परेशान क्यों हैं राज्य मंत्री
अमलेन्दु उपाध्याय
हाल ही में प््राधानमंत्री के साथ एक भेंट में मंत्रिपरिशद के कुछ राज्य मंत्रियों ने षिकायत की कि तवज्जो नहीं मिलती है और केबिनेट मंत्री भाव नहीं देते हैं। इन राज्यमंत्रियों का का दर्द उभर कर सामने आया उनका कहना था कि वह लगभग बेरोजगार हैं और उनके पास फाइलें ही नहीं आती हैं। यह एक संगीन मामला है और दर्षाता है कि जब राज्यमंत्रियों का यह हाल है तब एक आम संासद की क्या स्थिति होगी? जाहिर है इस अप्रिय स्थिति के लिए स्वयं प्रधानमंत्री और उनके केबिनेट सहयोगी भी दोशी हैं। लेकिन यह तस्वीर का एकपक्षीय पहलू ही है और उस चष्मे से देखा गया अर्धसत्य है जिस पर राज्यमंत्रियों के षीषे चढ़े हुए हैं। तस्वीर का दूसरा पहलू भी है और यह पहलू इन राज्यमंत्रियों की दलील को अगर झुठलाता नहीं है तो कम से कम इस दलील पर सवाल तो उठाता ही है।
पहला सवाल यही है कि क्या केवल फाइल निपटाने से ही मंत्री जी का काम हो जाता है? फाइलें निपटाने के अलावा मंत्रियों के पास और कोई काम नहीं होता? फिर तो बहुत से ऐसे केबिनेट मंत्री भी हैं जिनके पास फाइलें कम ही होती हैं। क्या इसका तात्पर्य यह है कि उन मंत्रियों के पास काम नहीं है? जबकि कई मंत्री ऐसे भी हैं जिनके पास फाइलें तो कम ही होती हैं लेकिन महीनों वह फाइलें देख ही नहीं पाते। आखिर काम होने का पैमाना क्या है?
अभी ज्यादा समय नहीं बीता होगा जब गृह मंत्री पी चिदंबरम ने कहा था कि उनके ऊपर काम का इतना बोझ है कि उनके विभाग को दो हिस्सों में बांट देना चाहिए। ऐसे में क्या देष का आम आदमी यह जानता है कि चिदंबरम के अलावा गृह विभाग में राज्यमंत्री भी होते हैं? फिर इस स्थिति के लिए कौन दोशी है? क्या चिदंबरम भी अपने राज्यमंत्रियों को काम नहीं देते हैं। इसी तरह बहुत से सांसद ऐसे हैं जो मंत्री तो नहीं हैं लेकिन उनकी बात गम्भीरता से सुनी जाती है और सरकार तथा नौकरषाही को उनकी बात पर गौर करने की मजबूरी होती है। यह उन सांसदों की योग्यता की वजह से है। सरकार की बात छोड़ भी दीजिए तो विपक्ष में ही कई ऐसे सांसद ऐसे हैं जिनकी अपनी एक पहचान और आवाज है जबकि वह कभी मंत्री नहीं रहे। नीलोत्पल बसु, वृन्दा कारत, गुरदासदास गुप्ता, कलराज मिश्रा, दिग्विजय सिंह ऐसे ही सांसद हैं। स्वयं कांग्रेस में मनीश तिवारी, मीनाक्षी नटराजन और अषोक तंवर कुछ ऐसे नाम हैं जिनकी अपनी एक पहचान है और उनके पास काम की भी कोई कमी नहीं है क्योंकि वह अपने क्षेत्र में काम करते हैं और जनता के बीच रहते हैं। इसी तरह राज्यमंत्रियों में सीपी जोषी, जितिन प्रसाद को काम न होने के लिए रोना नहीं पड़ता।
इस बात को दो तीन उदाहरणों से समझा जा सकता है। मरहूम राजेष पायलट आन्तरिक सुरक्षा राज्य मंत्री थे। लेकिन षायद अपने समकालीन केबिनेट मंत्रियों से ज्यादा व्यस्त भी थे और उनकी देष में एक वाॅइस भी थी। पिछली यूपीए-वन सरकार में भी श्रीप्रकाष जायसवाल भी राज्यमंत्री ही थे लेकिन उन्होंने अपनी पहचान बनाई। जबकि लालकृश्ण अडवाणी के साथ आईडी स्वामी राज्यमंत्री थे उन्होंने भी अपनी पहचान बनाई। इन सभी के पास काम होने में उनके केबिनेट मंत्रियों का कोई रोल नहीं था।
अब अगर इन राज्यमंत्रियों का ‘काम’ से तात्पर्य ठेके, परमिट, कोटा लाइसेंस देने से है तब तो उनका दुखड़ा जायज हो सकता है कि केबिनेट मंत्री सारी मलाई खुद मार लेते हैं और उन्हें ( राज्यमंत्रियों ) कोई नहीं पूछता। तब तो वाकई प्रधानमंत्री को मलाई का सही अनुपात में बंटवारा करने की व्यवस्था करनी चाहिए।
इन राज्यमंत्रियों के एक दर्द से बिना किसी किंतु परंतु के सहमत हुआ जा सकता है कि राज्यमंत्रियों की बात को अधिकारी नहीं सुनते। लेकिन यह समस्या भी केवल राज्यमंत्रियों के साथ नहीं है। बल्कि इस मुल्क में अफसरषाही बहुत ताकतवर और बेलगाम है। अफसर केवल उस केबिनेट मंत्री की ही बात सुनते हैं जो या तो स्वयं तेज हो और सौ फीसदी राजनीतिज्ञ हो या फिर प्रधानमंत्री का नजदीकी हो और उनका कुछ बिगाड़ने की हैसियत रखता हो। वरना मंत्री जी खुद अपनी फाइलें ढूंढते रह जाते हैं और फाइलें सरकारी चाल से ही चलती हैं। इस स्थिति के लिए भी केवल अधिकारियों को दोशी नहीं ठहराया जा सकता। कारण बहुत साफ है। जब संसद में तीन सौ करोड़पति सांसद पहुंच गए तो जाहिर है कि यह तीन सौ सांसद व्यापारी पहले हैं और राजनीति इनके लिए दोयम दर्जे का काम है। ऐसे में क्या उम्मीद की जा सकती है कि अधिकारी इन सांसदों और ऐसे मंत्रियों की बात सुनेंगे? इसलिए बेहतर होगा कि यह राज्यमंत्रीगण अपना दुखड़ा राने के बजाए अपनी बात में असर पैदा करें और यह असर तभी पैदा होगा जब वह सौ फीसदी राजनीतिज्ञ बनेंगे वर्ना चाहे राज्यमंत्री बन जाएं या केबिनेट यह दुख दूर नहीं होगा।
शनिवार, 23 जनवरी 2010
परेशान क्यों हैं राज्य मंत्री
Labels:
रिपोर्ट
वेबसाइट संचालक अमलेन्दु उपाध्याय 30 वर्ष से अधिक अनुभव वाले वरिष्ठ पत्रकार और जाने माने राजनैतिक विश्लेषक हैं। वह पर्यावरण, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, युवा, खेल, कानून, स्वास्थ्य, समसामयिकी, राजनीति इत्यादि पर लिखते रहे हैं।
बुधवार, 13 जनवरी 2010
अब किसी और रूचिका के साथ न हो
इस लडाई की शुरूआत होती है एक अकेले इंसान के बूते। फिर उसके साथ बेशुमार लोगों का कारवां जुडता जाता है और मंजिल करीब नजर आने लगती है।
रूचिका गिरहोत्रा यौन उत्पीडन मामले में कुछ ऎसा ही हुआ, जब उसकी सखी आराधना प्रकाश गुप्ता ने उठाया पहला कदम और आज 19 साल बाद नतीजा सामने आता नजर आ रहा है। एक ऎसा केस, जो सीआरपीसी में संशोधन की वजह बना। पूरा देश 32 साल की आराधना की हौसला अफजाई कर रहा है और कह रहा है- 'आराधना हम तुम्हारे साथ हैं!'
बेशक यह लडाई मैं इसलिए लड रही हूं क्योंकि रूचिका मेरी अंतरंग सहेली थी लेकिन यह लडाई लडने के पीछे जज्बा यह है कि जिस नाइंसाफी को मैंने और रूचिका ने सहा है और जो ज्यादतियां हमने सहीं, वैसा अब किसी और रूचिका के साथ नहीं हो। आज स्थिति यह है कि किसी बच्चे के साथ कोई अन्याय या यौन उत्पीडन होता है तो लोग पुलिस के पास जाने से डरते हैं। मैं चाहती हूं कि सिस्टम बदले और ऎसी घिनौनी हरकतें करने वाले समझ जाएं कि उनके लिए कानून एक बराबर है और पुलिस भी लोगों को अपनी सहायक मालूम पडे न कि लोगों में पुलिस का ही खौफ हो। आज मेरी लडाई किसी एक व्यक्ति विशेष के ही खिलाफ नहीं है। आज लोगों का न्याय व्यवस्था से विश्वास उठने लगा है। उन्हें लगता है कि ताकतवर के लिए मुल्क में कानून अलग है और कमजोर के लिए अलग। लेकिन रूचिका के मामले में न्याय की उम्मीद बढने से लोगों का भरोसा बहाल होगा।
ऎसा नहीं है कि ऎसी ज्यादतियों की शिकार केवल लडकियां ही होती हैं। कई बार छोटे बच्चे, लडके और लडकी दोनों ही ऎसी वारदातों में शिकार होते हैं। मैं चाहती हूं कि ऎसा समाज बने और लोग इतने जागरूक हो जाएं कि राठौड जैसा कोई भी अपराधी ऎसी नीच हरकत करने का दुस्साहस न कर सके। यदि ऎसी सोसायटी बन पाती है, यह सिस्टम अपने में बदलाव ला पाता है तभी मेरी लडाई सार्थक होगी और रूचिका को भी सही मायनों में न्याय मिल सकेगा, जब कोई और रूचिका किसी और राठौड का शिकार न बने।
मैं रूचिका की लडाई को आखिरी मुकाम तक ले जाऊंगी और देश में जहां भी ऎसे कोई मामले सामने आएंगे, पूरी शिद्दत के साथ उस लडाई में शामिल होऊंगी।
मैं और रूचिका बचपन से ही पक्के दोस्त थे। हमारी मुलाकात भी इत्तफाक से हुई और फिर हमें लगने लगा जैसे हम सगी बहनेे ही हैं। बात 1989 की है। सेक्टर-6 के मार्केट में मेरी पहली मुलाकात रूचिका से हुई थी। इसके एक साल पहले ही 1988 में उसकी मां का देहांत हो गया था। मेरे माता-पिता (आनंद प्रकाश और मधु) रूचिका को भी मेरी तरह ही स्नेह करते थे और वह भी मेरे माता-पिता से अपना दुख-दर्द बेहिचक कहती थी। वह मेरी मां को ही अपनी मां समझती थी। रूचिका बहुत ही हंसमुख, चंचल और बहादुर लडकी थी। वह हर पल को परिवार के साथ मिल-बांटकर जीना चाहती थी। वह कहा करती थी कि हम दोनों की दोस्ती अटूट है। मैं और रूचिका एक दूसरे का हाथ पकडकर फिल्म 'शोले' का गाना गाते थे- 'ये दोस्ती हम नहीं तोडेंगे/ तोडेंगे दम मगर तेरा साथ ना छोडेंगे।' उसे यह गाना बहुत प्यारा लगता था। लेकिन मुझे क्या मालूम था कि एक दिन वह मुझे यूं अकेला छोडकर दुनिया से चली जाएगी। उसे टेनिस का बहुत शौक था और वह एक सफल और बडी टेनिस खिलाडी बनना चाहती थी। वह अगर आज जीवित होती तो निश्चित रू प से शीर्ष टेनिस खिलाडी होती। मुझे याद है कि जब हम टेनिस खेलते थे, तो राठौड रोज हमें घंटों खेलते हुए देखता था। लंबे स्कर्ट पहनने के लिए वह हमें फटकारता था। इसलिए हमें अपने लंबे स्कर्टों को मोडना पडता था।
आज रूचिका नहीं है, लेकिन मेरी यादों में वह हरदम जिंदा है। रह-रह कर उसकी बहुत-सी बातें याद आती हैं और लगता है जैसे वह मुझसे बात कर रही है और मेरे सामने है। मुझे अच्छी तरह याद है कि मैं नवीं कक्षा में थी और वह दसवीं में। लगभग हर स्कूल में जूनियर छात्र अपने सीनियर्स को फेयरवेल पार्टी दिया करते थे। मैंने भी ऎसी ही एक पार्टी में हिस्सा लिया। तब एक बडी बहन की तरह रूचिका ने मेरा मेकअप किया और मेरा हेयर स्टाइल भी बिलकुल अपने जैसा बनाया। पार्टी में मेरे हेयर स्टाइल को देखकर हमारी सभी सहपाठियों ने कहा कि हम बिलकुल बहनें लग रही हैं।
शायद मेरे उससे गहरे जुडाव के कारण ही मुझे शक्ति मिली और मैं 19 साल तक उसके गुनहगार को सजा दिलाने के लिए संघर्ष करती रही। इस लडाई में मेरी मां और मेरे पापा ने पूरा साथ दिया। यहां तक कि हमें भी राठौड के लोगों ने प्रताडित किया। रूचिका तो बिलकुल टूट ही गई थी। उसने इस सिस्टम से हार मान ली थी। उसे यकीन नहीं रह गया था कि यह सिस्टम उसके साथ कोई इंसाफ कर पाएगा। उसके भाई आशु को भी राठौड के इशारे पर प्रताडित किया गया और उस पर झूठे मुकदमे लाद दिए गए। कई दिन तक अवैध पुलिस हिरासत में मारपीट की गई, तब तो वह बिलकुल ही टूट गई और उसने इंसाफ की उम्मीद छोडकर आत्महत्या का रास्ता चुना। रूचिका की मौत ने मुझमें हौसला ला दिया। मैं जानती थी कि यह सिस्टम वैसे भी पुरूष प्रधान है। लेकिन मुझे उम्मीद थी कि एक दिन उसे इंसाफ जरूर मिलेगा। देर हो सकती है लेकिन जिस दिन जनता जागेगी, यह सिस्टम सुधर जाएगा। मुझे इस देश की न्यायपालिका पर पूरा भरोसा था और आज भी है, इसलिए मैं रूचिका की लडाई को आगे बढा पाई। मुझे लोग बधाई दे रहे हैं कि मेरे जज्बे के कारण सरकार ने सीआरपीसी में संशोधन किया। ऎसे मामलों की सुनवाई का समय निर्धारित किया तथा हर शिकायत पर एफआईआर दर्ज करना जरू री कर दिया। लेकिन मैं तो यही कहूंगी कि कानून बदल देने से ही सिस्टम नहीं सुधर जाएगा बल्कि जब तक सत्ता और प्रशासन में बैठे लोगों की नीयत नहीं बदलेगी, तब तक कुछ नहीं होने वाला।
इतना जरू र जानती हूं कि समाज में कुछ लोग ऎसे भी होते हैं जो पावर और पैसे के साथ चलते हैं। हरियाणा की मौजूदा सरकार जैसा काम कर रही है उससे तो यही लग रहा है कि फिर राठौड को बचाने का काम किया जा रहा है और यह किसके इशारे पर या दबाव में किया जा रहा है, यह सरकार ही जाने। लेकिन इस सबके बावजूद मुझे और मेरे परिवार को न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है, इस जंग में जीत हमारे भरोसे की ही होगी।
न्याय की नैया पर भारी जन आक्रोश
19
साल बाद रूचिका मामले में आईजी शंभू प्रताप सिंह राठौड को मात्र छह महीेने की कैद और 1000 रूपए जुर्माने की सजा मिली। आखिरकार बढते विरोध को देखते हुए राठौड का पुलिस पदक वापस लेने की कवायद भी की गई। अब दोषी पाए जाने वाले पुलिस अधिकारियों के पदक निरस्त हो जाने की व्यवस्था लागू कर दी गई है।
1999
जेसिका लाल को गोली मारने वाले हरियाणा के कांग्रेसी नेता के बेटे मनु शर्मा को 2006 में आजीवन कारवास की सजा सुनाई।
1996
लॉ स्टूडेंट प्रियदर्शिनी मट्टू से बलात्कार करने वाले संतोष कुमार सिंह को 2000 में हत्या और बलात्कार का दोषी ठहराया गया।
अमलेंदु उपाध्याय
से बातचीत पर आधारित
साभार राजस्थान पत्रिका १३ जनवरी 2010
रूचिका गिरहोत्रा यौन उत्पीडन मामले में कुछ ऎसा ही हुआ, जब उसकी सखी आराधना प्रकाश गुप्ता ने उठाया पहला कदम और आज 19 साल बाद नतीजा सामने आता नजर आ रहा है। एक ऎसा केस, जो सीआरपीसी में संशोधन की वजह बना। पूरा देश 32 साल की आराधना की हौसला अफजाई कर रहा है और कह रहा है- 'आराधना हम तुम्हारे साथ हैं!'
इस लडाई की शुरूआत होती है एक अकेले इंसान के बूते। फिर उसके साथ बेशुमार लोगों का कारवां जुडता जाता है और मंजिल करीब नजर आने लगती है।
बेशक यह लडाई मैं इसलिए लड रही हूं क्योंकि रूचिका मेरी अंतरंग सहेली थी लेकिन यह लडाई लडने के पीछे जज्बा यह है कि जिस नाइंसाफी को मैंने और रूचिका ने सहा है और जो ज्यादतियां हमने सहीं, वैसा अब किसी और रूचिका के साथ नहीं हो। आज स्थिति यह है कि किसी बच्चे के साथ कोई अन्याय या यौन उत्पीडन होता है तो लोग पुलिस के पास जाने से डरते हैं। मैं चाहती हूं कि सिस्टम बदले और ऎसी घिनौनी हरकतें करने वाले समझ जाएं कि उनके लिए कानून एक बराबर है और पुलिस भी लोगों को अपनी सहायक मालूम पडे न कि लोगों में पुलिस का ही खौफ हो। आज मेरी लडाई किसी एक व्यक्ति विशेष के ही खिलाफ नहीं है। आज लोगों का न्याय व्यवस्था से विश्वास उठने लगा है। उन्हें लगता है कि ताकतवर के लिए मुल्क में कानून अलग है और कमजोर के लिए अलग। लेकिन रूचिका के मामले में न्याय की उम्मीद बढने से लोगों का भरोसा बहाल होगा।
ऎसा नहीं है कि ऎसी ज्यादतियों की शिकार केवल लडकियां ही होती हैं। कई बार छोटे बच्चे, लडके और लडकी दोनों ही ऎसी वारदातों में शिकार होते हैं। मैं चाहती हूं कि ऎसा समाज बने और लोग इतने जागरूक हो जाएं कि राठौड जैसा कोई भी अपराधी ऎसी नीच हरकत करने का दुस्साहस न कर सके। यदि ऎसी सोसायटी बन पाती है, यह सिस्टम अपने में बदलाव ला पाता है तभी मेरी लडाई सार्थक होगी और रूचिका को भी सही मायनों में न्याय मिल सकेगा, जब कोई और रूचिका किसी और राठौड का शिकार न बने।
मैं रूचिका की लडाई को आखिरी मुकाम तक ले जाऊंगी और देश में जहां भी ऎसे कोई मामले सामने आएंगे, पूरी शिद्दत के साथ उस लडाई में शामिल होऊंगी।
मैं और रूचिका बचपन से ही पक्के दोस्त थे। हमारी मुलाकात भी इत्तफाक से हुई और फिर हमें लगने लगा जैसे हम सगी बहनेे ही हैं। बात 1989 की है। सेक्टर-6 के मार्केट में मेरी पहली मुलाकात रूचिका से हुई थी। इसके एक साल पहले ही 1988 में उसकी मां का देहांत हो गया था। मेरे माता-पिता (आनंद प्रकाश और मधु) रूचिका को भी मेरी तरह ही स्नेह करते थे और वह भी मेरे माता-पिता से अपना दुख-दर्द बेहिचक कहती थी। वह मेरी मां को ही अपनी मां समझती थी। रूचिका बहुत ही हंसमुख, चंचल और बहादुर लडकी थी। वह हर पल को परिवार के साथ मिल-बांटकर जीना चाहती थी। वह कहा करती थी कि हम दोनों की दोस्ती अटूट है। मैं और रूचिका एक दूसरे का हाथ पकडकर फिल्म 'शोले' का गाना गाते थे- 'ये दोस्ती हम नहीं तोडेंगे/ तोडेंगे दम मगर तेरा साथ ना छोडेंगे।' उसे यह गाना बहुत प्यारा लगता था। लेकिन मुझे क्या मालूम था कि एक दिन वह मुझे यूं अकेला छोडकर दुनिया से चली जाएगी। उसे टेनिस का बहुत शौक था और वह एक सफल और बडी टेनिस खिलाडी बनना चाहती थी। वह अगर आज जीवित होती तो निश्चित रू प से शीर्ष टेनिस खिलाडी होती। मुझे याद है कि जब हम टेनिस खेलते थे, तो राठौड रोज हमें घंटों खेलते हुए देखता था। लंबे स्कर्ट पहनने के लिए वह हमें फटकारता था। इसलिए हमें अपने लंबे स्कर्टों को मोडना पडता था।
आज रूचिका नहीं है, लेकिन मेरी यादों में वह हरदम जिंदा है। रह-रह कर उसकी बहुत-सी बातें याद आती हैं और लगता है जैसे वह मुझसे बात कर रही है और मेरे सामने है। मुझे अच्छी तरह याद है कि मैं नवीं कक्षा में थी और वह दसवीं में। लगभग हर स्कूल में जूनियर छात्र अपने सीनियर्स को फेयरवेल पार्टी दिया करते थे। मैंने भी ऎसी ही एक पार्टी में हिस्सा लिया। तब एक बडी बहन की तरह रूचिका ने मेरा मेकअप किया और मेरा हेयर स्टाइल भी बिलकुल अपने जैसा बनाया। पार्टी में मेरे हेयर स्टाइल को देखकर हमारी सभी सहपाठियों ने कहा कि हम बिलकुल बहनें लग रही हैं।
शायद मेरे उससे गहरे जुडाव के कारण ही मुझे शक्ति मिली और मैं 19 साल तक उसके गुनहगार को सजा दिलाने के लिए संघर्ष करती रही। इस लडाई में मेरी मां और मेरे पापा ने पूरा साथ दिया। यहां तक कि हमें भी राठौड के लोगों ने प्रताडित किया। रूचिका तो बिलकुल टूट ही गई थी। उसने इस सिस्टम से हार मान ली थी। उसे यकीन नहीं रह गया था कि यह सिस्टम उसके साथ कोई इंसाफ कर पाएगा। उसके भाई आशु को भी राठौड के इशारे पर प्रताडित किया गया और उस पर झूठे मुकदमे लाद दिए गए। कई दिन तक अवैध पुलिस हिरासत में मारपीट की गई, तब तो वह बिलकुल ही टूट गई और उसने इंसाफ की उम्मीद छोडकर आत्महत्या का रास्ता चुना। रूचिका की मौत ने मुझमें हौसला ला दिया। मैं जानती थी कि यह सिस्टम वैसे भी पुरूष प्रधान है। लेकिन मुझे उम्मीद थी कि एक दिन उसे इंसाफ जरूर मिलेगा। देर हो सकती है लेकिन जिस दिन जनता जागेगी, यह सिस्टम सुधर जाएगा। मुझे इस देश की न्यायपालिका पर पूरा भरोसा था और आज भी है, इसलिए मैं रूचिका की लडाई को आगे बढा पाई। मुझे लोग बधाई दे रहे हैं कि मेरे जज्बे के कारण सरकार ने सीआरपीसी में संशोधन किया। ऎसे मामलों की सुनवाई का समय निर्धारित किया तथा हर शिकायत पर एफआईआर दर्ज करना जरू री कर दिया। लेकिन मैं तो यही कहूंगी कि कानून बदल देने से ही सिस्टम नहीं सुधर जाएगा बल्कि जब तक सत्ता और प्रशासन में बैठे लोगों की नीयत नहीं बदलेगी, तब तक कुछ नहीं होने वाला।
इतना जरू र जानती हूं कि समाज में कुछ लोग ऎसे भी होते हैं जो पावर और पैसे के साथ चलते हैं। हरियाणा की मौजूदा सरकार जैसा काम कर रही है उससे तो यही लग रहा है कि फिर राठौड को बचाने का काम किया जा रहा है और यह किसके इशारे पर या दबाव में किया जा रहा है, यह सरकार ही जाने। लेकिन इस सबके बावजूद मुझे और मेरे परिवार को न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है, इस जंग में जीत हमारे भरोसे की ही होगी।
न्याय की नैया पर भारी जन आक्रोश
19
साल बाद रूचिका मामले में आईजी शंभू प्रताप सिंह राठौड को मात्र छह महीेने की कैद और 1000 रूपए जुर्माने की सजा मिली। आखिरकार बढते विरोध को देखते हुए राठौड का पुलिस पदक वापस लेने की कवायद भी की गई। अब दोषी पाए जाने वाले पुलिस अधिकारियों के पदक निरस्त हो जाने की व्यवस्था लागू कर दी गई है।
1999
जेसिका लाल को गोली मारने वाले हरियाणा के कांग्रेसी नेता के बेटे मनु शर्मा को 2006 में आजीवन कारवास की सजा सुनाई।
1996
लॉ स्टूडेंट प्रियदर्शिनी मट्टू से बलात्कार करने वाले संतोष कुमार सिंह को 2000 में हत्या और बलात्कार का दोषी ठहराया गया।
अमलेंदु उपाध्याय
से बातचीत पर आधारित
साभार राजस्थान पत्रिका १३ जनवरी 2010
Labels:
report
वेबसाइट संचालक अमलेन्दु उपाध्याय 30 वर्ष से अधिक अनुभव वाले वरिष्ठ पत्रकार और जाने माने राजनैतिक विश्लेषक हैं। वह पर्यावरण, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, युवा, खेल, कानून, स्वास्थ्य, समसामयिकी, राजनीति इत्यादि पर लिखते रहे हैं।
सोमवार, 4 जनवरी 2010
गुरूजी जी को ही दोश क्यों?
गुरूजी जी को ही दोश क्यों?
अमलेन्दु उपाधयाय
आखिरकार गुरूजी का झारखण्ड का मुख्यमंत्री बनने का सपना साकार हो ही गया। भारतीय जनता पार्टी के सहयोग से गुरूजी तीसरी बार और मुकम्मल तौर पर पहली बार झारखण्ड के मुख्यमंत्री बने हैं। हालांकि भाजपा के सामने समस्या यह थी कि वह उन गुरूजी को कैसे समर्थन दे दे जिनके ऊपर वह कुल जमा चार रोज पहले ही भ्रश्टाचार के आरोप लगा रही थी और उसने गुरूजी को केन्द्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने के लिए मजबूर कर दिया था और कई दिन संसद नहीं चलने दी थी।
हालांकि भाजपा ने मन मसोसकर और कलेजे पर पत्थर रखकर गुरूजी को समर्थन दिया है, क्योंकि इसके अलावा न भजपा के पास कोई विकल्प था और न गुरू जी के सामने अपनी जिद पूरी करने के लिए कोई अन्य विकल्प बचा था। भाजपा की मजबूरी यह थी कि वह जानती थी कि अगर उसने गुरूजी को समर्थन देने में जरा भी देर की तो कांग्रेस उसका फायदा उठाकर प्रदेष में राश्ट्रपति षासन लागू कर सकती थी और फिर जिस तरह का खेल उसने हरियाणा में अभी निर्दलीयों विधाायकों की मदद लेकर और भजनलाल के बेटे कुलदीप बिष्नोई की हरियाणा जनहित कांग्रेस को तोड़कर खेला था, वैसा ही खेल वह झारखण्ड में भी खेल सकती थी। इसलिए भाजपा ने गुरूजी को समर्थन देकर उन पर कोई उपकार नहीं किया है बल्कि उसने कांग्रेस के दांव का काट करने के लिए ही गुरूजी को समर्थन दिया है।
अब कांग्रेस भी गुरूजी को भ्रश्टाचारी बता रही है। लेकिन सवाल यह है कि गुरूजी तब भ्रश्टाचारी नहीं थे जब मनमोहन सिंह की कुर्सी बचाने के लिए यूपीए को समर्थन दे रहे थे और न तब भ्रश्टाचारी थे जब अभी चार रोज पहले तक कांग्रेस उनसे सौदेबाजी कर रही थी। फिर आज गुरूजी कैसे भ्रश्टाचारी हो गए? कांग्रेस को भी अफसोस गुरूजी के मुख्यमंत्री बनने का कम और भाजपा के समर्थन पाकर उनके सत्ताा संभालने का ज्यादा है। वैसे भी ईमानदारी की बात यह है कि झाारखण्ड की जनता ने गुरूजी को ही सही मायनो में जनादेष दिया है। भाजपा लोकसभा चुनाव के बाद जिस गरूर में थी उसे जनता ने तोड़ दिया। उसका जद यू के साथ गठजोड़ और भ्रश्टाचार के खिलाफ विधावा विलाप जनता को रास नहीं आया। कांग्रेस को भी जनता ने करारा जवाब दिया। उसकी राश्ट्रपति षासन बढ़ाकर मधाु कोड़ा और कई अन्य पूर्व मन्त्रियों को भ्रश्टाचार के आरोप में जेल भेजे जाने के तुरूप के पत्तो को भी जनता ने फेल कर दिया। लेकिन गुरू जी के संकट के समय जनता ने उनका साथ दिया।
देखा जाए तो कांग्रेस ने तो गुरू जी के साथ घोर अन्याय किया और अभी भी उसकी चाल गुरू जी को कमान न सौंपकर स्वयं गद्दी हथियाने की ही थी। याद होगा कि कांग्रेस के छल के बाद गुरूजी के ऊपर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा था। गुरू जी ने थोड़े समय के अन्तराल पर ही अपने सगे छोटे भाई और बेटे को खोया। तब गुरू जी ने भाव विह्वल होकर कहा था कि यह उनका खराब समय है उन्होंने सत्ताा भी गंवा दी और भाई भी खो दिया। लेकिन कांग्रेस ने उन गुरूजी की पीठ में छुरा भोंका जिन गुरूजी ने मनमोहन सिंह के गुरू नरसिंहाराव और खुद मनमोहन सिंह की सरकार बचाई थी। फिर कांग्रेस को गुरू जी से किसी भी तरह के गिले षिकवे का नैतिक अधिाकार नहीं है।
जहां तक भाजपा का सवाल है तो उसके लिए भी भ्रश्टाचार का मसला कोई मायने नहीं रखता है। क्योंकि वहां भी बंगारू लक्ष्मण, साक्षी महाराज और डॉ छत्रपाल जैसों की पुरानी परंपरा है। इससे पहले भी जब उसका जनसंघी अवतार था तब भी वीरेन्द्र कुमार सखलेचा जैसे पवित्र लोग उसका नाम रोषन करते रहे हैं। उसके परम प्रिय जॉर्ज फर्नांडीज और जया जेटली को लोगों ने देखा ही। फिर कैसा भ्रश्टाचार। भाजपा भी जानती है कि सिध्दान्त की बातें तभी तक ठहक हैं जब तक सत्ताा न मिले। वह भी राजनीतिक दल है और उसे भी सत्ताा चाहिए। वह कोई साधाु सन्तों की संगत तो है नहीं और जो दस बीस साधाु टाइप के गेरूआवस्त्रधाारी उसकी फौज में षामिल हैं वह भी सत्ताा का स्वाद चखने के लिए ही संन्यास छोड़कर राजनीति में आए हैं। इसलिए सबने अपनी अपनी मजबूरी में दांव चले हैं और जिस प्रदेष का मुख्यमंत्री एक लेबर कांट्रैक्टर और निर्दलीय विधाायक मधाु कोड़ा बन सकता है उस राज्य का मुख्यमंत्री बनने का पहला नैतिक अधिाकार तो उन गुरूजी का ही बनता है जिन्होंने अपना पूरा जीवन झारखण्ड राज्य के गठन के लिए लगा दिया। रहा सवाल भ्रश्टाचार के आरोपों का तो जिस राज्य में 73 फीसदी विधाायक आपराधिाक पृश्ठभूमि के हों वहां कौन कैसा भ्रश्टाचारी? और यह सवाल उठाने का नैतिक अधिाकार किसके पास है क्या भाजपा और कांग्रेस अपने गिरेबान में झांकने के बाद ऐसा सवाल कर सकते हैं?
अमलेन्दु उपाधयाय
सी - 15, मेरठ रोड इंडस्ट्रियल एरिया
गाजियाबाद
मो 9313517853/ 9410672811
वेबसाइट संचालक अमलेन्दु उपाध्याय 30 वर्ष से अधिक अनुभव वाले वरिष्ठ पत्रकार और जाने माने राजनैतिक विश्लेषक हैं। वह पर्यावरण, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, युवा, खेल, कानून, स्वास्थ्य, समसामयिकी, राजनीति इत्यादि पर लिखते रहे हैं।
मंगलवार, 15 दिसंबर 2009
यूपी का विभाजन देश बांटने की पटकथा लिखेगा
यूपी का विभाजन देश बांटने की पटकथा लिखेगा
अमलेन्दु उपाध्याय
तेलंगाना राज्य बनाने की केन्द्र सरकार ने घोषणा क्या की पूरे देश में नए राज्य बनाने की पुरानी मांगों ने जोर पकड़ लिया। गोरखालैण्ड, बोडोलैण्ड, विदर्भ, हरित प्रदेश, बुन्देलखण्ड समेत लगभग दो दर्जन नए राज्य बनाए जाने की मांग सामने आ गई है। लगे हाथ उत्तार प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने भी प्रदेश को चार हिस्सों में बांटने की मांग कर डाली है। 'राहुल बाबा और सोनिया' की कांग्रेस भी पहले से ही इस मांग का समर्थन करती रही है। आखिर मामला क्या है? सारा देश एकदम बंटने को क्यों तैयार है? तेलंगाना की घोषणा के साथ ही उत्तर प्रदेश के विभाजन की बहस फिर से शुरू होर् गई है। सन 2000 में उत्तर प्रदेश से अलग कर उत्तरांचल बनाया गया था उसके बाद भी उत्तर प्रदेश के बचे हुए भूभाग से कम से कम तीन और राज्य बनाने की मांग उठ रही है। थोड़े समय पहले ही केंद्रीय गृहमंत्रालय ने स्वीकार किया था कि बिहार से मिथिलांचल, गुजरात से सौराष्ट्र और कर्नाटक से कूर्ग राज्य अलग बनाने सहित कम से कम दस नए प्रदेशों के गठन की मांग की गई है। जबकि कई ऐसे राज्यों की भी मांगें उठ रही हैं जो बमुश्किल दो या तीन जिलों के बराबर हैं और उनकी दिल्ली तक आवाज अभी सुनाई नहीं पड़ी है। जैसे पश्चिम उड़ीसा में कौशलांचल राज्य या फिर हरियाणा में मेवात प्रदेश की मांग उठ रही है।
यहां यह जिक्र करना उचित होगा कि पं. जवाहर लाल नेहरू भाषाई आधार पर राज्यों के गठन का विरोध करते रहे थे लेकिन सामाजिक कार्यकर्ता पोट्टी श्रीरामालू की मद्रास से आंधा्र प्रदेश को अलग किए जाने की मांग को लेकर 58 दिन के आमरण अनशन के बाद मौत और संयुक्त मद्रास में कम्युनिस्ट पार्टियों के बढ़ते वर्चस्व ने उन्हें अलग तेलुगू भाषी राज्य बनाने पर मजबूर कर दिया था। 22 दिसंबर 1953 में न्यायाधीश फजल अली की अध्यक्षता में पहले राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन हुआ। इस आयोग ने 30 सितंबर 1955 को अपनी रिपोर्ट सौंपी। इस आयोग के तीनं सदस्य-जस्टिस फजल अली, हृदयनाथ कुंजरू और केएम पाणिक्कर थे। 1955 में इस आयोग की रिपोर्ट आने के बाद ही 1956 में नए राज्यों का निर्माण हुआ और 14 राज्य व 6 केन्द्र शासित राज्य बने। फिर 1960 में पुनर्गठन का दूसरा दौर चला, जिसके परिणामस्वरूप 1960 में बंबई राज्य को तोड़कर महाराष्ट्र और गुजरात बनाए गए। 1966 में पंजाब का बंटवारा हुआ और हरियाणा और हिमाचल प्रदेश दो नए राज्यों का गठन हुआ। इसके बाद अनेक राज्यों में बंटवारे की मांग उठी लेकिन कांग्रेस ने अपने राजनीतिक हितों को धयान में रखकर बड़े राज्यों के विभाजन पर विचार किया और अपरिहार्य होने पर ही धीरे- धीरे इन्हें स्वीकार किया। फिर 1972 में मेघालय, मणिपुर, और त्रिपुरा बनाए गए। 1987 में मिजोरम का गठन किया गया और केन्द्र शासित राज्य अरूणाचल व गोवा को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया गया। आखिर में वर्ष 2000 में भाजपा की मेहरबानी से उत्ताराखण्ड, झारखण्ड और छत्ताीसगढ़ अस्तित्व में आए।
1950 के दशक में बने पहले राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिश में राज्यों के बंटवारे का आधार भाषाई था। इसके पीछे तर्क दिया गया कि स्वतंत्रता आंदोलन में यह बात शिद्दत के साथ उठी थी कि जनतंत्र में प्रशासन को आम लोगों की भाषा में काम करना चाहिए ताकि प्रशासन लोगों के नजदीक आ सके। इसी वजह से तब भाषा के आधार पर राज्य बने। अगर उस समय भाषा आधार न होता और तेलंगाना या उत्ताराखण्ड जैसी दबाव की राजनीति काम कर रही होती तो संकट हो सकता था। लेकिन उस समय भी इस फार्मूले पर ईमानदारी से काम नहीं किया गया। उस समय भी दो राज्य बंबई जिसमें गुजराती व मराठी लोग थे तथा दूसरा पंजाब जहां पंजाबी-हिंदी और हिमाचली भाषी थे, नहीं बाँटे गए। आखिरकार इन्हें भी भाषाई आधार पर महाराष्ट्र व गुजरात तथा पंजाब, हिमाचल व हरियाणा में बांटना ही पड़ा।
लेकिन भाषा के आधाार पर राज्यों के गठन का फार्मूला पूर्ण और तार्किक आधार नहीं था। अगर भाषा ही आधाार था तो विदर्भ को महाराष्ट्र से उसी समय अलग क्यों नहीं किया गया? आंधा्र को उसी समय क्यों नहीं तोड़ा गया? या सारे हिन्दी भाषी राज्यों को मिलाकर एक राज्य क्यों नहीं बनाया गया? क्या सभी हिन्दी भाषी राज्यों को मिलाकर एक राज्य बना देने से विकास किया जा सकेगा?
छोटे प्रदेश की वकालत करने वालों का तर्क है कि जनसंख्या एवं क्षेत्रफल की दृष्टि से कई राज्यों के आकारों में बड़ी विषमता है। एक तरफ़ तो बीस करोड़ से भी अधिक आबादी वाले उत्तर प्रदेश जैसे भारी भरकम राज्य तो वहीं सिक्किम जैसे छोटे प्रदेश जिसकी जनसंख्या मात्र छ: लाख है। इसी तरह एक ओर राजस्थान जैसा लंबा चौडा राज्य जिसका क्षेत्रफल साढे तीन लाख वर्ग किमी है वहीं लक्षद्वीप मात्र 32 वर्ग किमी ही है । किंतु तथ्य बताते हैं कि छोटे प्रदेशों में विकास की दर कई गुना अधिक है। उदाहरण के लिए बिहार की प्रति व्यक्ति आय आज मात्र 3835 रु है जबकि हिमाचल जैसे छोटे राज्य में यही 18750 रु है । तर्क दिया जा रहा है कि छोटे राज्य बनने के बाद आर्थिक प्रगति होती है। इसके लिए हरियाणा और हिमाचल का उदाहरण दिया जाता है। लेकिन यह तर्क मिथ्या है। अच्छे प्रशासन के लिए छोटे राज्य ठीक हो सकते हैं लेकिन ये ही विकास की एकमात्र गारंटी कैसे हो सकते हैें? हरियाणा को छोड़ दिया जाए तो झारखण्ड, उत्ताराखण्ड और छत्ताीसगढ़ के संबंधा में विकास और अच्छे प्रशासन की बातें बेमानी साबित हुई हैं। किसी भी राज्य की प्रगति के लिए राजनीतिक स्थिरता जरूरी है, मगर झारखंड में नौ साल में छह मुख्यमंत्री बदले गए और भ्रष्टाचार व सार्वजनिक धान की जिस तरह से लूट खसोट की गई वह यह तर्क झुठलाने के लिए काफी है। इसी तरह छत्ताीसगढ़ में नक्सलवाद और राज्य प्रायोजित आतंकवाद 'सलवां जुड़ूम' इसका उदाहरण हैं जबकि उत्ताराखण्ड नौ वर्षों में अपनी राजधाानी ही तय नहीं कर पाया है। मणिपुर नगालैंड मिजोरम जैसे छोटे राज्य भी राजनीतिक तौर पर लगातार अस्थिर बने रहे हैं।
फिर जिस तरीके से प्रांतीयता के सवाल पर महाराष्ट्र में राज ठाकरे का आतंक फैला और मधय प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बाहरी लोगों को लेकर जो भाषा प्रयोग की या दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित जिस तरह से अक्सर यूपी बिहार से आने वाले लोगों के लिए जहर उगलती रही हैं, वह संघीय गणतंत्र के स्वास्थ्य के लिए कोई शुभ संकेत नहीं है। ऐसे में छोटे राज्य क्षेत्रीय भावनाओं को भड़काने वाले और हमारे संञ्ीय ढांचे को तोड़ने वाले भी साबित हो सकते हैं।
जहां तक नए राज्यों की मांग का सवाल है तो काफी हद तक यह केन्द्र सरकार की आर्थिक नीतियों की विफलता का नतीजा हैं। क्योंकि पिछड़े क्षेत्रों के लोगों को लगता है कि उनके साथ भाषा जाति, या क्षेत्र के नाम पर भेदभाव किया जा रहा है और नया राज्य बन जाने से उनका विकास होगा। असम से पृथक् किए गए नगालैंड, मणिपुर मिजोरम हों या मेञलय सभी छोटे हैं और सबकी अलग-अलग किस्म की जनजातीय आबादी और पहचान है। उनका असम के साथ रहना मुश्किल होता गया इसलिए इन्हें अलग राज्य बनाया गया। लेकिन क्या इन राज्यों का विकास हो पाया?
नए राज्यों की मांग के पीछे असल कारण राजनीतिक दलों व नेताओं की क्षेत्रीय राजनीतिक डॉन और मुख्यमंत्री बनने की इच्छा है। फिर ऐसी मांग करने वाले चाहे चौधारी अजित सिंह हों या मायावती। उत्तार प्रदेश को विभाजित करके हरित प्रदेश बनाए जाने की मांग कर रहे राष्ट्रीय लोकदल के नेता चौधारी अजित सिंह का सपना प्रदेश का मुख्यमंत्री बनना रहा है जिसके लिए उन्होंने कई अतार्किक समझौते भी किए हैं और कला बाजियां भी खाई हैं। उन्हें लगता है कि उत्तार प्रदेश के एक रहते वह जिंदगी भर मुख्यमंत्री नहीं बन सकते इसलिए हरित प्रदेश बन जाना चाहिए। तेलंगाना बुंदेलखंड हो या फिर हरित प्रदेश नए छोटे राज्यों की ऐसी तमाम मांगें जोर पकड़ रही हैं। इनके पीछे सामाजिक और आर्थिक और प्रशासनिक कारण तो हो सकते हैं लेकिन मुख्य कारण राजनीतिक ही हैे। स्वयं उत्तर प्रदेश कांग्रेस अधयक्ष रीता जोशी के इस कथन कि ' पहले मुलायम और अब मायावती उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य का प्रशासन चलाने में असमर्थ हैं। इसीलिए बुंदेलखंड सहित राज्य के दूसरे हिस्सों (पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पूर्वान्चल) के लोग अलग प्रदेश की मांग कर रहे हैं।' से नए राज्यों की मांग के पीछे छिपा राजनीतिज्ञों का दर्द समझा जा सकता है। कांग्रेस समझती है कि उत्तार प्रदेश के एक रहते वह वहां कभी अब पूर्ण बहुमत में नहीं आ सकती इसलिए प्रदेश तोड़ दिया जाए। यही कारण है कि अब केन्द्रीय राज्यमंत्री और हाल ही तक झांसी के विधायक प्रदीप जैन 'आदित्य' ने राज्य विधानसभा में पृथक बुंदेलखंड बनाने का प्रस्ताव रखा। मायावती भी इसी डर में यूपी के चार हिस्से चाहती हैं। उन्हें लगता है कि अगर पश्चिमी उ.प्र. अलग राज्य अन जाए तो वहां पच्चीस प्रतिशत दलित मतों के सहारे वह जिन्दगी भर मुख्यमंत्री बनी रह सकती हैं। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बांदा चित्रकूट झांसी ललितपुर और सागर जिले को मिलाकर बुंदेलखंड राज्य बनाने की मांग उठती रही है। कांग्रेस भी इस की आग पर अपनी रोटियां सेंकती रही है। राहुल गांधाी ने बुन्देलखण्ड को जो स्पेशल आर्थिक पैकेज दिलवाया उसके पीछे विकास नहीं बल्कि कांग्रेस को पुनर्जीवित करने की राजनीति है। इसी लालच में मायावती भी उ.प्र. को तोड़ने की बात कर रही हैं। क्योंकि उन्हें भी लगता है कि उ.प्र. बंट गया तो वह जिन्दगी भर मुख्यमंत्री बनी रहेंगी।
पहले पुनर्गठन आयोग ने यूपी के विभाजन के खिलाफ राय जताई थी तथा पं. नेहरू व गोविंद वल्लभ पंत भी उसके तर्को से सहमत थे। दिल्ली के प्रथम मुख्यमंत्री चौधारी ब्रह्म सिंह दिल्ली, हरियाणा, पश्चिमी उत्तार प्रदेश और राजस्थान के कुछ हिस्सों को मिलाकर 'वृहत्तार दिल्ली' बनाए जाने के पक्षधार थे। उनकी सोच थी कि यह जाट प्रदेश बन जाए तो उनकी पांचों ऊंगलियां घी में रहेंगी। उनका पं गोबिन्द वल्लभ पंत ने जोरदार विरोधा किया था। समय के साथ साथ यह मांग पीछे चली गई।
नए राज्यों के पुनर्गठन के लिए सुझाव देते वक्त 'राज्य पुनर्गठन आयोग' ने ही कई विवादों को जन्म दे दिया। आयोग की राय के खिलाफ जाकर उत्तर प्रदेश के टुकड़े कर छोटे राज्य बनाने का सुझाव फजल अली आयोग के सदस्य सरदार केएम पणिक्कर ने ही दिया था। उत्तर प्रदेश के बंटवारे के वह पहले प्रस्तावक थे। अपने प्रसिध्द असम्मति-पत्र, में पणिक्कर ने उत्तर प्रदेश को अंविभाजित रखने के आयोग के फैसले से असहमति जताते हुए देश की कुल आबादी के छठे भाग को एक ही राज्य में रखने को नासमझी करार दिया था।? अब उनकी इस टिप्पणी को आधाार बनाकर शासन कर पाने में असमर्थ नाकारा राजनेता उत्तार प्रदेश को बांटने की सिफारिश कर रहे हैं। उधार पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों को मिलाकर 'भोजपुर' राज्य बनाने की मांग भी की जा रही है जबकि मिथिला भाषी हिस्से को 'मिथिलांचल 'राज्य बनाने की मांग भी हो रही है।
गोरखा जनमुक्ति मोर्चा जीजेएम पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग और आसपास के क्षेत्रों को मिलाकर गोरखालैण्ड बनाने की मांग कर रहा है और भाजपा इसका समर्थन कर रही है। भाजपा का सोचना है कि गोरखालैण्ड बन जाने से उसकी ताकत में थोड़ा इजाफा हो जाएगा क्योंकि जीजेएम के सहयोग से ही पं बंगाल के रास्ते लोकसभा में पहुंचने का उसका खाता पहली बार खुला है।
पश्चिम बंगाल और असम के क्षेत्रों को मिलाकर 'वृहद कूच बिहार' बनाए जाने की मांग उठती रही है। पं. बंगाल के ही उत्तारी जिलों को मिलाकर 'कामतापुर राज्य' बनाए जाने की मांग भी उठ रही है। तो असम के कछार, हैलाकांडी, और करीम गंज सहित कुछ जिलों को मिलाकर बराक घाटी राज्य की मांग भी उठती रहती है। जबकि बोडोलैण्ड की मांग तो काफी हिंसक रूख अख्तयार कर चुकी है।
मध्य प्रदेश में भी कई राज्य बनाए जाने की मांग की जा रही है। 'गोंडवाना' क्षेत्र को अलग करके गोंडवाना राज्य की मांग की जा रही है तो महाकोशल क्षेत्र को अलग करके 'महाकोशल* राज्य बनाए जाने की मांग भी की जा रही है।
इतना ही नहीं उत्तार प्रदेश, राजस्थान और मध्यप्रदेश के कुछ जिलों को मिलाकर 'चंबल राज्य' बनाए जाने की मांग को लेकर आंदोलन शुरू हो चुका है। राजस्थान में भी 'मरू प्रदेश' और 'मेवाड़' की मांग यदा-कदा उठती रहती है। ताजा मांग उदयपुर में हाईकोर्ट बेंच के बहाने 'मेवाड़' प्रदेश की है जिसे भाजपा नेता किरण माहेश्वरी हवा दे रही हैं।
आंधा्र प्रदेश में ही तेलंगाना के अलावा तटीय जिलों को मिलाकर रायलसीमा और काकतीय राज्य की मांग भी जोर पकड़ रही है। महाराष्ट्र में विदर्भ की अलग राज्य की मांग बहुत पुरानी है। जबकि इसके बरार क्षेत्र को भी अलग राज्य की मांग की जाती रही है। गुजरात से सौराष्ट्र राज्य अलग बनाने की है जो पिछले कई वर्ष से गृह मंत्रालय के समक्ष लंबित है।
कुल मिलाकर नए राज्यों की मांग विशुध्द राजनीतिक है और इसका विकास या अच्छे प्रशासन से कोई लेना देना नहीं है। प्रदेशों को बांटने की मुहिम क्या देश तोड़ने की मंजिल पर जाकर रूकेगी? खासतौर पर उ.प्र. बंटा तो मुल्क बंटने की पटकथा लिखी जाएगी।
v
अमलेन्दु उपाध्याय
तेलंगाना राज्य बनाने की केन्द्र सरकार ने घोषणा क्या की पूरे देश में नए राज्य बनाने की पुरानी मांगों ने जोर पकड़ लिया। गोरखालैण्ड, बोडोलैण्ड, विदर्भ, हरित प्रदेश, बुन्देलखण्ड समेत लगभग दो दर्जन नए राज्य बनाए जाने की मांग सामने आ गई है। लगे हाथ उत्तार प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने भी प्रदेश को चार हिस्सों में बांटने की मांग कर डाली है। 'राहुल बाबा और सोनिया' की कांग्रेस भी पहले से ही इस मांग का समर्थन करती रही है। आखिर मामला क्या है? सारा देश एकदम बंटने को क्यों तैयार है? तेलंगाना की घोषणा के साथ ही उत्तर प्रदेश के विभाजन की बहस फिर से शुरू होर् गई है। सन 2000 में उत्तर प्रदेश से अलग कर उत्तरांचल बनाया गया था उसके बाद भी उत्तर प्रदेश के बचे हुए भूभाग से कम से कम तीन और राज्य बनाने की मांग उठ रही है। थोड़े समय पहले ही केंद्रीय गृहमंत्रालय ने स्वीकार किया था कि बिहार से मिथिलांचल, गुजरात से सौराष्ट्र और कर्नाटक से कूर्ग राज्य अलग बनाने सहित कम से कम दस नए प्रदेशों के गठन की मांग की गई है। जबकि कई ऐसे राज्यों की भी मांगें उठ रही हैं जो बमुश्किल दो या तीन जिलों के बराबर हैं और उनकी दिल्ली तक आवाज अभी सुनाई नहीं पड़ी है। जैसे पश्चिम उड़ीसा में कौशलांचल राज्य या फिर हरियाणा में मेवात प्रदेश की मांग उठ रही है।
यहां यह जिक्र करना उचित होगा कि पं. जवाहर लाल नेहरू भाषाई आधार पर राज्यों के गठन का विरोध करते रहे थे लेकिन सामाजिक कार्यकर्ता पोट्टी श्रीरामालू की मद्रास से आंधा्र प्रदेश को अलग किए जाने की मांग को लेकर 58 दिन के आमरण अनशन के बाद मौत और संयुक्त मद्रास में कम्युनिस्ट पार्टियों के बढ़ते वर्चस्व ने उन्हें अलग तेलुगू भाषी राज्य बनाने पर मजबूर कर दिया था। 22 दिसंबर 1953 में न्यायाधीश फजल अली की अध्यक्षता में पहले राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन हुआ। इस आयोग ने 30 सितंबर 1955 को अपनी रिपोर्ट सौंपी। इस आयोग के तीनं सदस्य-जस्टिस फजल अली, हृदयनाथ कुंजरू और केएम पाणिक्कर थे। 1955 में इस आयोग की रिपोर्ट आने के बाद ही 1956 में नए राज्यों का निर्माण हुआ और 14 राज्य व 6 केन्द्र शासित राज्य बने। फिर 1960 में पुनर्गठन का दूसरा दौर चला, जिसके परिणामस्वरूप 1960 में बंबई राज्य को तोड़कर महाराष्ट्र और गुजरात बनाए गए। 1966 में पंजाब का बंटवारा हुआ और हरियाणा और हिमाचल प्रदेश दो नए राज्यों का गठन हुआ। इसके बाद अनेक राज्यों में बंटवारे की मांग उठी लेकिन कांग्रेस ने अपने राजनीतिक हितों को धयान में रखकर बड़े राज्यों के विभाजन पर विचार किया और अपरिहार्य होने पर ही धीरे- धीरे इन्हें स्वीकार किया। फिर 1972 में मेघालय, मणिपुर, और त्रिपुरा बनाए गए। 1987 में मिजोरम का गठन किया गया और केन्द्र शासित राज्य अरूणाचल व गोवा को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया गया। आखिर में वर्ष 2000 में भाजपा की मेहरबानी से उत्ताराखण्ड, झारखण्ड और छत्ताीसगढ़ अस्तित्व में आए।
1950 के दशक में बने पहले राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिश में राज्यों के बंटवारे का आधार भाषाई था। इसके पीछे तर्क दिया गया कि स्वतंत्रता आंदोलन में यह बात शिद्दत के साथ उठी थी कि जनतंत्र में प्रशासन को आम लोगों की भाषा में काम करना चाहिए ताकि प्रशासन लोगों के नजदीक आ सके। इसी वजह से तब भाषा के आधार पर राज्य बने। अगर उस समय भाषा आधार न होता और तेलंगाना या उत्ताराखण्ड जैसी दबाव की राजनीति काम कर रही होती तो संकट हो सकता था। लेकिन उस समय भी इस फार्मूले पर ईमानदारी से काम नहीं किया गया। उस समय भी दो राज्य बंबई जिसमें गुजराती व मराठी लोग थे तथा दूसरा पंजाब जहां पंजाबी-हिंदी और हिमाचली भाषी थे, नहीं बाँटे गए। आखिरकार इन्हें भी भाषाई आधार पर महाराष्ट्र व गुजरात तथा पंजाब, हिमाचल व हरियाणा में बांटना ही पड़ा।
लेकिन भाषा के आधाार पर राज्यों के गठन का फार्मूला पूर्ण और तार्किक आधार नहीं था। अगर भाषा ही आधाार था तो विदर्भ को महाराष्ट्र से उसी समय अलग क्यों नहीं किया गया? आंधा्र को उसी समय क्यों नहीं तोड़ा गया? या सारे हिन्दी भाषी राज्यों को मिलाकर एक राज्य क्यों नहीं बनाया गया? क्या सभी हिन्दी भाषी राज्यों को मिलाकर एक राज्य बना देने से विकास किया जा सकेगा?
छोटे प्रदेश की वकालत करने वालों का तर्क है कि जनसंख्या एवं क्षेत्रफल की दृष्टि से कई राज्यों के आकारों में बड़ी विषमता है। एक तरफ़ तो बीस करोड़ से भी अधिक आबादी वाले उत्तर प्रदेश जैसे भारी भरकम राज्य तो वहीं सिक्किम जैसे छोटे प्रदेश जिसकी जनसंख्या मात्र छ: लाख है। इसी तरह एक ओर राजस्थान जैसा लंबा चौडा राज्य जिसका क्षेत्रफल साढे तीन लाख वर्ग किमी है वहीं लक्षद्वीप मात्र 32 वर्ग किमी ही है । किंतु तथ्य बताते हैं कि छोटे प्रदेशों में विकास की दर कई गुना अधिक है। उदाहरण के लिए बिहार की प्रति व्यक्ति आय आज मात्र 3835 रु है जबकि हिमाचल जैसे छोटे राज्य में यही 18750 रु है । तर्क दिया जा रहा है कि छोटे राज्य बनने के बाद आर्थिक प्रगति होती है। इसके लिए हरियाणा और हिमाचल का उदाहरण दिया जाता है। लेकिन यह तर्क मिथ्या है। अच्छे प्रशासन के लिए छोटे राज्य ठीक हो सकते हैं लेकिन ये ही विकास की एकमात्र गारंटी कैसे हो सकते हैें? हरियाणा को छोड़ दिया जाए तो झारखण्ड, उत्ताराखण्ड और छत्ताीसगढ़ के संबंधा में विकास और अच्छे प्रशासन की बातें बेमानी साबित हुई हैं। किसी भी राज्य की प्रगति के लिए राजनीतिक स्थिरता जरूरी है, मगर झारखंड में नौ साल में छह मुख्यमंत्री बदले गए और भ्रष्टाचार व सार्वजनिक धान की जिस तरह से लूट खसोट की गई वह यह तर्क झुठलाने के लिए काफी है। इसी तरह छत्ताीसगढ़ में नक्सलवाद और राज्य प्रायोजित आतंकवाद 'सलवां जुड़ूम' इसका उदाहरण हैं जबकि उत्ताराखण्ड नौ वर्षों में अपनी राजधाानी ही तय नहीं कर पाया है। मणिपुर नगालैंड मिजोरम जैसे छोटे राज्य भी राजनीतिक तौर पर लगातार अस्थिर बने रहे हैं।
फिर जिस तरीके से प्रांतीयता के सवाल पर महाराष्ट्र में राज ठाकरे का आतंक फैला और मधय प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बाहरी लोगों को लेकर जो भाषा प्रयोग की या दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित जिस तरह से अक्सर यूपी बिहार से आने वाले लोगों के लिए जहर उगलती रही हैं, वह संघीय गणतंत्र के स्वास्थ्य के लिए कोई शुभ संकेत नहीं है। ऐसे में छोटे राज्य क्षेत्रीय भावनाओं को भड़काने वाले और हमारे संञ्ीय ढांचे को तोड़ने वाले भी साबित हो सकते हैं।
जहां तक नए राज्यों की मांग का सवाल है तो काफी हद तक यह केन्द्र सरकार की आर्थिक नीतियों की विफलता का नतीजा हैं। क्योंकि पिछड़े क्षेत्रों के लोगों को लगता है कि उनके साथ भाषा जाति, या क्षेत्र के नाम पर भेदभाव किया जा रहा है और नया राज्य बन जाने से उनका विकास होगा। असम से पृथक् किए गए नगालैंड, मणिपुर मिजोरम हों या मेञलय सभी छोटे हैं और सबकी अलग-अलग किस्म की जनजातीय आबादी और पहचान है। उनका असम के साथ रहना मुश्किल होता गया इसलिए इन्हें अलग राज्य बनाया गया। लेकिन क्या इन राज्यों का विकास हो पाया?
नए राज्यों की मांग के पीछे असल कारण राजनीतिक दलों व नेताओं की क्षेत्रीय राजनीतिक डॉन और मुख्यमंत्री बनने की इच्छा है। फिर ऐसी मांग करने वाले चाहे चौधारी अजित सिंह हों या मायावती। उत्तार प्रदेश को विभाजित करके हरित प्रदेश बनाए जाने की मांग कर रहे राष्ट्रीय लोकदल के नेता चौधारी अजित सिंह का सपना प्रदेश का मुख्यमंत्री बनना रहा है जिसके लिए उन्होंने कई अतार्किक समझौते भी किए हैं और कला बाजियां भी खाई हैं। उन्हें लगता है कि उत्तार प्रदेश के एक रहते वह जिंदगी भर मुख्यमंत्री नहीं बन सकते इसलिए हरित प्रदेश बन जाना चाहिए। तेलंगाना बुंदेलखंड हो या फिर हरित प्रदेश नए छोटे राज्यों की ऐसी तमाम मांगें जोर पकड़ रही हैं। इनके पीछे सामाजिक और आर्थिक और प्रशासनिक कारण तो हो सकते हैं लेकिन मुख्य कारण राजनीतिक ही हैे। स्वयं उत्तर प्रदेश कांग्रेस अधयक्ष रीता जोशी के इस कथन कि ' पहले मुलायम और अब मायावती उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य का प्रशासन चलाने में असमर्थ हैं। इसीलिए बुंदेलखंड सहित राज्य के दूसरे हिस्सों (पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पूर्वान्चल) के लोग अलग प्रदेश की मांग कर रहे हैं।' से नए राज्यों की मांग के पीछे छिपा राजनीतिज्ञों का दर्द समझा जा सकता है। कांग्रेस समझती है कि उत्तार प्रदेश के एक रहते वह वहां कभी अब पूर्ण बहुमत में नहीं आ सकती इसलिए प्रदेश तोड़ दिया जाए। यही कारण है कि अब केन्द्रीय राज्यमंत्री और हाल ही तक झांसी के विधायक प्रदीप जैन 'आदित्य' ने राज्य विधानसभा में पृथक बुंदेलखंड बनाने का प्रस्ताव रखा। मायावती भी इसी डर में यूपी के चार हिस्से चाहती हैं। उन्हें लगता है कि अगर पश्चिमी उ.प्र. अलग राज्य अन जाए तो वहां पच्चीस प्रतिशत दलित मतों के सहारे वह जिन्दगी भर मुख्यमंत्री बनी रह सकती हैं। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बांदा चित्रकूट झांसी ललितपुर और सागर जिले को मिलाकर बुंदेलखंड राज्य बनाने की मांग उठती रही है। कांग्रेस भी इस की आग पर अपनी रोटियां सेंकती रही है। राहुल गांधाी ने बुन्देलखण्ड को जो स्पेशल आर्थिक पैकेज दिलवाया उसके पीछे विकास नहीं बल्कि कांग्रेस को पुनर्जीवित करने की राजनीति है। इसी लालच में मायावती भी उ.प्र. को तोड़ने की बात कर रही हैं। क्योंकि उन्हें भी लगता है कि उ.प्र. बंट गया तो वह जिन्दगी भर मुख्यमंत्री बनी रहेंगी।
पहले पुनर्गठन आयोग ने यूपी के विभाजन के खिलाफ राय जताई थी तथा पं. नेहरू व गोविंद वल्लभ पंत भी उसके तर्को से सहमत थे। दिल्ली के प्रथम मुख्यमंत्री चौधारी ब्रह्म सिंह दिल्ली, हरियाणा, पश्चिमी उत्तार प्रदेश और राजस्थान के कुछ हिस्सों को मिलाकर 'वृहत्तार दिल्ली' बनाए जाने के पक्षधार थे। उनकी सोच थी कि यह जाट प्रदेश बन जाए तो उनकी पांचों ऊंगलियां घी में रहेंगी। उनका पं गोबिन्द वल्लभ पंत ने जोरदार विरोधा किया था। समय के साथ साथ यह मांग पीछे चली गई।
नए राज्यों के पुनर्गठन के लिए सुझाव देते वक्त 'राज्य पुनर्गठन आयोग' ने ही कई विवादों को जन्म दे दिया। आयोग की राय के खिलाफ जाकर उत्तर प्रदेश के टुकड़े कर छोटे राज्य बनाने का सुझाव फजल अली आयोग के सदस्य सरदार केएम पणिक्कर ने ही दिया था। उत्तर प्रदेश के बंटवारे के वह पहले प्रस्तावक थे। अपने प्रसिध्द असम्मति-पत्र, में पणिक्कर ने उत्तर प्रदेश को अंविभाजित रखने के आयोग के फैसले से असहमति जताते हुए देश की कुल आबादी के छठे भाग को एक ही राज्य में रखने को नासमझी करार दिया था।? अब उनकी इस टिप्पणी को आधाार बनाकर शासन कर पाने में असमर्थ नाकारा राजनेता उत्तार प्रदेश को बांटने की सिफारिश कर रहे हैं। उधार पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों को मिलाकर 'भोजपुर' राज्य बनाने की मांग भी की जा रही है जबकि मिथिला भाषी हिस्से को 'मिथिलांचल 'राज्य बनाने की मांग भी हो रही है।
गोरखा जनमुक्ति मोर्चा जीजेएम पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग और आसपास के क्षेत्रों को मिलाकर गोरखालैण्ड बनाने की मांग कर रहा है और भाजपा इसका समर्थन कर रही है। भाजपा का सोचना है कि गोरखालैण्ड बन जाने से उसकी ताकत में थोड़ा इजाफा हो जाएगा क्योंकि जीजेएम के सहयोग से ही पं बंगाल के रास्ते लोकसभा में पहुंचने का उसका खाता पहली बार खुला है।
पश्चिम बंगाल और असम के क्षेत्रों को मिलाकर 'वृहद कूच बिहार' बनाए जाने की मांग उठती रही है। पं. बंगाल के ही उत्तारी जिलों को मिलाकर 'कामतापुर राज्य' बनाए जाने की मांग भी उठ रही है। तो असम के कछार, हैलाकांडी, और करीम गंज सहित कुछ जिलों को मिलाकर बराक घाटी राज्य की मांग भी उठती रहती है। जबकि बोडोलैण्ड की मांग तो काफी हिंसक रूख अख्तयार कर चुकी है।
मध्य प्रदेश में भी कई राज्य बनाए जाने की मांग की जा रही है। 'गोंडवाना' क्षेत्र को अलग करके गोंडवाना राज्य की मांग की जा रही है तो महाकोशल क्षेत्र को अलग करके 'महाकोशल* राज्य बनाए जाने की मांग भी की जा रही है।
इतना ही नहीं उत्तार प्रदेश, राजस्थान और मध्यप्रदेश के कुछ जिलों को मिलाकर 'चंबल राज्य' बनाए जाने की मांग को लेकर आंदोलन शुरू हो चुका है। राजस्थान में भी 'मरू प्रदेश' और 'मेवाड़' की मांग यदा-कदा उठती रहती है। ताजा मांग उदयपुर में हाईकोर्ट बेंच के बहाने 'मेवाड़' प्रदेश की है जिसे भाजपा नेता किरण माहेश्वरी हवा दे रही हैं।
आंधा्र प्रदेश में ही तेलंगाना के अलावा तटीय जिलों को मिलाकर रायलसीमा और काकतीय राज्य की मांग भी जोर पकड़ रही है। महाराष्ट्र में विदर्भ की अलग राज्य की मांग बहुत पुरानी है। जबकि इसके बरार क्षेत्र को भी अलग राज्य की मांग की जाती रही है। गुजरात से सौराष्ट्र राज्य अलग बनाने की है जो पिछले कई वर्ष से गृह मंत्रालय के समक्ष लंबित है।
कुल मिलाकर नए राज्यों की मांग विशुध्द राजनीतिक है और इसका विकास या अच्छे प्रशासन से कोई लेना देना नहीं है। प्रदेशों को बांटने की मुहिम क्या देश तोड़ने की मंजिल पर जाकर रूकेगी? खासतौर पर उ.प्र. बंटा तो मुल्क बंटने की पटकथा लिखी जाएगी।
v
Labels:
जनतंत्र,
तेलंगाना राज्य,
यूपी का विभाजन,
राज्य पुनर्गठन आयोग
वेबसाइट संचालक अमलेन्दु उपाध्याय 30 वर्ष से अधिक अनुभव वाले वरिष्ठ पत्रकार और जाने माने राजनैतिक विश्लेषक हैं। वह पर्यावरण, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, युवा, खेल, कानून, स्वास्थ्य, समसामयिकी, राजनीति इत्यादि पर लिखते रहे हैं।
मंगलवार, 8 दिसंबर 2009
जिन्हें राष्ट्रपति ने गुण्डे कहा अखबार ने उन्हें शहीद कहा
जिन्हें राष्ट्रपति ने गुण्डे कहा अखबार ने उन्हें शहीद कहा
अमलेन्दु उपाधयाय
6 दिसंबर बीत गया लेकिन बहुत से जख्मों को कुरेद गया। अखबारों में छपी खबरों को देखकर यह साफ हो गया कि सांप्रदायिक ताकतों ने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर कब्जा कर लिया है।
याद होगा जब 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद शहीद की गई थी तब तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ शंकर दयाल शर्मा ने बाबरी मस्जिद गिराने वालों को 'गुण्डे' कहा था। लेकिन 6 दिसंबर 2009 के एक अखबार ने जो गांधी जी के समय से कांग्रेस समर्थित अखबार कहा जाता है, इन गुण्डों के लिए 'शहीद' शब्द का प्रयोग किया है। ऐसा तब है जब यही अखबार बाबरी मस्जिद शहीद किए जाने की निन्दा भी कर रहा है। बाबरी मस्जिद गिराने वाले गुण्डों को शहीद कहना इस देश पर मर मिटने वाले देशभक्त शहीदों का अपमान है।
वैसे तो लगभग हर अखबार ने बाबरी मस्जिद के लिए 'विवादित ढांचा' शब्द का प्रयोग किया है। मीडिया इस विषय में स्वयंभू जज बन गया है। सवाल यह है कि ढांचा विवादित कैसे हो गया? विवादित तो वह तथाकथित मंदिर है जिसने अपने निर्माण से पहले ही हजारों बेगुनाह इंसानों की बलि ले ली है और जहां बिना प्राण प्रतिष्ठा के मूर्तियों की पूजा होने लगी है।
अमलेन्दु उपाधयाय
6 दिसंबर बीत गया लेकिन बहुत से जख्मों को कुरेद गया। अखबारों में छपी खबरों को देखकर यह साफ हो गया कि सांप्रदायिक ताकतों ने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर कब्जा कर लिया है।
याद होगा जब 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद शहीद की गई थी तब तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ शंकर दयाल शर्मा ने बाबरी मस्जिद गिराने वालों को 'गुण्डे' कहा था। लेकिन 6 दिसंबर 2009 के एक अखबार ने जो गांधी जी के समय से कांग्रेस समर्थित अखबार कहा जाता है, इन गुण्डों के लिए 'शहीद' शब्द का प्रयोग किया है। ऐसा तब है जब यही अखबार बाबरी मस्जिद शहीद किए जाने की निन्दा भी कर रहा है। बाबरी मस्जिद गिराने वाले गुण्डों को शहीद कहना इस देश पर मर मिटने वाले देशभक्त शहीदों का अपमान है।
वैसे तो लगभग हर अखबार ने बाबरी मस्जिद के लिए 'विवादित ढांचा' शब्द का प्रयोग किया है। मीडिया इस विषय में स्वयंभू जज बन गया है। सवाल यह है कि ढांचा विवादित कैसे हो गया? विवादित तो वह तथाकथित मंदिर है जिसने अपने निर्माण से पहले ही हजारों बेगुनाह इंसानों की बलि ले ली है और जहां बिना प्राण प्रतिष्ठा के मूर्तियों की पूजा होने लगी है।
Labels:
6 दिसंबर,
अखबार,
बाबरी मस्जिद,
लोकतंत्र के चौथे स्तंभ,
सांप्रदायिक
वेबसाइट संचालक अमलेन्दु उपाध्याय 30 वर्ष से अधिक अनुभव वाले वरिष्ठ पत्रकार और जाने माने राजनैतिक विश्लेषक हैं। वह पर्यावरण, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, युवा, खेल, कानून, स्वास्थ्य, समसामयिकी, राजनीति इत्यादि पर लिखते रहे हैं।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)