रविवार, 26 अप्रैल 2009

हारेगी भाजपा और कांग्रेस तो जीतेगा भारत

हारेगी भाजपा और कांग्रेस तो जीतेगा भारत-
अमलेन्दु उपाध्याय, राजनीतिक समीक्षक, गुरुवार, 23 अप्रैल, 2009
भाजपा ने नारा दिया है-‘ जीतेगी भाजपा/ जीतेगा भारत ’। बहुत प्यारा नारा है, वैसे भी नारे देने में भाजपा को महारत हासिल है। यह नारा ठीक उसी तर्ज पर है, जैसे जीतेगा सचिन जीतेगा भारत या जीतेगा अजहरउद्दीन जीतेगा भारत! लेकिन काफी दिमाग दौड़ाने के बाद भी अपने दिमाग में यह बात नहीं आई कि भाजपा के जीतने से देश का क्या वास्ता है? क्या विक्रम बेताल की कहानियों की तरह भारत के प्राण भाजपा में कैद हैं? अगर जीतेगी भाजपा तो जीतेगा भारत, तब क्या ‘हारेगी भाजपा तो हारेगा भारत’ ? फिर तो कई बार भारत की शर्मनाक हार हो चुकी है, क्योंकि भाजपा तो हारने का विश्वकीर्तिमान बना चुकी है। दरअसल भाजपा रिटेल वोटों की राजनीति करके थोक में देश बेचने का इरादा रखती है। देखने में आ रहा है कि जिस तरह ‘इंडिया इज इंदिरा और इंदिरा इज इंडिया’ का नारा दिया गया था उसी तर्ज पर जीतेगी भाजपा/ जीतेगा भारत’ नारा दिया जा रहा है। लेकिन आश्चर्य इस बात पर है कि सोनिया और अडवाणी अब एक ही भाषा बोल रहे हैं। तेजी से उभरते क्षेत्रीय दलों से बौखलाए अडवाणी जी कह रहे हैं कि देश में दो मोर्चे हैं, एनडीए और यूपीए। उधर सोनिया जी फर्मा रही हैं कि तीसरे और चौथे मोर्चे कुर्सी के लिए बने हैं।
यहां गौर तलब है कि सोनिया जी त्याग की प्रतिमूर्ति हैं, सत्ता को ठोकर मारने का जज्बा रखती हैं। लेकिन बिना समाजवादी पार्टी का समर्थन पत्र लिए राष्ट्रपति के पास प्रधानमंत्री बनने का दावा करने जा पहुचती हैं। इस चिलचिलाती धूप में राजमहलों में पली सोनिया जी देश भर में मारी मारी फिर रही हैं, वह कुर्सी के लिए नहीं, इस देश पर एहसान करने के लिए मारी मारी फिर रही हैं?
अपने 16 मई 2009 तक के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी परमाणु करार पर विश्वासमत पर सरकार को बचाने के लिए जिस बेशर्मी का खेल खेलकर इस देश को बेइज्जत कर रहे थे और लोकतंत्र का चीरहरण कर रहे थे , वह भी कुर्सी के लिए नहीं बल्कि इस देश को बिजली दिलाने के लिए कर रहे थे। प्रश्न यह है कि क्षेत्रीय दलों के उभार से दोनों तथाकथित बड़े राष्ट्रीय दलों में बेचैनी का आलम क्यों है? भाजपा और कांग्रेस दोनों मिलकर क्षेत्रीय दलों को नेस्तनाबूद करना क्यों चाहती हैं? हमें यह याद रखना चाहिए कि क्षेत्रीय दलों को कमजोर करके आप संघात्मक ( फेडरल) भारत की परिकल्पना नहीं कर सकते। अगर आरोप लगाया जाए कि क्षेत्रीय दल सत्ता पाने के लिए सौदेबाजी करते हैं, तो क्या भाजपा और कांग्रेस बिना सौदेबाजी के सत्ता पा लेते हैं? कांग्रेस की डीएमके के साथ सत्ता के लिए सोदेबाजी से ज्यादा शर्मनाक सौदेबाजी भला और क्या होगी? गुजराल सरकार को कांग्रेस ने इसी आधार पर गिराया था कि जैन आयोग की एक अंतरिम रिपोर्ट में द्रमुक का राजीव गांधी हत्याकांड में हाथ होने का इशारा किया गया था। अब सोनिया जी की महानता पर बलिहारी जाऊँ कि कुर्सी की खातिर नहीं बल्कि देश हित में उन्होंने द्रमुक से समझौता कर लिया! यह बात कहने में कोई हिचक नहीं है कि कांग्रेस की मौत और भाजपा का कैंसर ही इस देश के संघीय ढांचे को मजबूत करेगा, जिसे भाजपा और कांग्रेस लगातार मजबूत केन्द्र के नारे के नाम पर तबाह-और-बर्बाद करते आए हैं। परंतु असली सवाल यह है, कि क्या वाकई तीसरे मोर्चे के दल सरकार बना पाएंगे? लगता तो नहीं! क्योंकि अमरीका की इच्छा मनमोहन और अडवाणी में से ही किसी को प्रधानमंत्री बनाने की है। अमरीका ने इस दिशा में गम्भीर प्रयास भी शुरू कर दिए हैं। अमरीकी निर्देश पर आरएसएस अब भाजपा और कांग्रेस को एक कराने के अभियान पर जुट गया है। संघ के मीडिया गुरू माहौल बनाने का प्रयास कर रहे हैं, कि देश की स्थिरता के लिए दोनों बड़े दलों को एक हो जाना चाहिए। मनमोहन का अमरीका प्रेम जगजाहिर है, जबकि भाजपाई तो पुराने अमरीका भक्त हैं। जब अटल बिहारी वाजपेयी विदेश मंत्री की हैसियत से अमरीका की यात्रा पर गए थे तो अपने साथ संघ प्रमुख का अमरीकी राश्ट्रपति को संबोधित पत्र लेकर गए थे जिसमें अमरीका को धर्मयोद्धा की संज्ञा दी गई थी। इसलिए अमरीकी पहल पर भाजपा और कांग्रेस चुनाव के बाद तीसरे मोर्चे को रोकने के लिए एक होने वाले हैं। यह अमरीकी आदेश से ही संभव हुआ है कि मनमोहन और अडवाणी अब एक दूसरे के खिलाफ नहीं बोल रहे हैं। इस देश की संप्रभुवता को बचाए रखने के लिए जरूरी है कि अमरीकापरस्त बड़े दल भाजपा और कांग्रेस बुरी तरह हारें। इन दोनों के हारने से देश का बहुत भला होगा और देश का संघीय ढांचा मजबूत होगा। अभी एक शेर सुना-” तू न मिट जाएगा किसी दल के मिट जाने से / नष-ए-मय कम होता नहीं पैमाने के बदल जाने से।“ इसलिए अब ‘जीतेगी भाजपा/जीतेगा भारत’ का नारा नहीं बल्कि ‘हारेगी भाजपा और कांग्रेस तो जीतेगा भारत’ का नारा लगना चाहिए।
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>लेखक परिचय : लेखक राजनीतिक समीक्षक हैं और पाक्षिक पत्रिका ‘प्रथम प्रवक्ता’ के सम्पादकीय विभाग में हैं।
>मो0 - 9953007626

बुधवार, 15 अप्रैल 2009

मायावती और आयोग की निष्पक्षता के सवाल

मायावती और आयोग की निष्पक्षता के सवाल -
अमलेन्दु उपाध्याय,
बुधवार, 15 अप्रैल, 2009
आजकल उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री, बहन मायावती, चुनाव आयोग से बहुत ज्यादा खफा हैं। कारण है, कि बहन जी प्रमुख प्रतिद्धन्दी समाजवादी पार्टी की शिकायत पर चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव-गृह, कुंवर फतेह बहादुर को हटाने का फरमान जारी कर दिया। बहन जी का गुस्सा होना लाजिमी है, क्योंकि कुंवर फतेह बहादुर, बहन जी के खासमखास लेफटीनेन्ट और कुर्क अमीन हैं, जिनकी भूमिका की चर्चा सत्ता के गलियारों में इसलिए होती है कि उनके और पुलिस महानिदेशक विक्रम सिंह के भागीरथ प्रयास और अथक परिश्रम से माफिया सरगना मुख्तार अंसारी, अफजाल अंसारी, धनंजय सिंह, और अरुण शंकर शुक्ल उर्फ अन्ना जैसे अपराध की दुनिया के धुरंधर, बहन जी का अपराधमुक्त प्रदेश बनाने के लिए न केवल साथ दे रहे हैं, बल्कि बहन जी के हाथी पर सवार होकर उन्हें 7, रेसकोर्स पहुंचाने के लिए आहुतियां भी दे रहे हैं। इस पुनीत यज्ञ में पहली आहुति जौनपुर से इंडियन जस्टिस पार्टी के उम्मीदवार की हत्या से शुरू हुई है। लेकिन अभी मुश्किल से डेढ़ बरस ही बीता होगा, जब बहन जी उत्तर प्रदेश में ‘ब्लू क्रान्ति’ करके सत्तरूढ़ होने के बाद, सबसे पहले शुक्रिया अदा करने, मुख्य चुनाव आयुक्त गोपालस्वामी के पास गई थीं। गोपालस्वामी ने भी माथे पर तिलक लगाकर सार्वजनिक बयान दिया था कि अगर उन्होंने हर विधानसभा क्षेत्र में तीन चार हजार फर्जी वोट डालने से नहीं रोका होता, तो उत्तर प्रदेश में चुनाव के मतलब बदल गए होते। यानी गोपालस्वामी ने अपरो़क्ष रूप से स्वीकार किया था कि अगर उन्होंने समाजवादी पार्टी के लोगों के ऊपर डण्डा नहीं चलाया होता, तो मुलायम सिंह सत्ता में आ गए होते। यह बात सही भी है कि गोपालस्वामी ही अकेला ऐसा कारक थे, जिसने मायावती को सत्ता दिलाई। अगर चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश में कथित निष्पक्षता नहीं दिखाई होती और पिछड़े व अल्पसंख्यक मतदाताओं को केन्द्रीय बलों का खौफ दिखाकर, स्वयं माथे पर लम्बा तिलक लगाकर यह संकेत न दिया होता, कि तिलक वाले ( ब्राह्मण) अब दलितों के वोट डलवाएंगे, तो मायावती 2007 का विधानसभा चुनाव बुरी तरह हार गई होतीं। याद है कि उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की घोषणा से पहले समाजवादी पार्टी की सरकार बनने के तीन साल पूरे होने पर सपा कार्यालय में एक कार्यक्रम का आयोजन हुआ था, जिसमें प्रदेश के मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक ने भी शिरकत की थी। इस पर बहन जी ने जबर्दस्त हंगामा मचाया था। उच्च न्यायालय द्वारा इन अधिकारियों को क्लीन चिट देने के बावजूद, आयोग ने इन अधिकारियों को हटा दिया था। आयोग के इस फैसले के विरोध में तत्कालीन पुलिस महानिदेशक बुआ सिंह ने अपने रिटायरमेन्ट से कुछ दिन पूर्व ही नौकरी से त्यागपत्र दे दिया था। तब बहन जी के लिए चुनाव आयोग पाक-साफ और निश्पक्ष था। हालांकि बुआ सिंह मायावती के ही नजदीकी माने जाते थे। लेकिन सवाल यह है कि क्या चुनाव आयोग वाकई में निष्पक्ष है? पिछले घटनाक्रम पर नजर दौड़ाएं, तो जाहिर हो जाता है कि न तो चुनाव आयोग निष्पक्ष है और न राजनीतिक दल ईमानदार। याद कीजिए कि जब मुलायम सिंह के मुख्यमंत्रित्वकाल में उनके चहेते अफसर हटाए गए थे तब उनका जवाब था कि उत्तर प्रदेश के अफसर बहुत काबिल हैं और आयोग राजनीतिक दवाब में ऐसा कर रहा है। अगर तब अफसर बहुत काबिल थे, तो क्या मुलायम सिंह के सत्ताच्युत होते ही सारे अफसर नालायक हो गए? दरअसल चाहे मायावती हों या मुलायम या अन्य कोई नेता, जिसकी जहां सरकार है वह, वहां अफसरों का नाजायज इस्तेमाल करके ही चुनाव जीतना चाहता है, अपनी नीतियों, कार्यक्रम और कार्यकत्र्ताओं के बल पर नहीं। याद है मुलायम सिंह ने मुख्यमंत्री रहते हुए अपने कार्यकत्र्ताओं को हिदायत दी थी, कि वे अफसरों पर दबाव नहीं बनाएं। आखिर क्यों? इसी तरह अभी बमुश्किल दो महीने हुए होंगे, जब गोपालस्वामी ने नवीन चावला के खिलाफ राष्ट्रपति को सिफारिश की थी। तब भाजपा ने कांग्रेस पर आरोप लगाया था, कि वह संवैधानिक पदों का अपमान कर रही है। लेकिन जब उन्हीं गोपालस्वामी ने वरुण गांधी के खिलाफ फैसला दे दिया तो भाजपा संवैधानिक पदों की बेइज्जती पर उतर आई और चुनाव आयोग की हदें तय करने की बहस की मांग करने लगी। चुनाव आयोग से पंगा लेने में अपने वामपंथी दल भी पीछे नहीं हैं। जब बंगाल विधानसभा के चुनाव हुए तो तृणमूल कांग्रेस की शिकायतों के आधार पर आयोग ने बंगाल में पर्यवेक्षक भेजने का ऐलान किया। पलटवार करते हुए मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने घोषणा कर दी कि चुनाव आयोग के विशेष पर्यवेक्षक बंगाल में धुसे, तो गिरफतार कर लिए जाएंगे। बाद में बमुश्किल यह टकराव रोका गया और पर्यवेक्षकों की निगरानी में ही चुनाव हुए। लेकिन वरुण मसले पर वामपंथी दल भी चुनाव आयोग के एकदम अनुशासित विद्यार्थी बन गए। जहां तक आयोग की निष्पक्षता का सवाल है, तो यह निष्पक्षता उसके कार्यकलाप में दिखनी भी चाहिए। लेकिन अक्सर होता यह है, कि निष्पक्षता साबित करने के अतिउत्साह में ऐसा आभास होने लगता है, कि आयोग किसी एक दल का पक्षधर बन गया है। और कभी-कभी होता भी ऐसा ही है। छपरा में पिछले चुनाव में भाजपा नेता राजीव प्रताप सिंह रूढ़ी की शिकायत पर आयोग ने निश्पक्षता दिखाने के चक्कर में लालू यादव की ऐसी तैसी कर दी। लेकिन नतीजा क्या हुआ? रूढ़ी तब भी बुरी तरह हारे। रूढ़ी को हारना पहले भी था, बाद में भी हारे और अब भी हारेंगे, लेकिन आयोग की तो भद्द पिटी। ठीक इसी तरह तृणमूल की शिकायत पर आयोग ने बंगाल की माकपा सरकार को नाकों चने चबवा दिए। यह हवा बनाई गई कि इस बार माकपा की सरकार उखड़ जाएगी, क्योंकि आयोग माकपा की गुण्डागर्दी पर रोक लगाएगा। लेकिन माकपा के लिए आयोग का यह कदम वरदान साबित हुआ। स्वयं आयोग के तत्कालीन पर्यवेक्षक केजे राव ने यह स्वीकारोक्ति की थी कि तृणमूल की 99 प्रतिशत शिकायतें फर्जी थीं और गुण्डागर्दी भी तृणमूल ही कर रही थी। जबकि माकपा जो शिकायतें करती थी, वह तथ्यों पर आधारित होती थीं और सही होती थीं। देखने में आया कि आयोग की सख्ती के बावजूद माकपा ने 51 प्रतिशत मत लेकर यह चुनाव जीता। आयोग की निष्पक्षता पर संदेह करने का कारण जायज है। टी एन शेषण को चुनाव सुधारों का जनक माना जाता है। लेकिन उनकी निष्पक्षता की कलई तब खुली, जब वे शिवसेना के टिकट पर चुनाव लड़े। एम एस गिल तो घोषित कांग्रेसी हो ही गए हंै। गोपालस्वामी भी दस पांच दिन में अपने रिटायरमेन्ट के बाद भगवा रंग में रंग जाएंगे। ऐसे में काहे की निष्पक्षता और काहे की ईमानदारी!!!!!

शनिवार, 4 अप्रैल 2009

बाप पारसी मां सिख, भाजपा का छद्म हिंदुत्व


बाप पारसी मां सिख, भाजपा का छद्म हिंदुत्व
- अमलेन्दु उपाध्याय-
वरुण गांधी के आग उगलू भाषण पर उनकी बहन प्रियंका गांधी ने बहुत नपे तुले शब्दों में अपने भाई को नसीहत दी, कि भाई वरुण पहले गीता पढो। जाहिर है कि इस नसीहत से हिन्दुओं के स्वयंभू ठेकेदारों को आग बबूला होना ही था। सो रविशंकर प्रसाद ने तुरन्त मोर्चा संभालते हुए फरमान जारी कर दिया कि प्रियंका को हिन्दू धर्म पर बोलने का अधिकार नहीं है।अब चूंकि रविशंकर प्रसाद नागपुरी हिन्दुत्व के प्रमुख ठेकेदारों में हैं, सो उनसे ही सवाल पूछा जाना चाहिए कि भाई साहब, प्रियंका गांधी को किस आधार पर हिन्दू धर्म पर बोलने का अधिकार नहीं है? जाहिर है कि प्रसाद का बयान क्या होगा! यही कि फिरोज गांधी पारसी थे, सोनिया गांधी ईसाई हैं और प्रियंका ने भी ईसाई से विवाह किया है, इसलिए प्रियंका को हिन्दू धर्म पर बोलने का अधिकार नहीं है।बात तो सही लगती है। लेकिन इस आधार पर तो वरुण गांधी को भी हिन्दू धर्म का ठेकेदार बनने की इजाजत नहीं दी जा सकती है। उनके दादा फिरोज गांधी पारसी थे, मां सिख हैं, फिर वरुण को हिन्दुओं की ठेकेदारी नागपुरियों ने कैसे थमा दी? दरअसल अपने नागपुरी भाई भी फर्जी हिन्दू हैं और छद्म साम्प्रदायिक हैं, जो सिर्फ सत्ता पाने के लिए तो हिन्दू होने का चोला ओढ लेते हैं, लेकिन जब जरूरत होती है, तो हिन्दुत्व का चोला उतार फेंकने में तनिक भी देर नहीं लगाते हैं। लेकिन रविशंकर प्रसाद जी ने यह नहीं बताया कि एक सलीम पठान या सलीम पठेरा नाम के व्यक्ति के चचिया श्वसुर को हिन्दुत्व की ठेकेदारी कैसे मिल गई? यह भाजपा की छद्म साम्प्रदायिकता ह,ै कि बाप पारसी, मां सिख, चाचा अकबर अहमद डम्पी, यह है भाजपा का फर्जी हिन्दुत्व।दरअसल नागपुरी भाइयों ने वरुण गांधी का अपने तरीके से प्रयोग कर लिया और अब उन्हें बीच मंझदार में छोड देंगे। वरुण यह नह जानते कि ये नागपुरी जब बलराज मधोक के नहीं हुए, उमा भारती के नहीं हुए, कल्याण सिंह के नहीं हुए, फिर उन वरुण गांधी के कैसें हो जाएंगे, जिनके पिता संजय गांधी ने आपातकाल के दौर में ६० साल से ऊपर के नेकर वालों को पकड-पकडकर जबर्दस्ती नसबंदी कराई थी और जिनसे घबराकर ही नागपुरी भाई आपातकाल को अनुशासन पर्व कहकर माफी मांगने लगे थे। अब नागपुरी भाई संजय गांधी का कुछ न बिगाड पाने की खुन्नस वरुण से पूरी कर रहे हैं और वरुण नादानी में इस चाल को समझ नहीं पाए।वरुण ने अपना राजनीतिक कैरियर अपने हाथों चौपट कर लिया है। जिस रास्ते पर वे चले हैं उस रास्ते से लौट पाना मुमकिन नहंीं। शेर की सवारी करना वरुण को काफी महंगा पडेगा। उन्हें कल्याण सिंह से शिक्षा लेनी चाहिए थी कि किस कदर हिंदू उग्रवादियों का हीरो शेर की सवारी से उतरने के लिए बेताब है, लेकिन उतर नहीं पा रहा। हो सकता है कि आग उगलकर वरुण यह चुनाव जीत जाएं, यह भी हो सकता है कि भाजपा उ०प्र० में दो-चार सीटें और जीत ले और पन्द्रहवीं लोकसभा में उ०प्र० से अपना खाता इकाई से दहाई में भी बदल ले। लेकिन क्या भाजपा वरुण को जिन्दगी भर ढोएगी! बिलकुल नहीं, तब वरुण क्या करेंगे? क्योंकि प्रवीण तोगडया बनकर, या अशोक सिंघल बनकर कुछ समय तक तो सत्ता का मजा चखा जा सकता है, कुछ समय तक हीरो भी बना जा सकता है, लेकिन देश की राजनीति आग उगलकर नहीं की जा सकती। वरना रामरथ के यात्री और साम्प्रदायिकता के अनन्यतम भक्त अडवाणी जी अपनी उन्मादी की छवि से क्यों उबरना चाहते हैं? पाकिस्तानी वेबसाइटों पर उनके विज्ञापन क्या कर रहे हैं?वरुण को यह याद नहीं रहा कि वे उस उत्तर प्रदेश की सरजमीं पर आग उगल रहे हैं जो हिन्दुस्तान की गंगा-जमुनी तहजीब की जमीन है। उ०प्र० गुजरात नहीं है, जहां कोई तोगडया या मोदी एकछत्र राज करता रहे।सत्य को न तो बढाया जा सकता है और न घटाया जा सकता है। अगर सत्य को घटाने या बढाने का प्रयास किया जाता है तो वह सत्य नहीं रह जाता। लेकिन झूठ की कोई इंतिहा नहीं होती, उसे जितना चाहो खींचा जा सकता है। लेकिन अपने नागपुरी भाइयों को सत्य को कम-ज्यादा करने में महारत हासिल है। ये जिसे हरा नहीं पाते, उसे मिलकर, दोस्ती करके हरा देते हैं। और वरुण के मसले पर भी नागपुरी भाइयों ने यही किया है। संजय गांधी का कुछ न बिगाड पाने का मलाल, उन्होंने दूर कर लिया है और एक उभरते हुए नौजवान नेता की राजनीति की हत्या कर दी है। मेनका ने बिल्कुल ठीक कहा है कि उनका बेटा अभिमन्यु की तरह घिर गया है। लेकिन इस अभिमन्यु को धेरने वाले कोई और नहीं उसके शकुनि मामा हैं। वरुण के भाई राहुल ने काफी गम्भीर और विनम्र प्रतिक्रिया देकर सिर्फ इतना कहा कि - वरुण ने हैरान किया है। एक शरीफ बाप का शरीफ बेटा इससे ज्यादा कुछ नहीं कह सकता, समझे ’’वरुण फिरोज गांधी‘‘!!!!!

बुधवार, 18 मार्च 2009

अपना अपना तीसरा मोर्चा

अपना अपना तीसरा मोर्चा
अमलेन्दु उपाèयाय

चौदहवीं लोकसभा के नजारे को देखकर यह कयास नहीं लगाया जा सकता था कि पंद्रहवीं लोकसभा के लिए होने वाले चुनाव में तीसरा मोर्चा कोई मूर्त रूप ले पाएगा। लेकिन कर्नाटक के तुमकुर में पूर्व प्रèाानमंत्री एच.डी.देवगौड़ा के बुलावे पर जिस प्रकार 4 वामपंथी दलों समेत 8 क्षेत्रीय दल एक मंच पर आए और एकता का ऐलान किया उसने एक झटके में यूपीए और एनडीए की नींद हराम कर दी है। परमाणु करार पर यूपीए सरकार को आर-पार की चुनौती देने वाले माकपा महासचिव प्रकाश कारत की मेहनत ने असर दिखाना शुरू कर दिया है।
तुमकुर में भले ही बसपा प्रमुख मायावती और अन्नाद्रमुक प्रमुख जयललिता न पहुंची हाें, परंतु उनके प्रतिनिधि के रूप में सतीशचंद्र मिश्रा और मैत्रेयन पहुंचे। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल के पुत्र कुलदीप बिश्नोई की हरियाणा जनहित कांग्रेस के नुमाइंदे की उपस्थिति भी भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए बैचेनी पैदा करने वाली है। लेकिन चुनाव परिणाम आने के बाद भी इन सभी को एक जुट रखना टेढ़ी खीर है। लगता है प्रकाश कारत ने मेंढकों को एक तराजू में तौलने का दुष्कर कार्य हाथ में ले लिया है।
फिलहाल, तीसरे मोर्चे का जो स्वरूप उभर रहा है वह चुनाव बाद भी बरकरार रहेगा, कहना मुश्किल है। तीसरा मोर्चा किस करवट बैठेगा यह पंद्रहवीं लोकसभा के चुनाव परिणाम तय करेंगे
आगामी लोकसभा चुनाव के परिणाम के विषय में अगर कोई भविष्यवाणी की जा सकती है तो सिर्फ यह कि केंद्र में सत्ताारूढ़ यूपीए और प्रमुख विपक्षी गठबंधन एनडीए में से किसी को भी चुनाव में स्पष्ट जनादेश की प्राप्ति नहीं होगी और सत्ताा का मुख्य नियंत्रण क्षेत्रीय दलों या तीसरे मोर्चे के हाथ में होगा। चुनाव से पहले बने गठबंधन चुनाव बाद टूटेंगे और नए सिरे से नए गठबंधन बनेंगे। ऐसे में जितने दल हैं उनसे ज्यादा मोर्चे हैं।
फिलहाल, वामपंथी दल पूरी ताकत के साथ भाजपा और कांग्रेस के विकल्प के रूप में तीसरा मोर्चा बनाने की कवायद में जुटे हैं। लेकिन यह कवायद कितनी सफल होगी, भविष्य ही बताएगा। परमाणु करार के मुíे पर कांग्रेस से गलबहियां करने की पूर्व संèया तक समाजवादी पार्टी तीसरे मोर्चे की मुख्य पैरोकार थी और उसके अèयक्ष मुलायम सिंह यादव उत्तार प्रदेश में यूएनपीए की रैलियां कराकर जयललिता, चंद्रबाबू नायडू और वृंदावन गोस्वामी के हिंदी भाषणों द्वारा तीसरा मोर्चा मजबूत कर रहे थे।
लेकिन जैसे ही अमर सिंह की अमेरिका यात्रा के बाद सपा ने परमाणु करार पर मनमोहन सिंह के बगलगीर होने का ऐलान किया तो रात ही रात में सपा के लिए तीसरा मोर्चा बेकार की बात हो गई।
सपा द्वारा रिक्त की गई जगह को उसकी धुर विरोधी बसपा ने पूरा किया और वाम दलों ने बसपा को तीसरे मोर्चे का अगुआ बना दिया। लेकिन अपनी आदतों से लाचार बसपा प्रमुख मायावती इस मोर्चे की कब तक खेवनहार रहेंगी, यह तो स्वयं मायावती को भी नहीं पता है। उत्तार प्रदेश में तीसरे मोर्चे की टांग तोड़ने का काम मायावती ने प्रदेश की सभी 80 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा के साथ किया। अब उत्तार प्रदेश में एक तीसरा मोर्चा मायावती का है तो दूसरा वामपंथी दलों का और तीसरा नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी, भारतीय समाज पार्टी जैसे छोटे-छोटे जातीय दलों का। वहां चौथा तीसरा मोर्चा 'मिल्ली महाज' बन गया है, जिसने प्रदेश की सभी 80 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। देखना यह है कि चुनाव बाद इन मोचो± का क्या हश्र होता है।
उत्तार प्रदेश की तरह ही बिहार में भी कई तीसरे मोर्चे रोज बन-बिगड़ रहे हैं। यूं तो रामविलास पासवान की लोजपा और लालू प्रसाद यादव की राजद केंद्र की यूपीए का हिस्सा हैं, लेकिन आज तक के जो हालात हैं, उनमें लोजपा और राजद में से एक कांग्रेस के साथ रहेगा और एक तीसरा मोर्चा बनाएगा। बिहार में भाकपा माले और भाकपा ने एक साथ मिलकर लड़ने का ऐलान किया है और संभावना है कि माकपा भी इस मोर्चे में शामिल होगी। उधर चर्चा है कि बिहार के उपमुख्यमंत्री और भाजपा नेता सुशील मोदी, बिहार के कल्याण सिंह बनने वाले हैं और उनका भी अपना तीसरा मोर्चा होगा।
बिहार के पड़ोसी राज्य झारखंड में भी तीसरे मोर्चे ने कमर कस ली है। यहां कमान राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के विद्रोही नेता बाबूलाल मरांडी के हाथों में है। यूं तो गुरूजी के नाम से प्रसिध्द शिबू सोरेन का झारखंड मुक्ति मोर्चा यूपीए का हिस्सा है, लेकिन कब वह तीसरे मोर्चे में तब्दील हो जाए कहा नहीं जा सकता है।
उधर ताजा घटनाक्रम में उड़ीसा में एनडीए बिखर गया है और ग्यारह वषो± के बाद अचानक बीजू पटनायक के पुत्र और राज्य के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को धर्मनिरपेक्षता याद आ गई है। बिना कोई देर किए जेडी ¼,l½ नेता हरदनहल्ली डोड्डेगौड़ा देवगौड़ा ने बीजद को तीसरे मोर्चे में गोद लेने का नेह निमंत्रण भेज दिया है और माकपा नेता सीताराम येचुरी का दावा है कि वामदलों के साथ बीजद का सीटों पर तालमेल हो गया है। सो, अब उड़ीसा में भी तीसरा मोर्चा हुंकार भर रहा है। उड़ीसा में झारखंड मुक्ति मोर्चा हाल तक की सूचना के अनुसार तीसरे मोर्चे का हिस्सा होगा।
कर्नाटक में भाजपा के साथ मिलकर सरकार बना चुके और केंद्र में कांग्रेस के सहयोग से प्रधानमंत्री रह चुके एच.डी. देवगौड़ा तीसरे मोर्चे की नैया के खिवैया हैं। विधानसभा चुनाव में बुरी तरह मात खाए देवगौड़ा क्या गुल खिलाते हैं यह तो भविष्य ही बताएगा, लेकिन किसान नेता की छवि रखने वाले और हिंदी न जानने वाले देवगौड़ा चमत्कारी नेता हैं, जो रामकृष्ण हेगड़े और एस.आर. बोम्मई जैसे दिग्गज कन्नड़ नेताओं को पटखनी देकर उरूज तक पहुंचे। फिलहाल, देवगौड़ा को आशा है कि कर्नाटक की जनता उन्हें प्रधानमंत्री बनाने के लिए जिताएगी, और कांग्रेस भाजपा को रोकने के लिए, तो बसपा मुलायम सिंह को रोकने के लिए और भाकपा वाम-जनतांत्रिक गठबंèान के लिए उन्हें प्रधानमंत्री बनाएगी; और ऐसा नहीं हुआ तो देवगौड़ा किस करवट बैठेंगे यह समय तय करेगा। फिलवक्त तो वे तीसरी करवट बैठे हैं।
दक्षिणी भारत तो तीसरे मोर्चे की उर्वरा भूमि और प्रयोगशाला रहा है। सात दलों के सात घोड़ों के रथ 'राष्टªीय मोर्चा' की लगाम एक समय में तेलुगु फिल्मों के स्टार नंदमूरि तारक रामाराव के हाथ में रही थी। बाद में रामाराव का नाश करने वाले उनके दामाद चंद्रबाबू नायडू के हाथों में संयुक्त मोर्चे की कमान रही। यह दीगर बात है कि बाद में यही नायडू राजग बनाने वाले प्रमुख आदमी थे। लेकिन भाजपा के साथ जाने के कारण मुस्लिम मतदाताओं द्वारा दुरियाए गए तेदेपा प्रमुख अब तीसरे मोर्चे के झंडे तले हैं। पहले नायडू की मुसीबत बने तेलंगाना राष्टª समिति ¼टीआरएस½ नेता चंद्रशेखर राव तो उनके तीसरे मोर्चे में आ गए हैं, लेकिन एक अन्य फिल्म स्टार चिरंजीवी की नवजात पार्टी 'प्रजाराज्यम' ने उनकी नींद हराम कर दी है। माकपा और भाकपा स्टªेटजी के तहत दोनों तीसरे मोर्चों के साथ हैं। हैदराबाद शहर में सलाहउíीन औबेसी के पुत्र सबाहउíीन औबेसी की एमआईएम का अपना अलग तीसरा मोर्चा है।
समंदर किनारे के एक अन्य राज्य तमिलनाडु में भी तीसरा मोर्चा तैर रहा है। अन्नाद्रमुक के नेतृत्व में यहां तीसरे मोर्चे की कमान जयललिता के हाथों में है। एनडीए गठबंधन में रहकर भाजपा नेतृत्व को खून के घूंट पिलाने वाली अम्मा तीसरे मोर्चे को कितना रुलाएंगी, पता नहीं। उधर अम्मा के दुश्मन नंबर-वन द्रमुक का भी श्रीलंका मसले को लेकर यूपीए के साथ संबंध दोस्ताना नहीं है। सो, हो सकता है कि चुनाव से ऐन पहले द्रमुक का भी अपना तीसरा मोर्चा हो।
अगर समंदर के ठीक विपरीत सरहदी जम्मू कश्मीर की बात की जाए तो वहां तीसरा मोर्चा बिखर चुका है। उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली नेशनल कांफ्रेंस यूएनपीए का हिस्सा थी, लेकिन परमाणु मसले पर कांग्रेस के साथ जाने के बाद उसने यूपीए का हिस्सा बनना स्वीकार किया है। लेकिन घाटी में कांग्रेस के साथ अगर सीटों का तालमेल नहीं हुआ तो उमर अब्दुल्ला का भी तीसरा मोर्चा होगा।
महाराष्टª में यों तो शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी, यूपीए का हिस्सा है, लेकिन सीट बंटवारे पर कांग्रेस से खटपट के चलते हो सकता है कि एनसीपी का सपा और रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के साथ तीसरा मोर्चा बन ही जाए।
अभी तक मèयप्रदेश साधारणत: द्विध्रुवीय राजनीति की डगर पर चलता रहा है, लेकिन भाजपा की विद्रोही नेता उमा भारती की भारतीय जनशक्ति पार्टी मèय प्रदेश में तीसरी ताकत बन रही है। पार्टी मèयप्रदेश की सभी सीटों के साथ देश भर में लगभग 150 सीटों पर चुनाव लड़ेगी।
तीसरे मोर्चे के मुख्य पैरोकार वामदलों की रणनीति येन केन प्रकारेण कांग्रेस और भाजपा को ज्यादा से ज्यादा नुकसान पहुंचाने की है, ताकि क्षेत्रीय दल मजबूती के साथ उभरें और फिर चुनाव बाद तीसरा मोर्चा मूर्त रूप ले। फिलहाल, तीसरे मोर्चे का जो स्वरूप उभर रहा है वह चुनाव बाद भी बरकरार रहेगा, कहना मुश्किल है। तीसरा मोर्चा किस करवट बैठेगा यह पंद्रहवीं लोकसभा के चुनाव परिणाम तय करेंगे।

[ यह रिपोर्ट "प्रथम प्रवक्ता" पाक्षिक में प्रकाशित हुयी ]

शुक्रवार, 6 मार्च 2009

क्या कल्याण को माफ़ी जायज़ है ?

क्या कल्याण को माफी जायज है?
- अमलेन्दु उपाध्याय -भदोही उपचुनाव में बसपा के खाते से सीट झटककर समाजवादी पार्टी गदगद है और उसके बडे नेता अब फतवा जारी कर रहे हैं कि प्रदेश की जनता बसपा से छुटकारे के लिए सपा को वोट करेगी और कल्याण सिंह से दोस्ती का मुसलमान वोट पर कोई असर नहीं पडा है।
एकबारगी तो लगता है कि सपा का सोचना सही है। लेकिन इतिहास बताता है कि राजनीति के सवाल उतने सीधे होते नहीं जितने दिखाई देते हैं। अगर भदोही का उपचुनाव बैरोमीटर है तो बलिया संसदीय उपचुनाव बैरोमीटर साबित क्यों नहीं हुआ? बलिया चुनाव के बाद प्रदेश में दो बार उपचुनाव हुए और दोनों उपचुनाव में सपा का बहुत बुरा ही हाल हुआ केवल मुलायम द्वारा रिक्त की गई गुन्नौर सीट ही सपा बचा पाई और वहां भी उसका प्रत्याशी बहुत कम अन्तर से जीता।
इस सबसे परे लगता है कि उत्तर प्रदेश में दलित के बाद सबसे बडा वोट बैंक समझे जाने वाला मुसलमान पशोपेश में है कि लोकसभा चुनाव में किधर जाए! उसकी प्राथमिकता आज भी भाजपा को हराना है, लेकिन पिछले दह दशक से जिस तरह से उसे छला गया है उससे वह आहत है। इसका फायदा उठाकर मुस्लिम कट्टरपंथियों की तरफ से भी अपनी पार्टी का राग अलापा जा रहा है।
१९८४ के लोकसभा चुनाव तक मुसलमान उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का वोट बैंक हुआ करता था जिसके बल पर कई दशक तक कांग्रेस ने देश पर राज किया। लेकिन राजीव गांधी के शासनकाल में कांग्रेस ने हिंदू कट्टरपंथियों के सामने घुटने टेकते हुए जब बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाया और अयोध्या में राममंदिर का शिलान्यास कराकर अयोध्या से अपने चुनाव अभियान की शुरुआत की तब यह वोट कांग्रेस से खिसकने लगा। बाद में जब नरसिंहाराव ने बाबरी मस्जिद गिरवाने में अप्रत्यक्ष सहयोग दिया तो मुसलमान पूरी तरह से उससे दूर हो गया और मुलायम सिंह के साथ १९९३ के विधानसभा चुनाव में चला गया।
छह फीसदी यादव मतदाताओं के बल पर समाजवादी पार्टी नाम की प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी चलाने वाले मुलायम सिंह ने पन्द्रह बरस तक मुसलमानों को भाजपा का खौफ और बाबरी मस्जिद की शहादत की याद दिलाकर छला। छह दिसम्बर १९९२ के बाद से लगातार मुलायम सिंह मुसलमानों के हीरो थे, भले ही उनकी कैबिनेट में मौ. आजम खां के अलावा किसी दूसरे मुसलमान को स्थान नहीं मिलता था। परंतु सपा में अमर सिंह का प्रकोप बढने के साथ मुलायम का ग्राफ विगत ५-६ वर्षों में गिरने लगा था, और अब बाबरी मस्जिद के कातिल कल्याण सिंह से हाथ मिला लेने के बाद मुसलमान स्वयं को ठगा हुआ महसूस कर रहा है।
यहां यह याद दिलाना आवश्यक है कि १९९६ के आसपास वह समय था जब उत्तर प्रदेश के मुसलमान ने तमाम कट्टरपंथी मुस्लिम नेताओं के फतवे के बावजूद समाजवादी पार्टी को वोट दिया था। निश्चित रूप से इस स्थिति के लिए बहुत बडा श्रेय सपा के फारब्राण्ड नेता मौ. आजम खां को जाता है। यह आजम खां के सहारे का सम्बल था कि मुलायम सिंह ने एक समय में शाही इमाम को चुनौती के अंदाज में कहा था कि इमाम साहब इमामत कर और राजनीति हमें करने दें।
मुलायम की अवसरवादिता तब काफी कुछ खुली जब परमाणु करार पर वे अपने समाजवाद, लोहिया के सिद्धान्त और साम्राज्यवाद विरोध की नीतियों की ऐसी तैसी करके मनमोहन और अमरीका की बगल में खडे हो गए। करार पर ही मुलायम को लग गया था कि अब मुसलमान उनसे दूर हो गया है। इसीलिए ठीक डेढ दशक पहले जो मुलायम सिंह चुनौती के अंदाज में कह रहे थे कि इमाम साहब इमामत करें वही मुलायम सिंह करार पर उन्हीं इमाम के दरवाजे पर गिडगिडाने गए।
करार पर मुलायम सिंह की उलटबांसी से तय हो गया था कि उन्हें अब मुस्लिम वोटों की दरकार नहीं है और कल्याण सिंह से हाथ मिलाकर उन्होंने भविष्य की अपनी राजनीति का साफ संकेत दे दिया है। आज मुलायम सिंह ने कल्याण सिंह को बाबरी मस्जिद के कत्ल के इल्जाम से बरी कर दिया है। लेकिन वो हिंदुस्तानी बाबरी मस्जिद के उस कातिल को कैसे माफ कर दे जिसके कारण ६ दिसम्बर १९९२ के बाद पूरे दो माह तक चले साम्प्रदायिक दंगों में देश भर में चुनचुनकर मुसलमानों का कत्ल किया गया हो, मुंबई, सूरत और अहमदाबाद की सडकों पर औरतों और लडकियों को निर्वस्त्र करके कांच की बोतलों पर नचाया गया हो और उनकी वीडियो रिकॉर्डिंग भी की गई हो, सडकों पर टायर जलाकर जिंदा आग में झोंक दिया गया हो। इन हादसात के लिए मुलायम सिंह तो कल्याण सिंह को माफ कर सकते हैं लेकिन उत्तर प्रदेश का मुसलमान कैसे करे?
तमाशा यह है कि मुलायम ने एक बार फिर दांव चला और कल्याण से माफीनामा जारी कराया। लेकिन इस माफीनामे में कहीं भी ’बाबरी मस्जिद‘ शब्द का प्रयोग नहीं किया गया। कहीं भी बाबरी मस्जिद गिराने के लिए माफी नहीं मांगी गई। कल्याण ने कहा कि उन्होंने तो ६ दिसम्बर १९९२ को ही घटना की जिम्मेदारी लेनी थी। अगर ऐसा ही था तो कल्याण सिंह भाजपा में अब तक क्या कर रहे थे? ६ दिसम्बर १९९२ की जिम्मेदारी लेकर एक बार फिर से स्वयं को हिंदू आतंकवादियों का कर्णधार साबित करने का ही प्रयास किया है। लिब्रहान आयोग के समक्ष गवाही में भी उन्होंने कोई खेद प्रकट नहीं किया है, बल्कि हर साल ६ दिसम्बर को शौर्य दिवस मनाया है। क्या अगली ६ दिसम्बर को कल्याण फिर से शौर्य दिवस नहीं मनाएंगे?
उधर मुलायम सिंह ने यह कहकर कि अगर भाजपा ’यूनिफाइंग सिविल कोड‘ और धारा ३७० को छोड दे तो वे उससे भी समझौता करने को तैयार हैं, अपनी भविष्य की राजनीति तय कर ली है। अगर जरूरत पडी तो सत्ता के लिए भाजपा इन दो मुद्दों को तिलांजलि भी दे देगी और मुलायम भाजपा की गोद में बैठ जाएंगे! लेकिन यह याद रखना होगा कि जब नरेन्द्र मोदी ने गुजरात में कत्ल-ए-आम कराया तब भाजपा के एजेंडे में ३७० और यूनिफाइं्रग सिविल कोड और राम मंदिर नहीं थे!् आखिर कहना क्या चाहते हैं मुलायम?
अगर मुलायम की कल्याण से दोस्ती हो सकती है, अपनी चालीस साल की कांग्रेस विरोध की राजनीति और डॉ. लोहिया के गैर कांग्रेसवाद को तिलांजलि देकर एक दलित महिला से घबराकर मुलायम कांग्रेस के साथ जा सकते हैं तो क्या लोकसभा चुनाव के बाद मुलायम सिंह के लिए भाजपा पाक साफ नहीं हो सकती?
( लेखक राजनीतिक समीक्षक हैं और पाक्षिक पत्रिका ’प्रथम प्रवक्ता‘ के संपादकीय विभाग में हैं)

यह लेख राजस्थान पत्रिका के सहयोगी प्रकाशन डेली न्यूज़ , www.mediakhabar.com, www.newswing.com, www.jansamachar.net, www.khabarexpress.com, में प्रकाशित हुआ