप या फिश प्लेट उखाड़े जाने का कोई प्रश्न ही नहीं है जबकि हमारे मीडिया के साथी ही मौके से बता रहेे हैं कि फिश प्लेटें उखड़ी हुई थीं। फिश प्लेटें उखड़ना रेलवें के लिए कोई नई बात नहीं है। एक अखबार ने खुलासा किया है कि देश की राजधानी दिल्ली से बीस किलोमीटर दूर गाजियाबाद के रास्ते के ट्रैक पर वर्ष 2010 में ही पांच हजार फिश प्लेटें उखड़ी पाई गई हैं। इतना ही नहीं उखड़ी हुई फिश प्लेटों के ऊपर से राजधानी एक्सप्रेस गुजर जाने की भी खबरें पिछले दिनों आई थीं। जाहिर है दिल्ली में अभी नक्सली नहीं पहुंचे हैं ममता आपा!!
लगातार तीन दिन तक हमारे समाचारपत्रों ने सरडीहा की दुर्घटना पर तो दस बीस लाइनें ही लिखी होंगी लेकिन नक्सलियों पर कई कई पन्ने काले किए। हमारे बड़े पत्रकारों ने अपनी लेखनी का सारा कला कौशल नक्सलियो पर ही खर्च कर दिया। किसी ने लिखा- ‘नक्सलियों ने फिर ढाया कहर’, तो किसी ने लिख डाला- ‘ भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनते जा रहे नक्सलियों ने पं. बंगाल में ट्रेन को निशाना बनाकर 76 मुसाफिरों को मार डाला’। गोया भूख गरीबी अषिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे अब भारत के लिए चुनौती रहे ही नहीं बस नक्सली ही रह गए हैं।
वह तो गनीमत है कि कुछ दिन पहले ही एयर इंडिया का विमान मंगलौर में दुर्घटनाग्रस्त हुआ। कहीं इत्तेफाक से यह दंतेवाड़ा या मिदनापुर में दुर्घटनाग्रस्त हुआ होता तो हमारे मीडिया के धुरंधर इसका इलजाम भी नक्सलियों के सिर रखते। तमाषा यह है कि पूरे मीडिया ने नक्सलियों को दोष मढ़ने में तो कोई देरी नहीं की लेकिन भाकपा माओवादी के मयूरभंज-पूर्वी सिंहभूम बाॅर्डर एरियेा कमेटी के प्रवक्ता मंगल सिंह के इस बयान कि ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस के विस्फोट में भाकपा माओवादी का हाथ नहीं हैं ऐसी घटनाओं से आम आदमी के साथ साथ माओवादी संगठन को भी नुकसान होता है ऐसी स्थिति में उनका संगठन ऐसी घटना को क्यों अंजाम देगा, को एक दो अखबारों ने ही कहीं कोने में लगाया। मीडिया के शोर में मंगल सिंह की यह आवाज कि ‘हम आम आदमी के हित में उनके अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष करते हैं न कि उन्हें नुकसान पहुंचाने के लिए?’ दबकर रह गई।
सरडीहा दुर्घटना की एफआईआर में नक्सलवादियों का जिक्र न होने पर स्यापा करने वाले हमारे बड़े पत्रकार साथी क्या अपनी असली जिम्मेदारी पर भी ध्यान देंगे????
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सोमवार, 31 मई 2010
ममता मीडिया की कारस्तानी और सरडीहा का सच
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वेबसाइट संचालक अमलेन्दु उपाध्याय 30 वर्ष से अधिक अनुभव वाले वरिष्ठ पत्रकार और जाने माने राजनैतिक विश्लेषक हैं। वह पर्यावरण, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, युवा, खेल, कानून, स्वास्थ्य, समसामयिकी, राजनीति इत्यादि पर लिखते रहे हैं।
शनिवार, 20 मार्च 2010
महिलाएं जीतीं, लोकतंत्र हारा
महिलाएं जीतीं, लोकतंत्र हारा
अमलेन्दु उपाध्याय
महिला आरक्षण बिल को पास कराने के लिए कांग्रेस और प्रमुख विपक्षी दल भाजपा व वाम दलों ने जो तरीका अपनाया, उससे फासीवाद के आने की आहट सुनाई देने लगी है। राज्यसभा में यह बिल पास होने पर निश्चित रूप से महिलाएं तो जीती हैं, लेकिन लोकतंत्र हार गया है
राज्यसभा में महिला आरक्षण विधेयक पारित होने के बावजूद महिलाओं को विधायिका में तैंतीस प्रतिशत आरक्षण का तेरह साल पुराना ख्वाब सच होने से बहुत दूर है। जाहिर है यदि यह पारित हो जाता तो बिल महिला सशक्तिकरण की दिशा में चला गया एक कदम साबित हो सकता था। लेकिन किन महिलाओं का सषक्तिकरण? यह बहस का मुद्दा है। इस बिल को पास कराने के लिए जिस तरह से सत्तारूढ़ दल कांग्रेस और प्रमुख विपक्षी दलों भाजपा तथा वामपंथी दलों ने जो तरीका अपनाया उससे फासीवाद के आने की आहट सुनाई देने लगी है। राज्यसभा में यह बिल पास होने पर निश्चित रूप से महिलाएं तो जीती हैं लेकिन लोकतंत्र हारा है।
इस बिल पर सपा, राजद और जद-(यू) ने जो आपत्तियां उठायी हैं उन्हें थोथी महिला विरोधी हरकत कहकर नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। इस बात में कोई शक नहीं है कि इस बिल का लाभ सबसे ज्यादा सवर्ण महिलाएं और खासतौर पर कुछ परिवारों की ही महिलाएं उठाएंगी। इस बिल को लेकर समाजवादी धड़ा दलित, मुस्लिम और पिछड़ा विरोधी होने का जो आरोप लगा रहा है उसे नौ तथा दस मार्च के अखबारों की सुर्खियों जैसे ‘यादव ब्रिगेड के साथ ममता की खिचड़ी नहीं पक पाई’, ‘यादव ब्रिगेड ने रोका महिला विजय रथ’, और ‘यादव तिकड़ी ने नहीं चलने दी लोकसभा’ और तथाकथित नारीवादी महिलाओं की लालू- मुलायम के खिलाफ जातिवादी टिप्पणियों ने सही साबित कर दिया है। लगभग सभी समाचार चैनल्स पर समाचार वाचकों ( इन्हें पत्रकार समझने की भूल न की जाए ) की सपा और राजद को खलनायक साबित करतीं टिप्पणियां भी साबित कर रही थीं कि महिला आरक्षण की आड़ में पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के खिलाफ साजिश रची जा रही है।
जो सबसे बड़ा खतरा इस बिल के बहाने सामने आया है उससे लोकतंत्र की अवधारणा पर ही प्रश्नचिन्ह लग गया है। जब विपक्ष की मुख्य पार्टी भारतीय जनता पार्टी सत्तारूढ़ दल कांग्रेस से मिल जाए और तो और ‘लोकतांत्रिक, जनवादी धर्मनिरपेक्ष’ विकल्प चिल्लाने वाली माकपा और भाकपा भी कांग्रेस और भाजपा से मिल जाएं तो कैसा लोकतंत्र? फिर लोकतंत्र की अवधारणा अल्पसंख्यकों पर बहुमत का शासन नहीं है। लेकिन राज्यसभा में जो तरीका अपनाकर यह बिल पारित कराया गया उसने नारी सशक्तिकरण और लोकतंत्र दोनों पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया।
अगर कल कांग्रेस, भाजपा और वामदल इस बात पर सहमत हो जाएं कि अब इस मुल्क में चुनाव नहीं होंगे और बारी बारी से उनका प्रधानमंत्री बनता रहेगा तब क्या यह संविधान संषोधन भी मार्षलों की मदद से पारित करा दिया जाएगा और पूरा मुल्क लोकतंत्र के जनाजा निकलने का तमाषा देखता रहेगा? या भाजपा और कांग्रेस में आम सहमति बन जाए कि अब भारत को हिन्दू राश्ट्र बना दिया जाए तो क्या मार्षलों की मदद से भारत को हिन्दूराश्ट्र बनाने का सेविधान संषोधन भी पारित करा दिया जाएगा? यहां विरोध महिलाओं को राजनीति में स्थान मिलने का नहीं हो रहा है बल्कि इस बहाने जो फासीवाद उभर रहा है उसकी तरफ ध्यान दिलाया जा रहा है क्योंकि जरूरी नहीं कि हर बार फासीवाद धर्म का चोला ओढ़कर ही सामने आए।
मान लिया कि सदन के अंदर हंगामा करना संसदीय आचरण नहीं है। लेकिन क्या सरकार का इन दलों से बात न करने के रवैये और राज्यसभा में मार्शलों का प्रयोग करके बिल पारित कराने को भी उचित ठहराया जा सकता है? क्या यह सरकार का फासीवादी और तानाशाहीपूर्ण रवैया नहीं है?
सवाल यहां राज्यसभा के सभापति से भी हो सकते हैं। सभापति सिर्फ सरकार के सभापति नहीं हैं। वह पूरे सदन के सभापति हैं। अगर सदन में षोर षराबा हो रहा था तो उन्हें सदन के सामान्य होने का इंतजार करना चाहिए था न कि रूलिंग पार्टी की मांग पर विरोध करने वालों को सदन से बाहर करा देना चाहिए था?
एक निजी चैनल पर इस बिल की पैरोकार एक तथाकथित समाजसेविका तर्क दे रही थीं कि संविधान में धर्म के आधार पर आरक्षण का प्रावधान नहीं है इसलिए मुसलमानों को आरक्षण नहीं दिया जा सकता। यहां प्रतिप्रष्न यह है कि क्या संविधान में लिंग के आधार पर आरक्षण का प्रावधान है? सवाल यहां यह भी है कि जब संविधान बना था तब कहा गया गया था कि धर्म और लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा। लेकिन क्या यह बिल संविधान की उस मूल भावना के अनुसार है? दरअसल इस बिल की आड़ में कांग्रेस और भाजपा दोनों ही सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्रा आयोग की सिफारिषों को कूड़ेदान में डालने का शडयंत्र रच रही हैं।
याद होगा जब मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेष के मुख्यमंत्री थे उस समय उनकी सरकार ने महिलाओं में षिक्षा को बढ़ावा देने के लिए स्नातक तक लड़कियों की फीस माफ की थी और ‘कन्या विद्या धन योजना’ नाम की एक योजना प्रारम्भ की थी जिसमें इंटर में पढ़ने वाली गरीब लड़कियों को एक प्रोत्साहन राषि दी जानी थी। उस समय यही राहुल गांधी और उनकी कांग्रेस पार्टी और भारतीय जनता पार्टी चिल्ला रहे थे कि यह सरकारी धन की फिजूलखर्ची है और वोट खरीदने का एक तरीका है। यानी आम महिलाओं की षिक्षा और तरक्की के लिए अगर कोई योजना लागू की जाए तो वह फिजूलखर्ची और ब्यूटी पार्लर, बटरस्काॅच, एयरकंडीशनर और समाजसेवा का काॅकटेल बनाकर नारी अधिकारों की बातें करनी वाली तथाकथित समाजसेवी महिलाओं को विधायिका में आरक्षण दे दिया जाए तो वह प्रगतिषील कदम!
आज लोकसभा का चुनाव लड़ने पर लगभग पांच करोड़ रूपया खर्च होता है, ऐसे में क्या यह संभव है कि खेत में काम करने वाली मजदूर और घरों में चैका- बर्तन करने वाली आम महिला को इस बिल से कुछ लाभ होगा। हां उन महिलाओं का भला जरूर होगा जो तथाकथित रूप से प्रगतिषील हैं, फर्राटेदार अंग्रेजी बोलती हैं और हिंदी से नफरत करती हैं, जो वोट डालने इसलिए नहीं जातीं क्योंकि पोलिंग बूथ पर लाइन में लगना पड़ता है लेकिन टीवी स्क्रीन पर चटर- पटर राजनेताओं को गरियाकर अपने पढा लिखा होने का सबूत पेष करती हैं। इसलिए इस बिल के पास हो जाने से भी आम महिलाओं के जीवन पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
वेबसाइट संचालक अमलेन्दु उपाध्याय 30 वर्ष से अधिक अनुभव वाले वरिष्ठ पत्रकार और जाने माने राजनैतिक विश्लेषक हैं। वह पर्यावरण, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, युवा, खेल, कानून, स्वास्थ्य, समसामयिकी, राजनीति इत्यादि पर लिखते रहे हैं।
मंगलवार, 8 दिसंबर 2009
जिन्हें राष्ट्रपति ने गुण्डे कहा अखबार ने उन्हें शहीद कहा
जिन्हें राष्ट्रपति ने गुण्डे कहा अखबार ने उन्हें शहीद कहा
अमलेन्दु उपाधयाय
6 दिसंबर बीत गया लेकिन बहुत से जख्मों को कुरेद गया। अखबारों में छपी खबरों को देखकर यह साफ हो गया कि सांप्रदायिक ताकतों ने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर कब्जा कर लिया है।
याद होगा जब 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद शहीद की गई थी तब तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ शंकर दयाल शर्मा ने बाबरी मस्जिद गिराने वालों को 'गुण्डे' कहा था। लेकिन 6 दिसंबर 2009 के एक अखबार ने जो गांधी जी के समय से कांग्रेस समर्थित अखबार कहा जाता है, इन गुण्डों के लिए 'शहीद' शब्द का प्रयोग किया है। ऐसा तब है जब यही अखबार बाबरी मस्जिद शहीद किए जाने की निन्दा भी कर रहा है। बाबरी मस्जिद गिराने वाले गुण्डों को शहीद कहना इस देश पर मर मिटने वाले देशभक्त शहीदों का अपमान है।
वैसे तो लगभग हर अखबार ने बाबरी मस्जिद के लिए 'विवादित ढांचा' शब्द का प्रयोग किया है। मीडिया इस विषय में स्वयंभू जज बन गया है। सवाल यह है कि ढांचा विवादित कैसे हो गया? विवादित तो वह तथाकथित मंदिर है जिसने अपने निर्माण से पहले ही हजारों बेगुनाह इंसानों की बलि ले ली है और जहां बिना प्राण प्रतिष्ठा के मूर्तियों की पूजा होने लगी है।
अमलेन्दु उपाधयाय
6 दिसंबर बीत गया लेकिन बहुत से जख्मों को कुरेद गया। अखबारों में छपी खबरों को देखकर यह साफ हो गया कि सांप्रदायिक ताकतों ने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर कब्जा कर लिया है।
याद होगा जब 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद शहीद की गई थी तब तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ शंकर दयाल शर्मा ने बाबरी मस्जिद गिराने वालों को 'गुण्डे' कहा था। लेकिन 6 दिसंबर 2009 के एक अखबार ने जो गांधी जी के समय से कांग्रेस समर्थित अखबार कहा जाता है, इन गुण्डों के लिए 'शहीद' शब्द का प्रयोग किया है। ऐसा तब है जब यही अखबार बाबरी मस्जिद शहीद किए जाने की निन्दा भी कर रहा है। बाबरी मस्जिद गिराने वाले गुण्डों को शहीद कहना इस देश पर मर मिटने वाले देशभक्त शहीदों का अपमान है।
वैसे तो लगभग हर अखबार ने बाबरी मस्जिद के लिए 'विवादित ढांचा' शब्द का प्रयोग किया है। मीडिया इस विषय में स्वयंभू जज बन गया है। सवाल यह है कि ढांचा विवादित कैसे हो गया? विवादित तो वह तथाकथित मंदिर है जिसने अपने निर्माण से पहले ही हजारों बेगुनाह इंसानों की बलि ले ली है और जहां बिना प्राण प्रतिष्ठा के मूर्तियों की पूजा होने लगी है।
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