पत्रकारिता के शिखर पुरुष प्रभाष जोशी
हिन्दी पत्रकारिता के भीष्म पितामह प्रभाष जोशी हमेशा के लिए इस दुनिया को छोड़ गए हैं। उनके साथ ही 'मिशन पत्रकारिता' के एक पूरे युग का अंत हो गया है। प्रभाषजी पत्रकारिता के भीष्म पितामह जरूर थे लेकिन जब-जब पत्रकारिता की द्रोपदी की लाज लुटी वह द्रोपदी की रक्षा के लिए आगे बढ़कर आए। अपने जीवन के अंतिम क्षणों में भी वह अखबारों में कम होती संपादक की भूमिका और अखबार मालिकों के पैसे लेकर खबरें बेचने के कारनामों के खिलाफ लड़ते रहे
अमलेन्दु उपाध्याय
अब नहीं रहे। यह खबर सुनने में अटपटी लगती है पर है सच। प्रभाषजी के साथ पत्रकारिता के एक पूरे युग का अन्त हो गया और उनका यूं अचानक चले जाना उन लोगों के लिए किसी वज्रपात से कम नहीं है जो पत्रकारिता को एक मिशन मानकर और आम आदमी का सच्चा प्रतिनिधिा मानकर काम करते हैं।
प्रभाषजी, राजेन्द्र माथुर के बाद उस मायने में सच्चे पत्रकार थे जो पत्रकारिता के जरिए सार्थक दिशा में समाज बदलने की चाहत रखते थे और कुल मिलाकर खांटी पत्रकार थे। ऐसा भी नहीं है कि राजेन्द्र माथुर या प्रभाषजी के अलावा समकालीन दौर में पत्रकारिता के क्षेत्र में बड़े नाम वालों की कोई कमी हो। अज्ञेय, धार्मवीर भारती, कमलेश्वर, रघुवीर सहाय कुछ ऐसे लोग रहे जिन्होंने पत्रकारिता के नए मानदण्ड स्थापित किए। लेकिन प्रभाषजी को एक बात जो बाकियों से अलग कर उन्हें राजेन्द्र माथुर की श्रेणी में रखती है, वो यह है कि प्रभाषजी सौ फीसदी पत्रकार थे। वह न तो साहित्य में नाम कमाने के बाद पत्रकारिता में आए थे और न ही साहित्य में विफल होने के बाद। जिस तरह रघुवीर सहाय की कविता को आम आदमी का रोजनामा तथा 'राजनीति और विरोधा' की कविता कहा जाता है ठीक उसी तरह प्रभाषजी की पत्रकारिता आम आदमी के दुख दर्द के लिए थी। प्रभाषजी ने अपने लगभग चार दशक की पत्रकारिता के दौर में पत्रकारों की जो एक पौधा लगाई वह भी सौ फीसदी सच्चे पत्रकारों की थी। यह प्रभाषजी का ही कौशल था कि उनकी टीम में अगर राम बहादुर राय, बनवारी थे तो अभय कुमार दुबे, अंबरीश कुमार जैसे लोग भी थे। आलोक तोमर, प्रदीप सिंह, सुशील कुमार सिंह, निरंजन परिहार, उमेश जोशी, ओम थानवी प्रभातरंजन दीन जैसे लोग प्रभाषजी की ही देन हैं।
मेरा प्रभाषजी से सीधाा कभी कोई वास्ता तो नहीं रहा लेकिन एक खुशी है कि उनके जीवन की आखिरी मुहिम, जिसमें उन पर काफी हमले भी हुए, में मैं भी शामिल रहा। विगत लोकसभा चुनाव में हिन्दी पट्टी में कई बड़े अखबारों ने पैसे लेकर खबरें छापीं। प्रभाषजी ने बाकायदा अखबारों के इस कारनामे के खिलाफ आंदोलन चलाया। उस वक्त मैं रामबहादुर राय जी द्वारा संपादित पत्रिका 'प्रथम प्रवक्ता' में था। राय साहब ने इस मुद्दे पर देश भर से जानकारी इकट्ठा करने और आई हुई खबरों को संपादित करने की जिम्मेदारी मेरे ऊपर ही डाली। इस दौरान एक घटना हुई जो प्रभाषजी के साथ साथ राय साहब की पत्रकारिता की भी पहचान कराती है। हमारे झारखंड के संवाददाता की खबर आई कि 'प्रभात खबर' में भी खबरें विज्ञापन के रूप में छपीं लेकिन उनके नीचे और ऊपर पीके मीडिया इनीशिएटिव लिखकर यह बताने का प्रयास किया गया कि यह खबर नहीं है।
ऐसे समय संकट इस बात का था कि 'प्रभात खबर' के संपादक हरिवंशजी, राय साहब के भी मित्र हैं और प्रभाषजी से भी उनका नजदीकी संबंधा था। मैंने राय साहब से कहा कि झारखंड से ऐसी खबर आई है क्या देना उचित रहेगा? राय साहब ने कहा कि जरूर दिया जाएगा। अगर खबर आई है तो वह किसी ने भी किया हो दिया जाएगा। इसके बाद सारी खबरें प्रभाषजी के भी पास गईं, जिनके आधाार पर उन्होंने अपना लेख लिखा। तभी अचानक 24 जून को मैंने प्रथम प्रवक्ता छोड़ दिया। लेकिन जब जुलाई के पहले हफ्ते में 'प्रथम प्रवक्ता' का अंक आया तो सारी खबरें ज्यों की त्यों अक्षरश: वैसी ही प्रकाशित हुईं जैसी मैंने संपादित की थीं। यह था प्रभाषजी का एक पत्रकार का रूप। अगर प्रभाषजी चाहते तो झारखंड की रिपोर्ट पर सवाल कर सकते थे, राय साहब से उसे न देने के लिए भी कह सकते थे। पर मिशन में मित्रता आड़े नहीं आई।
इसी तरह एक पूरी की पूरी पीढ़ी प्रभाषजी को पढ़ सुनकर ही पत्रकारिता में जवान हुई है और उसे पत्रकारिता के यह संस्कार कि जिस समय तुम पत्रकार हो उस समय तुम्हारा पहला और आखिरी धार्म पत्रकारिता ही है, प्रभाषजी ने ही दिए। इसलिए आज पत्रकारिता का जो वीभत्स कारपोरेटीक(त स्वरूप सामने आ रहा है उसमें प्रभाषजी हम जैसे उन पत्रकारों के रक्षा कवच थे जो पत्रकारिता को मिशन मानते हैं कमीशन नहीं। जाहिर है उनके जाने के बाद पत्रकारिता का स्वरूप और बदलेगा और नई चुनौतियां भी होंगी लेकिन प्रभाषजी सच्चे पत्रकारों के लिए प्रकाश स्तम्भ का काम करते रहेंगे।
amalendu@thesundaypost.in
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[ Published in “The Sunday Post” 22nd November issue]
शुक्रवार, 13 नवंबर 2009
पत्रकारिता के शिखर पुरुष प्रभाष जोशी
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संपादक
वेबसाइट संचालक अमलेन्दु उपाध्याय 30 वर्ष से अधिक अनुभव वाले वरिष्ठ पत्रकार और जाने माने राजनैतिक विश्लेषक हैं। वह पर्यावरण, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, युवा, खेल, कानून, स्वास्थ्य, समसामयिकी, राजनीति इत्यादि पर लिखते रहे हैं।
सोमवार, 9 नवंबर 2009
चिदंबरम के पीआर मीडिया धुरंधर
चिदंबरम के पीआर मीडिया धुरंधर
अमलेन्दु उपाधयाय
मानना पड़ेगा कि गृह मंत्री पी चिदंबरम का मीडिया प्रबंधन बहुत कमाल का है। कोई महीना भर भी तो नहीं हुआ होगा जब देश के चुनिन्दा संपादकों के साथ उनकी भेंटवार्ता हुई थी और नक्सलवाद को समूल नष्ट करने का इरादा गृह मंत्री ने इस भेंटवार्ता में जताया था। लेकिन इस भेंटवार्ता का अच्छा परिणाम लगभग दो हफ्ते बाद ही सामने आने लगा जब इन बड़े संपादकों में से कई चिदंबरम की नक्सलियों के खिलाफ हिंसक कार्रवाई करने के विचार के समर्थन में बहुत निर्लज्जता के साथ उतर आए और तथाकथित विकास के नाम पर निरीह आदिवासियों पर प्राणघातक हमले और देश में एक युध्द की वकालत करने लगे।
एक संपादक महोदय जो गुजरात दंगों के दौरान अपनी निष्पक्ष रिपोर्टिंग के लिए सुर्खियों में आए थे और बाद में मनमोहन सरकार के विश्वासमत के दौरान सांसदों की खरीद फरोख्त का स्टिंग ऑपरेशन का प्रसारणा अपने चैनल पर न करने के लिए सवालों के घेरे में आए थे, ने तो चाटुकारिता की सारी हदें पार करते हुए चिदंबरम की तुलना सरदार वल्लभ भाई पटेल से ही कर डाली। जबकि एक अन्य दूसरे बड़े संपादक महोदय, जिनके अखबार के लोकसभा चुनाव से ऐन पहले कई संस्करण प्रारम्भ हुए और अब बन्द होने वाले हैं तथा जो बहुत जल्दी मनमोहन सिंह- चिदंबरम के आशीर्वाद से राज्यसभा सदस्य बनने वाले हैं, ने भी बाकायदा लेख लिखकर सवाल खड़ा कर दिया कि पड़ोसी देश श्रीलंका की सरकार जब बड़ी सैनिक कार्रवाई करते हुए लिट्टे आतंकवादियों की पूरी जमीन साफ कर सकती है तो क्या भारत सरकार और सेना कुछ हजार नक्सलियों को हथियार डालने के लिए बाध्य नहीं कर सकती है?
इस प्रश्न का सम्यक उत्तर सिर्फ इतना हो सकता है कि श्रीलंका ने तो आज लिट्टे का सफाया किया है लेकिन हमारे देश ने ऐसी सैन्य कार्रवाई का खमियाजा डेढ़ दशक पहले ही राजीव गांधी की शहादत देकर और ऑपरेशन ब्लू स्टार का खमियाजा इंदिरा जी की शहादत देकर उठाया था। पता नहीं हमारे यह तथाकथित बुध्दिजीवी अब क्या चाहते हैं? शायद हमारे बंधुआ बुर्जुआवादी बुध्दिजीवियों ने इतिहास और दुनिया से सबक लेना सीखा नहीं है या जान-बूझ कर सीखना नहीं चाहते हैं। हमारे बगल में पाकिस्तान है, जहां पिछले साठ सालों से फौज अपने ही लोगों के खिलाफ इस्तेमाल की जाती रही है। नतीजा सामने है। आज पाकिस्तान जबर्दस्त टूट के मुहाने पर बैठा है।
यह इत्तेफाक है या चिदम्बरम का मीडिया मैनेजमेन्ट, पता नहीं! पीसीपीए नेता छत्रधर महतो की रिहाई की मांग करते हुए आदिवासियों ने राजधानी एक्सप्रेस रोक ली। सारे समाचार चैनल शोर मचाने लगे कि नक्सलवादियों ने राजधानी एक्सप्रेस अगुवा कर ली। लेकिन पूरे दिन भर किसी भी हमारे पत्रकार साथी ने यह खुलासा नहीं किया कि ट्रेन रोकने वाले उस पीसीपीए के समर्थक थे, जो कांग्रेस की बगलबच्चा तृणमूल कांग्रेस का सहयोगी संगठन है और छत्रधर महतो भी नक्सलवादी नहीं बल्कि तृणमूल नेता हैं। बहुत बाद में धीरे से यह सूचना दी गई कि ट्रेन रोकने वाले आदिवासी थे जो तीर कमान लिए हुए थे और लूट के नाम पर उन्होंने या तो कम्बल लूटे या खाने के पैकेट। इससे पहले भी हमारे मीडिया के साथी अपनी सोच का नमूना दे चुके हैं जब 6 दिसम्बर 1992 को अयोधया में बाबरी मस्जिद गिराने वाले गुण्डों को 'कारसेवक' कहकर महिमामंडित किया गया था।
सवाल उठाया गया है कि छत्तीसगढ़, आंध्र, उड़ीसा जैसे राज्यों के कुछ जिलों में नागरिक प्रशासन की बात तो दूर रही, सरकारी सेवा का कोई शिक्षक, डॉक्टर, कंपाउंडर, नर्स इंजीनियर और पटवारी तक नहीं घुस पा रहे हैं, ऐसी स्थिति में इन क्षेत्रों में आर्थिक विकास न होने का रोना रोना अपने आप को धोखा देना है। ऐसे तर्क देने वाले बुध्दिजीवियों से बहुत विनम्रता से एक सवाल किया जा सकता है कि ठीक है जहां नक्सलवादी हैं वहां यह सरकारी अमला नहीं जा पा रहा लेकिन जहां नक्सलवादी नहीं हैं वहां यह सरकारी तंत्र नजर क्यों नहीं आता? देश भर के प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों की क्या हालत है, पटवारी और इंजीनियर का मतलब देहात में क्या होता है? दिल्ली में मिनरल वाटर और कोला पीने वाले बुध्दिजीवी नहीं समझ सकते हैं।
आरोप लगाए जा रहे हैं कि नक्सलवादी, ठेकेदारों और इंजीनियरों से लेवी वसूलते हैं और मारने की धमकी देते हैं। लेकिन अभी तक यह बताने वाला कोई भद्र पुरूष नहीं मिला जो बताए कि एस मंजुनाथ और सत्येन्द्र दुबे को मारने वाले भी क्या नक्सलवादी थे? हमारे संपादक महोदय जब राज्य सभा सदस्य बन जाएंगे और उनकी सांसद निधि का पैसा जब विकास कार्य में लगेगा तब शायद उनका कोई चहेता ठेकेदार हुआ तो उन्हें बताएगा कि काम शुरू होने से पहले ही चालीस प्रतिशत की रकम तो इंजीनियर साहब की भेंट चढ़ जाती है।
अगर निष्पक्ष जांच करवाई जाए कि जिन पुलों और स्कूलों को उड़ाने का आरोप नक्सलियों के सिर पर है, उनमें से कितने ऐसे थे जो दो या चार माह पुराने ही थे। नतीजा सामने आ जाएगा कि अधिकांशत: नए बने हुए थे और उनके बिलों का भी भुगतान ठेकेदारों को हो चुका था। खगड़िया में सामूहिक नरसंहार हुआ। तुरन्त आरोप लगाया गया कि नक्सलियों ने किया। लेकिन मालूम पड़ा कि यह काम तो जातीय गिरोहों का था।
बात विकास की की जा रही है लेकिन यह विकास किसका हो रहा है? किसानों को उनकी जमीनों से बेदखल किया जा रहा है, आदिवासियों से जंगल छीने जा रहे हैं और उन जमीनों पर बड़े बड़े पूंजीपतियों के संयंत्र लग रहे हैं। तमाशा यह है कि जिस किसान की जमीन छीनकर छह और आठ लेन का हाईवे बनाया जा रहा है उस हाईवे पर वह किसान अपनी बैलगाड़ी या साइकिल लेकर नहीं चल सकता और अगर उस सड़क पर वह चलना चाहेगा तो उसे टोल टैक्स देना होगा चूंकि उसके चलने के लिए पैरेलल सड़क समाप्त की जा चुकी है। उत्तर प्रदेश में जेपी समूह ताज एक्सप्रेस वे बना रहा है। जिन किसानों की जमीनें छीनी गई हैं वह प्रतिवाद करते हैं तो किसानों पर गुण्डा एक्ट लगा दिया जाता है। लेकिन हमारे तथाकथित बड़े संपादकों की नजर में यह विकास है। यह विकास का ही रूप है कि झारखण्ड में जिन आदिवासियों को खदेड़कर सरकार पूंजीपतियों से एमओयू साइन करती है उनका थोड़े से दिन का मुख्यमंत्री कई हजार करोड़ रूपये की खदानें विदेशों में खरीद लेता है। लेकिन हमारे वरिष्ठ पत्रकार सैन्य कार्रवाई की आवश्यकता नक्सलियों के खिलाफ महसूस करते है?
फ्रांसिस इंदवार नाम का एक पुलिस इंस्पैक्टर बेरहमी के साथ मारा गया। इस तरह के कामों की कड़ी भर्त्सना होनी चाहिए और हुई भी। लेकिन जो हमारे बुध्दिजीवी इंदवार की हत्या पर क्रोधित हो रहे हैं और इसके लिए नक्सलियों पर सैन्य हमले की वकालत कर रहे हैं, वह यह बताना भूल जाते हैं कि इंदवार को पिछले छह माह से तनख्वाह नहीं मिली थी और उसकी तनख्वाह रोकने वाले नक्सली नहीं थे बल्कि देश के गृह मंत्री पी चिदंबरम के कारकुन ही थे। शायद मालूम हो कि झारखण्ड में पिछले लगभग नौ माह से राष्ट्रपति शासन है और सारा प्रशासन गृह मंत्री के ही अधीन है।
गृह मंत्री ने एक जोरदार तर्क दिया और उसकी हिमायत बड़े संपादकों ने की। कहा गया कि अगर नक्सली व्यवस्था बदलना चाहते हैं तो चुनाव लड़कर क्यों नहीं आते? तर्क है तो जानदार लेकिन है बेहद बेहूदा। पहली बात तो चुनाव, व्यवस्था नहीं सरकारें बदलने का माधयम है। चिदंबरम साहब स्वयं गवाह हैं कि इस देश में चार प्रतिशत मत पाकर सरकारें बन जाया करती हैं। क्या यह सरकारें जनभावनाओं की सही प्रतिनिधि होती हैं।
एक तरफ कहा जा रहा है कि कुछ हजार नक्सली हैं। दूसरी तरफ कहा जा रहा है कि सारे जंगलों पर एक साथ हमला करो। अगर नक्सली कुछ हजार ही हैं तो सारे जंगलों पर एक साथ हमला करने की क्या जरूरत है? अगर ऐसा हमला हुआ तो सबसे ज्यादा जानें किसकी जाएंगी? निरीह आदिवासियों की ही? तमाशा यह है कि लोंगोवाल से बात की जा सकती है, लालडेंगा से बात की जा सकती है, परेश बरूआ से बात की जा सकती है, एनएससीएन से बात की जा सकती है, संघ- विहिप और हुर्रियत कांफ्रेंस से भी बात की जा सकती है लेकिन नक्सलियों से बात नहीं की जानी चाहिए उनके खिलाफ तो सिर्फ और सिर्फ सैन्य कार्रवाई ही एकमात्र विकल्प है। और यह सैन्य कार्रवाई इसलिए भी जरूरी हो जाती है क्योंकि खनन कंपनियों का लॉ अफसर रहा एक व्यक्ति अब इस देश का गृह मंत्री है।
अमलेन्दु उपाधयाय
मानना पड़ेगा कि गृह मंत्री पी चिदंबरम का मीडिया प्रबंधन बहुत कमाल का है। कोई महीना भर भी तो नहीं हुआ होगा जब देश के चुनिन्दा संपादकों के साथ उनकी भेंटवार्ता हुई थी और नक्सलवाद को समूल नष्ट करने का इरादा गृह मंत्री ने इस भेंटवार्ता में जताया था। लेकिन इस भेंटवार्ता का अच्छा परिणाम लगभग दो हफ्ते बाद ही सामने आने लगा जब इन बड़े संपादकों में से कई चिदंबरम की नक्सलियों के खिलाफ हिंसक कार्रवाई करने के विचार के समर्थन में बहुत निर्लज्जता के साथ उतर आए और तथाकथित विकास के नाम पर निरीह आदिवासियों पर प्राणघातक हमले और देश में एक युध्द की वकालत करने लगे।
एक संपादक महोदय जो गुजरात दंगों के दौरान अपनी निष्पक्ष रिपोर्टिंग के लिए सुर्खियों में आए थे और बाद में मनमोहन सरकार के विश्वासमत के दौरान सांसदों की खरीद फरोख्त का स्टिंग ऑपरेशन का प्रसारणा अपने चैनल पर न करने के लिए सवालों के घेरे में आए थे, ने तो चाटुकारिता की सारी हदें पार करते हुए चिदंबरम की तुलना सरदार वल्लभ भाई पटेल से ही कर डाली। जबकि एक अन्य दूसरे बड़े संपादक महोदय, जिनके अखबार के लोकसभा चुनाव से ऐन पहले कई संस्करण प्रारम्भ हुए और अब बन्द होने वाले हैं तथा जो बहुत जल्दी मनमोहन सिंह- चिदंबरम के आशीर्वाद से राज्यसभा सदस्य बनने वाले हैं, ने भी बाकायदा लेख लिखकर सवाल खड़ा कर दिया कि पड़ोसी देश श्रीलंका की सरकार जब बड़ी सैनिक कार्रवाई करते हुए लिट्टे आतंकवादियों की पूरी जमीन साफ कर सकती है तो क्या भारत सरकार और सेना कुछ हजार नक्सलियों को हथियार डालने के लिए बाध्य नहीं कर सकती है?
इस प्रश्न का सम्यक उत्तर सिर्फ इतना हो सकता है कि श्रीलंका ने तो आज लिट्टे का सफाया किया है लेकिन हमारे देश ने ऐसी सैन्य कार्रवाई का खमियाजा डेढ़ दशक पहले ही राजीव गांधी की शहादत देकर और ऑपरेशन ब्लू स्टार का खमियाजा इंदिरा जी की शहादत देकर उठाया था। पता नहीं हमारे यह तथाकथित बुध्दिजीवी अब क्या चाहते हैं? शायद हमारे बंधुआ बुर्जुआवादी बुध्दिजीवियों ने इतिहास और दुनिया से सबक लेना सीखा नहीं है या जान-बूझ कर सीखना नहीं चाहते हैं। हमारे बगल में पाकिस्तान है, जहां पिछले साठ सालों से फौज अपने ही लोगों के खिलाफ इस्तेमाल की जाती रही है। नतीजा सामने है। आज पाकिस्तान जबर्दस्त टूट के मुहाने पर बैठा है।
यह इत्तेफाक है या चिदम्बरम का मीडिया मैनेजमेन्ट, पता नहीं! पीसीपीए नेता छत्रधर महतो की रिहाई की मांग करते हुए आदिवासियों ने राजधानी एक्सप्रेस रोक ली। सारे समाचार चैनल शोर मचाने लगे कि नक्सलवादियों ने राजधानी एक्सप्रेस अगुवा कर ली। लेकिन पूरे दिन भर किसी भी हमारे पत्रकार साथी ने यह खुलासा नहीं किया कि ट्रेन रोकने वाले उस पीसीपीए के समर्थक थे, जो कांग्रेस की बगलबच्चा तृणमूल कांग्रेस का सहयोगी संगठन है और छत्रधर महतो भी नक्सलवादी नहीं बल्कि तृणमूल नेता हैं। बहुत बाद में धीरे से यह सूचना दी गई कि ट्रेन रोकने वाले आदिवासी थे जो तीर कमान लिए हुए थे और लूट के नाम पर उन्होंने या तो कम्बल लूटे या खाने के पैकेट। इससे पहले भी हमारे मीडिया के साथी अपनी सोच का नमूना दे चुके हैं जब 6 दिसम्बर 1992 को अयोधया में बाबरी मस्जिद गिराने वाले गुण्डों को 'कारसेवक' कहकर महिमामंडित किया गया था।
सवाल उठाया गया है कि छत्तीसगढ़, आंध्र, उड़ीसा जैसे राज्यों के कुछ जिलों में नागरिक प्रशासन की बात तो दूर रही, सरकारी सेवा का कोई शिक्षक, डॉक्टर, कंपाउंडर, नर्स इंजीनियर और पटवारी तक नहीं घुस पा रहे हैं, ऐसी स्थिति में इन क्षेत्रों में आर्थिक विकास न होने का रोना रोना अपने आप को धोखा देना है। ऐसे तर्क देने वाले बुध्दिजीवियों से बहुत विनम्रता से एक सवाल किया जा सकता है कि ठीक है जहां नक्सलवादी हैं वहां यह सरकारी अमला नहीं जा पा रहा लेकिन जहां नक्सलवादी नहीं हैं वहां यह सरकारी तंत्र नजर क्यों नहीं आता? देश भर के प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों की क्या हालत है, पटवारी और इंजीनियर का मतलब देहात में क्या होता है? दिल्ली में मिनरल वाटर और कोला पीने वाले बुध्दिजीवी नहीं समझ सकते हैं।
आरोप लगाए जा रहे हैं कि नक्सलवादी, ठेकेदारों और इंजीनियरों से लेवी वसूलते हैं और मारने की धमकी देते हैं। लेकिन अभी तक यह बताने वाला कोई भद्र पुरूष नहीं मिला जो बताए कि एस मंजुनाथ और सत्येन्द्र दुबे को मारने वाले भी क्या नक्सलवादी थे? हमारे संपादक महोदय जब राज्य सभा सदस्य बन जाएंगे और उनकी सांसद निधि का पैसा जब विकास कार्य में लगेगा तब शायद उनका कोई चहेता ठेकेदार हुआ तो उन्हें बताएगा कि काम शुरू होने से पहले ही चालीस प्रतिशत की रकम तो इंजीनियर साहब की भेंट चढ़ जाती है।
अगर निष्पक्ष जांच करवाई जाए कि जिन पुलों और स्कूलों को उड़ाने का आरोप नक्सलियों के सिर पर है, उनमें से कितने ऐसे थे जो दो या चार माह पुराने ही थे। नतीजा सामने आ जाएगा कि अधिकांशत: नए बने हुए थे और उनके बिलों का भी भुगतान ठेकेदारों को हो चुका था। खगड़िया में सामूहिक नरसंहार हुआ। तुरन्त आरोप लगाया गया कि नक्सलियों ने किया। लेकिन मालूम पड़ा कि यह काम तो जातीय गिरोहों का था।
बात विकास की की जा रही है लेकिन यह विकास किसका हो रहा है? किसानों को उनकी जमीनों से बेदखल किया जा रहा है, आदिवासियों से जंगल छीने जा रहे हैं और उन जमीनों पर बड़े बड़े पूंजीपतियों के संयंत्र लग रहे हैं। तमाशा यह है कि जिस किसान की जमीन छीनकर छह और आठ लेन का हाईवे बनाया जा रहा है उस हाईवे पर वह किसान अपनी बैलगाड़ी या साइकिल लेकर नहीं चल सकता और अगर उस सड़क पर वह चलना चाहेगा तो उसे टोल टैक्स देना होगा चूंकि उसके चलने के लिए पैरेलल सड़क समाप्त की जा चुकी है। उत्तर प्रदेश में जेपी समूह ताज एक्सप्रेस वे बना रहा है। जिन किसानों की जमीनें छीनी गई हैं वह प्रतिवाद करते हैं तो किसानों पर गुण्डा एक्ट लगा दिया जाता है। लेकिन हमारे तथाकथित बड़े संपादकों की नजर में यह विकास है। यह विकास का ही रूप है कि झारखण्ड में जिन आदिवासियों को खदेड़कर सरकार पूंजीपतियों से एमओयू साइन करती है उनका थोड़े से दिन का मुख्यमंत्री कई हजार करोड़ रूपये की खदानें विदेशों में खरीद लेता है। लेकिन हमारे वरिष्ठ पत्रकार सैन्य कार्रवाई की आवश्यकता नक्सलियों के खिलाफ महसूस करते है?
फ्रांसिस इंदवार नाम का एक पुलिस इंस्पैक्टर बेरहमी के साथ मारा गया। इस तरह के कामों की कड़ी भर्त्सना होनी चाहिए और हुई भी। लेकिन जो हमारे बुध्दिजीवी इंदवार की हत्या पर क्रोधित हो रहे हैं और इसके लिए नक्सलियों पर सैन्य हमले की वकालत कर रहे हैं, वह यह बताना भूल जाते हैं कि इंदवार को पिछले छह माह से तनख्वाह नहीं मिली थी और उसकी तनख्वाह रोकने वाले नक्सली नहीं थे बल्कि देश के गृह मंत्री पी चिदंबरम के कारकुन ही थे। शायद मालूम हो कि झारखण्ड में पिछले लगभग नौ माह से राष्ट्रपति शासन है और सारा प्रशासन गृह मंत्री के ही अधीन है।
गृह मंत्री ने एक जोरदार तर्क दिया और उसकी हिमायत बड़े संपादकों ने की। कहा गया कि अगर नक्सली व्यवस्था बदलना चाहते हैं तो चुनाव लड़कर क्यों नहीं आते? तर्क है तो जानदार लेकिन है बेहद बेहूदा। पहली बात तो चुनाव, व्यवस्था नहीं सरकारें बदलने का माधयम है। चिदंबरम साहब स्वयं गवाह हैं कि इस देश में चार प्रतिशत मत पाकर सरकारें बन जाया करती हैं। क्या यह सरकारें जनभावनाओं की सही प्रतिनिधि होती हैं।
एक तरफ कहा जा रहा है कि कुछ हजार नक्सली हैं। दूसरी तरफ कहा जा रहा है कि सारे जंगलों पर एक साथ हमला करो। अगर नक्सली कुछ हजार ही हैं तो सारे जंगलों पर एक साथ हमला करने की क्या जरूरत है? अगर ऐसा हमला हुआ तो सबसे ज्यादा जानें किसकी जाएंगी? निरीह आदिवासियों की ही? तमाशा यह है कि लोंगोवाल से बात की जा सकती है, लालडेंगा से बात की जा सकती है, परेश बरूआ से बात की जा सकती है, एनएससीएन से बात की जा सकती है, संघ- विहिप और हुर्रियत कांफ्रेंस से भी बात की जा सकती है लेकिन नक्सलियों से बात नहीं की जानी चाहिए उनके खिलाफ तो सिर्फ और सिर्फ सैन्य कार्रवाई ही एकमात्र विकल्प है। और यह सैन्य कार्रवाई इसलिए भी जरूरी हो जाती है क्योंकि खनन कंपनियों का लॉ अफसर रहा एक व्यक्ति अब इस देश का गृह मंत्री है।
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वेबसाइट संचालक अमलेन्दु उपाध्याय 30 वर्ष से अधिक अनुभव वाले वरिष्ठ पत्रकार और जाने माने राजनैतिक विश्लेषक हैं। वह पर्यावरण, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, युवा, खेल, कानून, स्वास्थ्य, समसामयिकी, राजनीति इत्यादि पर लिखते रहे हैं।
शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2009
न्याय प्रणाली की विष्वसनीयता संकट
अमलेन्दु उपाधयाय
गाजियाबाद के पीएफ धोटाले के मुख्य अभियुक्त आशुतोष अस्थाना की मौत पर दो पंक्तियों में सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है-'अंधोरों ने हमारे अंजुमन की आबरू रख ली/ न जाने कितने चेहरे रोशनी में आ गए होते।' दीपावली वाले दिन अस्थाना की गाजियाबाद की जिला जेल में रहस्यमय मौत हो गई थी। इससे पहले भी गाजियाबाद की जिला जेल में कई अन्य हाई प्रोफाइल केस के अभियुक्तों की रहस्यमय मौतें हो चुकी हैं। लेकिन आशुतोष अस्थाना की मौत समूची न्यायिक प्रणाली की विष्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगा रही है।
आशुतोष अस्थाना पीएफ घोटाले का मुख्य अभियुक्त था और अपने इकबालिया बयान में वह छत्ताीस न्यायाधीशों के नाम उगल चुका था कि इन न्यायाधीशों के सहयोग और आदेष से उसने इस घोटाले को अंजाम दिया था। बताया तो यह भी जा रहा है कि अस्थाना अदालत में कोई और इकबालिया बयान देने जा रहा था और सीबीआई भी फाइनल चार्जषीट लगाने जा रही थी लेकिन वह समय आता उससे पहले ही अस्थाना सीने में बहुत से राज छिपाए हुए इस दुनिया से रूखसत हो गया।
समाचार पत्रों में यह खबर प्रमुखता से प्रकाशित हुई है कि अस्थाना के परिवारवालों ने कहा है कि उन्होंने पुलिस को कम से कम दो बार ये सूचना दी थी कि अस्थाना को जान का खतरा है। परिवार वालों ने इस मामले की सीबीआई जांच करवाने की मांग भी की है। हालांकि गाजियाबाद के पुलिस अधाीक्षक का बयान भी सभी समाचार पत्रों में प्रमुखता से प्रकाषित हुआ है जिसमें उन्होंने इस बात से इंकार किया है कि अस्थाना ने अपनी जान को खतरा बताया था। यहां सवाल यह है कि अगर अस्थाना ने पुलिस से सुरक्षा की गुहार नहीं भी की थी तो क्या यह पुलिस का काम नहीं था कि इतने महत्वपूर्ण हाई प्रोफाइल केस के मुख्य अभियुक्त की सुरक्षा के इंतजामात किए जाते? आईजी जेल सुलखान सिंह ने एक निजी टीवी चैनल के सामने स्वीकार भी किया है कि पहले भी कोर्ट में पेशी के दौरान अस्थाना के साथ मारपीट की गई थी।
बताया जा रहा है कि आशुतोष अस्थाना से एक दिन पहले ही सीबीआई ने कई घंटे तक पूछताछ की थी और इसके एक दिन बाद उसकी मौत होना सवाल खड़े करती है। क्या इस पूछताछ में भी कुछ रहस्य छिपा हुआ है? यह भी कहा जा रहा है कि पिछले कई रोज से सीबीआई अधिकारी जेल में उससे पूछताछ कर रहे थे और अस्थाना अदालत में अपने बयान देने वाला था जिसमें कई बड़े नाम लपेटे में आने वाले थे। इससे पहले भी अपने बयान में वह तीन न्यायाधाीषों को लपेट चुका था। बताया जाता है कि अनुच्छेद 164 के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष दिए बयान में अस्थाना ने खुलासा किया था कि उसे पुलिस से छिपने में तीन न्यायाधीशों ने मदद की थी। अस्थाना को हाईकोर्ट के तीन न्यायधीशों ने भरोसा दिया था कि जांच पूरी होने के बाद वे मामले को देख लेगें। तीनों न्यायधीशों का नाम घोटाले से लाभ कमाने वालों की सूची में भी बताया जाता है।
यह केस कितना गम्भीर था इसी बात से समझा जा सकता है कि जाँच करने में सीबीआई के भी पसीने छूट गए। समझा जा सकता है कि जाँच टीम भी किस मानसिक दबाव से गुजर रही होगी कि उसे सर्वोच्च न्यायालयसे अपील करनी पड़ी कि घोटाले से संबंधित मामले की जांच दिल्ली में कराई जाए ताकि जांच एजेंसी को अपने मुख्यालय से जांच कराना सुविधाजनक हो। इतना ही नहीं उत्तार प्रदेष सरकार भी इस केस की सीबीआई जांच कराने से कन्नी काटती रही लेकिन जब गाजियाबाद बार एसोसिएशन के पूर्व अधयक्ष नाहर सिंह यादव ने मोर्चा खोला और अधिवक्ता एकजुट हुए तब सीबीआई जाँच बैठाई गई। स्वयं सर्वोच्च न्यायालयकी तीन बेंच में यह मुकदमा स्थानान्तरित हुआ और सुनवाई करने वाले विद्वान न्यायाधीशों पर पक्षपात करने के आरोप भी लगे।
अस्थाना का फ्रॉड का केस भी बहुत नाटकीय अंदाज में खुला। यह आम चर्चा है कि अस्थाना का गाजियाबाद की जिला कोर्ट में इतना रुतबा था कि सीजेएम और एडीजे स्तर के अधिाकारी भी उससे अनुमति लेकर उसके कमरे में दाखिल होते थे। और तुतीय व चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी तो उसके कमरे में जूते बाहर उतारकर दाखिल होते थे। गाजियाबाद में किस जिला न्यायाधीश की नियुक्ति हो रही है यह अस्थाना को पहले से मालूम रहता था। जाहिर है एक क्लर्क का यह रूतबा बिना ऊपर के आशीर्वाद के नहीं बना होगा। उसका यह घोटाला पकड़ा भी नहीं जाता अगर वह एक ईमानदार महिला न्यायाधीश से न उलझा होता। चर्चा है कि अस्थाना सीबीआई की स्पेशल न्यायाधीश रमा जैन, जो उस समय नजारत की इंचार्ज भी थी से एक फर्जी बिल पास कराने पहुँचा। बतातें हैं कि रमा जैन ने वह बिल पास करने से मना कर दिया। इस पर अस्थाना ने उन्हें घुड़़की दी कि यह बिल तो पास होंगे ही लेकिन इंचार्ज बदल जाएगा और अगले दिन ही रमा जैन से वह चार्ज छिन गया। इस पर महिला न्यायाधीश ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से शिकायत की कि गाजियाबाद की अदालतों में कुछ ऐसा है जो गलत है। इस पर जैन को जाँच का जिम्मा मिला और उन्होंने आते ही एकाउन्ट्स और नजारत को सील किया फिर जब जाँच की तो अस्थाना का फर्जीवाड़ा सामने आया। तब रमा जैन ने स्वयं गाजियाबाद के थाना कविनगर में एफआईआर दर्ज कराई। यह वही रमा जैन हैं, जिन्होंने निठारी केस में पंधोर और कोली को फाँसी की सजा सुनाई थी।
अपनी गर्दन फँसती देखकर अस्थाना ने अदालत में सेक्शन 164 के तहत इकबालिया बयान दर्ज कराकर पोल खोल दी कि यह फर्जीवाड़ा तो वह न्यायाधीशों के सहयोग से कर रहा था और यह राशि भी न्यायाधीशों के ऊपर ही खर्च होती थी। उसने बाकायदा कई बिल भी उपलब्ध कराए जो उसके बयान की पुश्टि करते हैं।
भले ही आशुतोष अस्थाना की मौत स्वाभाविक रूप से हुई हो लेकिन अगर निश्पक्ष जांच न हुई, ऐसी जाँच जिसमें कोई न्यायिक अधिाकारी षामिल न हो, बल्कि कई संवैधनिक संस्थाओं के लोग शामिल हों, तो लोग भरोसा नहीं करेंगे। केस की गम्भीरता को देखकर लगता है कि अस्थाना की मौत एक रहस्य ही बनी रहेगी। इसीलिए पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी मौत का कारण अभी तक सामने नहीं आया है। जिस केस में 36 बड़े न्यायाधीश फँस रहे हों, जिनमें से एक सर्वोच्च न्यायालयऔर ग्यारह हाई कोर्ट के न्यायाधीश हों, उस केस के मुख्य अभियुक्त की मौत से रहस्य से पर्दा इतनी आसानी से उठ भी कैसे सकता है? उप्र सरकार अस्थाना की मौत की जाँच की घोषणा कर चुकी है। लेकिन जाँच कौन करेगा? वही पुलिस, जिसके कप्तान साहब अस्थाना के इकबालिया बयान पर सर्वोच्च न्यायालयके मुख्य न्यायाधीश से न्यायाधीशों से पूछताछ करने की अनुमति मांग रहे थे!
यह अभी भी रहस्य बना हुआ है कि अस्थाना की मौत कैसे हुई। बताया जाता है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी कुछ कह पाने की स्थिति में नहीं है। जैसा कि संदेह व्यक्त किया जा रहा है कि उसकी मौत जहर खाने से हुई तो सवाल ये है कि तो उसे जेल में जहर कहां से मिला। दूसरा बड़ा सवाल ये कि उसने ये जहर खुद खाया या फिर किसी ने उसे जबरन जहर खिलाया। अगर उसने खुद जहर खाया तो खुदकुशी की वजह क्या थी और उसने जहर खाने के बाद किसी से इसका जिक्र क्यों नहीं किया। इसलिए अगर यह संदेह सही है कि मौत जहर खाने से ही हुई तो निश्चित रूप से यह हत्या का मामला ही नजर आता है।
इस बीच सर्वोच्च न्यायालयने न्यायिक जाँच के आदेश दिए हैं। लेकिन संभवत: यह पहला अवसर है कि न्यायिक जाँच के निष्पक्ष होने पर ही संदेह व्यक्त किया जा रहा है। सवाल सिर्फ अस्थाना की मौत की निश्पक्ष जांच का नहीं है बल्कि पूरी की पूरी न्याय प्रणाली की विष्वसनीयता संकट में है। इसलिए जांच किसी स्वतंत्र जांच एजेंसी से ही होनी चाहिए। यह इसलिए भी जरूरी हो जाता है क्योंकि जब पुलिस ने आरोपित न्यायाधीशों से पूछताछ करने की अनुमति मांगी तब मुख्य न्यायाधीश ने पुलिस से संभावित सवालों की सूची माँगी। इससे जनमानस में यह संदेष गया कि क्या मुल्क में दो कानून हैं? न्यायाधीशों के लिए एक और आम आदमी के लिए अलग?
अक्सर न्यायपालिका पर उंगलिया उठती रही हैं। मसलन सूचना के अधिकार की परिधि में न्यायाधीश साहब क्यों नहीं आते हैं? सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति की क्या प्रक्रिया है? न्यायाधीश साहब की जवाबदेही किसके प्रति है इस देष के संविधान के प्रति, सरकार के प्रति या जनता के प्रति या किसी के प्रति नहीं?
एक टीवी चैनल के स्टिंग ऑप्रेशन में कुछ सांसद रंगे हाथ रिश्वत लेते हुए पकड़े गए थे। लेकिन संसद ने एक स्वर से उन दागी सांसदों की सदस्यता रद्द करके बाहर का रास्ता दिखाया और अपनी विश्वसनीयता बचाकर एक नजीर पेश की। लेकिन आश्चर्य इस बात का है कि अस्थाना ने जिन न्यायाधीशों के नाम अपने इकबालिया बयान में लिए वह अभी तक बदस्तूर न्यायिक काम निपटा रहे हैं और जो काम नहीं भी कर रहे हैं वह महज इसलिए क्योंकि वे सेवानिवृत्त हो चुके हैं। इतना ही नहीं जिन तीन न्यायाधीशों के नाम अस्थाना ने अपने इकबालिया बयान में लिए थे कि किस तरह इन न्यायाधीशों ने उसे गिरफ्तारी से बचने में मदद की और छिपाया उन न्यायाधीशों के खिलाफ भी अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है।
भले ही कानून मंत्री वीरप्पा मोइली कह रहे हों कि अस्थाना की मौत से इस केस की जांच पर कोई असर नहीं पड़ेगा लेकिन इतिहास बताता है कि अंजाम क्या होगा?
जिस तरह से न्यायाधीशों की संपत्तिा के मामले पर सर्वोच्च न्यायालयके मुख्य न्यायाधाीष की पहल पर न्यायाधीशों ने स्वयं अपनी संपत्तिा सार्वजनिक करने का साहसिक निर्णय लिया था उसी तरह की नजीर पीएफ घोटाले में भी पेष की जानी चाहिए और उन न्यायाधीशों से सारा न्यायिक काम छीन लिया जाना चाहिए जिनके नाम अस्थाना ने अपने इकबालिया बयान में लिए थे। अस्थाना की मौत के बाद ऐसी निश्पक्षता का प्रदर्षन और जरूरी हो जाता है ताकि न्याय केवल हो ही नहीं बल्कि होता हुआ दिखाई भी दे। क्या ऐसा साहस दिखा पाएंगे मी लॉर्ड!!!!!!!!!!!
गाजियाबाद के पीएफ धोटाले के मुख्य अभियुक्त आशुतोष अस्थाना की मौत पर दो पंक्तियों में सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है-'अंधोरों ने हमारे अंजुमन की आबरू रख ली/ न जाने कितने चेहरे रोशनी में आ गए होते।' दीपावली वाले दिन अस्थाना की गाजियाबाद की जिला जेल में रहस्यमय मौत हो गई थी। इससे पहले भी गाजियाबाद की जिला जेल में कई अन्य हाई प्रोफाइल केस के अभियुक्तों की रहस्यमय मौतें हो चुकी हैं। लेकिन आशुतोष अस्थाना की मौत समूची न्यायिक प्रणाली की विष्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगा रही है।
आशुतोष अस्थाना पीएफ घोटाले का मुख्य अभियुक्त था और अपने इकबालिया बयान में वह छत्ताीस न्यायाधीशों के नाम उगल चुका था कि इन न्यायाधीशों के सहयोग और आदेष से उसने इस घोटाले को अंजाम दिया था। बताया तो यह भी जा रहा है कि अस्थाना अदालत में कोई और इकबालिया बयान देने जा रहा था और सीबीआई भी फाइनल चार्जषीट लगाने जा रही थी लेकिन वह समय आता उससे पहले ही अस्थाना सीने में बहुत से राज छिपाए हुए इस दुनिया से रूखसत हो गया।
समाचार पत्रों में यह खबर प्रमुखता से प्रकाशित हुई है कि अस्थाना के परिवारवालों ने कहा है कि उन्होंने पुलिस को कम से कम दो बार ये सूचना दी थी कि अस्थाना को जान का खतरा है। परिवार वालों ने इस मामले की सीबीआई जांच करवाने की मांग भी की है। हालांकि गाजियाबाद के पुलिस अधाीक्षक का बयान भी सभी समाचार पत्रों में प्रमुखता से प्रकाषित हुआ है जिसमें उन्होंने इस बात से इंकार किया है कि अस्थाना ने अपनी जान को खतरा बताया था। यहां सवाल यह है कि अगर अस्थाना ने पुलिस से सुरक्षा की गुहार नहीं भी की थी तो क्या यह पुलिस का काम नहीं था कि इतने महत्वपूर्ण हाई प्रोफाइल केस के मुख्य अभियुक्त की सुरक्षा के इंतजामात किए जाते? आईजी जेल सुलखान सिंह ने एक निजी टीवी चैनल के सामने स्वीकार भी किया है कि पहले भी कोर्ट में पेशी के दौरान अस्थाना के साथ मारपीट की गई थी।
बताया जा रहा है कि आशुतोष अस्थाना से एक दिन पहले ही सीबीआई ने कई घंटे तक पूछताछ की थी और इसके एक दिन बाद उसकी मौत होना सवाल खड़े करती है। क्या इस पूछताछ में भी कुछ रहस्य छिपा हुआ है? यह भी कहा जा रहा है कि पिछले कई रोज से सीबीआई अधिकारी जेल में उससे पूछताछ कर रहे थे और अस्थाना अदालत में अपने बयान देने वाला था जिसमें कई बड़े नाम लपेटे में आने वाले थे। इससे पहले भी अपने बयान में वह तीन न्यायाधाीषों को लपेट चुका था। बताया जाता है कि अनुच्छेद 164 के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष दिए बयान में अस्थाना ने खुलासा किया था कि उसे पुलिस से छिपने में तीन न्यायाधीशों ने मदद की थी। अस्थाना को हाईकोर्ट के तीन न्यायधीशों ने भरोसा दिया था कि जांच पूरी होने के बाद वे मामले को देख लेगें। तीनों न्यायधीशों का नाम घोटाले से लाभ कमाने वालों की सूची में भी बताया जाता है।
यह केस कितना गम्भीर था इसी बात से समझा जा सकता है कि जाँच करने में सीबीआई के भी पसीने छूट गए। समझा जा सकता है कि जाँच टीम भी किस मानसिक दबाव से गुजर रही होगी कि उसे सर्वोच्च न्यायालयसे अपील करनी पड़ी कि घोटाले से संबंधित मामले की जांच दिल्ली में कराई जाए ताकि जांच एजेंसी को अपने मुख्यालय से जांच कराना सुविधाजनक हो। इतना ही नहीं उत्तार प्रदेष सरकार भी इस केस की सीबीआई जांच कराने से कन्नी काटती रही लेकिन जब गाजियाबाद बार एसोसिएशन के पूर्व अधयक्ष नाहर सिंह यादव ने मोर्चा खोला और अधिवक्ता एकजुट हुए तब सीबीआई जाँच बैठाई गई। स्वयं सर्वोच्च न्यायालयकी तीन बेंच में यह मुकदमा स्थानान्तरित हुआ और सुनवाई करने वाले विद्वान न्यायाधीशों पर पक्षपात करने के आरोप भी लगे।
अस्थाना का फ्रॉड का केस भी बहुत नाटकीय अंदाज में खुला। यह आम चर्चा है कि अस्थाना का गाजियाबाद की जिला कोर्ट में इतना रुतबा था कि सीजेएम और एडीजे स्तर के अधिाकारी भी उससे अनुमति लेकर उसके कमरे में दाखिल होते थे। और तुतीय व चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी तो उसके कमरे में जूते बाहर उतारकर दाखिल होते थे। गाजियाबाद में किस जिला न्यायाधीश की नियुक्ति हो रही है यह अस्थाना को पहले से मालूम रहता था। जाहिर है एक क्लर्क का यह रूतबा बिना ऊपर के आशीर्वाद के नहीं बना होगा। उसका यह घोटाला पकड़ा भी नहीं जाता अगर वह एक ईमानदार महिला न्यायाधीश से न उलझा होता। चर्चा है कि अस्थाना सीबीआई की स्पेशल न्यायाधीश रमा जैन, जो उस समय नजारत की इंचार्ज भी थी से एक फर्जी बिल पास कराने पहुँचा। बतातें हैं कि रमा जैन ने वह बिल पास करने से मना कर दिया। इस पर अस्थाना ने उन्हें घुड़़की दी कि यह बिल तो पास होंगे ही लेकिन इंचार्ज बदल जाएगा और अगले दिन ही रमा जैन से वह चार्ज छिन गया। इस पर महिला न्यायाधीश ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से शिकायत की कि गाजियाबाद की अदालतों में कुछ ऐसा है जो गलत है। इस पर जैन को जाँच का जिम्मा मिला और उन्होंने आते ही एकाउन्ट्स और नजारत को सील किया फिर जब जाँच की तो अस्थाना का फर्जीवाड़ा सामने आया। तब रमा जैन ने स्वयं गाजियाबाद के थाना कविनगर में एफआईआर दर्ज कराई। यह वही रमा जैन हैं, जिन्होंने निठारी केस में पंधोर और कोली को फाँसी की सजा सुनाई थी।
अपनी गर्दन फँसती देखकर अस्थाना ने अदालत में सेक्शन 164 के तहत इकबालिया बयान दर्ज कराकर पोल खोल दी कि यह फर्जीवाड़ा तो वह न्यायाधीशों के सहयोग से कर रहा था और यह राशि भी न्यायाधीशों के ऊपर ही खर्च होती थी। उसने बाकायदा कई बिल भी उपलब्ध कराए जो उसके बयान की पुश्टि करते हैं।
भले ही आशुतोष अस्थाना की मौत स्वाभाविक रूप से हुई हो लेकिन अगर निश्पक्ष जांच न हुई, ऐसी जाँच जिसमें कोई न्यायिक अधिाकारी षामिल न हो, बल्कि कई संवैधनिक संस्थाओं के लोग शामिल हों, तो लोग भरोसा नहीं करेंगे। केस की गम्भीरता को देखकर लगता है कि अस्थाना की मौत एक रहस्य ही बनी रहेगी। इसीलिए पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी मौत का कारण अभी तक सामने नहीं आया है। जिस केस में 36 बड़े न्यायाधीश फँस रहे हों, जिनमें से एक सर्वोच्च न्यायालयऔर ग्यारह हाई कोर्ट के न्यायाधीश हों, उस केस के मुख्य अभियुक्त की मौत से रहस्य से पर्दा इतनी आसानी से उठ भी कैसे सकता है? उप्र सरकार अस्थाना की मौत की जाँच की घोषणा कर चुकी है। लेकिन जाँच कौन करेगा? वही पुलिस, जिसके कप्तान साहब अस्थाना के इकबालिया बयान पर सर्वोच्च न्यायालयके मुख्य न्यायाधीश से न्यायाधीशों से पूछताछ करने की अनुमति मांग रहे थे!
यह अभी भी रहस्य बना हुआ है कि अस्थाना की मौत कैसे हुई। बताया जाता है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी कुछ कह पाने की स्थिति में नहीं है। जैसा कि संदेह व्यक्त किया जा रहा है कि उसकी मौत जहर खाने से हुई तो सवाल ये है कि तो उसे जेल में जहर कहां से मिला। दूसरा बड़ा सवाल ये कि उसने ये जहर खुद खाया या फिर किसी ने उसे जबरन जहर खिलाया। अगर उसने खुद जहर खाया तो खुदकुशी की वजह क्या थी और उसने जहर खाने के बाद किसी से इसका जिक्र क्यों नहीं किया। इसलिए अगर यह संदेह सही है कि मौत जहर खाने से ही हुई तो निश्चित रूप से यह हत्या का मामला ही नजर आता है।
इस बीच सर्वोच्च न्यायालयने न्यायिक जाँच के आदेश दिए हैं। लेकिन संभवत: यह पहला अवसर है कि न्यायिक जाँच के निष्पक्ष होने पर ही संदेह व्यक्त किया जा रहा है। सवाल सिर्फ अस्थाना की मौत की निश्पक्ष जांच का नहीं है बल्कि पूरी की पूरी न्याय प्रणाली की विष्वसनीयता संकट में है। इसलिए जांच किसी स्वतंत्र जांच एजेंसी से ही होनी चाहिए। यह इसलिए भी जरूरी हो जाता है क्योंकि जब पुलिस ने आरोपित न्यायाधीशों से पूछताछ करने की अनुमति मांगी तब मुख्य न्यायाधीश ने पुलिस से संभावित सवालों की सूची माँगी। इससे जनमानस में यह संदेष गया कि क्या मुल्क में दो कानून हैं? न्यायाधीशों के लिए एक और आम आदमी के लिए अलग?
अक्सर न्यायपालिका पर उंगलिया उठती रही हैं। मसलन सूचना के अधिकार की परिधि में न्यायाधीश साहब क्यों नहीं आते हैं? सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति की क्या प्रक्रिया है? न्यायाधीश साहब की जवाबदेही किसके प्रति है इस देष के संविधान के प्रति, सरकार के प्रति या जनता के प्रति या किसी के प्रति नहीं?
एक टीवी चैनल के स्टिंग ऑप्रेशन में कुछ सांसद रंगे हाथ रिश्वत लेते हुए पकड़े गए थे। लेकिन संसद ने एक स्वर से उन दागी सांसदों की सदस्यता रद्द करके बाहर का रास्ता दिखाया और अपनी विश्वसनीयता बचाकर एक नजीर पेश की। लेकिन आश्चर्य इस बात का है कि अस्थाना ने जिन न्यायाधीशों के नाम अपने इकबालिया बयान में लिए वह अभी तक बदस्तूर न्यायिक काम निपटा रहे हैं और जो काम नहीं भी कर रहे हैं वह महज इसलिए क्योंकि वे सेवानिवृत्त हो चुके हैं। इतना ही नहीं जिन तीन न्यायाधीशों के नाम अस्थाना ने अपने इकबालिया बयान में लिए थे कि किस तरह इन न्यायाधीशों ने उसे गिरफ्तारी से बचने में मदद की और छिपाया उन न्यायाधीशों के खिलाफ भी अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है।
भले ही कानून मंत्री वीरप्पा मोइली कह रहे हों कि अस्थाना की मौत से इस केस की जांच पर कोई असर नहीं पड़ेगा लेकिन इतिहास बताता है कि अंजाम क्या होगा?
जिस तरह से न्यायाधीशों की संपत्तिा के मामले पर सर्वोच्च न्यायालयके मुख्य न्यायाधाीष की पहल पर न्यायाधीशों ने स्वयं अपनी संपत्तिा सार्वजनिक करने का साहसिक निर्णय लिया था उसी तरह की नजीर पीएफ घोटाले में भी पेष की जानी चाहिए और उन न्यायाधीशों से सारा न्यायिक काम छीन लिया जाना चाहिए जिनके नाम अस्थाना ने अपने इकबालिया बयान में लिए थे। अस्थाना की मौत के बाद ऐसी निश्पक्षता का प्रदर्षन और जरूरी हो जाता है ताकि न्याय केवल हो ही नहीं बल्कि होता हुआ दिखाई भी दे। क्या ऐसा साहस दिखा पाएंगे मी लॉर्ड!!!!!!!!!!!
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वेबसाइट संचालक अमलेन्दु उपाध्याय 30 वर्ष से अधिक अनुभव वाले वरिष्ठ पत्रकार और जाने माने राजनैतिक विश्लेषक हैं। वह पर्यावरण, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, युवा, खेल, कानून, स्वास्थ्य, समसामयिकी, राजनीति इत्यादि पर लिखते रहे हैं।
बुधवार, 7 अक्टूबर 2009
कोबाड़ का रास्ता!
कोबाड़ का रास्ता!
अमलेन्दु उपाध्याय
पिछले महीने गिरफ्तार किए गए नकसली नेता कोबाड़ गांधी की दिल्ली में गिरफ्तारी से देष में एक बहस छिड़ गई है। पहले जब नक्सल समस्या पर बहस होती थी तब इसे कुंठित युवाओं की सत्ता लालसा या भटके हुए वामपंथी अतिवादी बताकर इसे कानून व्यवस्था का प्रष्न बता दिया जाता था और राजकाज चलता रहता था। लेकिन इस बार बहस कुछ नए किस्म की है।
कोबाड़ गांधी इसके लिए बधाई के पात्र हैं कि उनके बहाने ही सही नक्सलवाद एक बार फिर चर्चा में है और उनकी गिरफ्तारी के बहाने ही सही, माओवादी आन्दोलन को फिर से समझने की जरूरत महसूस की जाने लगी है। भले ही गृह मंत्री पी. चिदंबरम नक्सलवाद को सबसे बड़ा खतरा बता रहे हों लेकिन उनकी सरकार में ही लोग उनके इस विचार से पूर्णतया सहमत नहीं दिखते हैं। स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह यह कहने को मजबूर हो गए हैं कि नक्सलवाद सिर्फ कानून व्यवस्था का मामला नहीं है। और यह बात सही भी है। कानून व्यवस्था के मसले दषकों तक नहीं चला करते हैं। नक्सलवाद इस देष में लगभग तीन दषक से भी ज्यादा समय से पनप रहा है और इसका प्रभाव कम होने के बजाए लगातार बढ़ता ही गया है। किसी भी आतंकवादी आन्दोलन के पूरे दौर में जितने आतंकवादी मारे जाते होंगे उससे कहीं ज्यादा नक्सली हर साल पुलिस के हाथों मारे जाते हैं। अकेले छत्तीसगढ़ में एक वर्श में चार सौ के आसपास कथित नक्सली मारे गए हैं। लेकिन कोई तो बात है जो नक्सलवाद का जुनून बढ़ता ही जाता है।
दिल्ली की गद्दी पर बैठे हुक्मरानों और पूॅंजीवादी रुझान के बुद्धिजीवियों के माथे पर इस प्रष्न को लेकर चिंता की लकीरें गहरी हो गई हैं कि आखिर क्या बात है कि कोबाड़ गांधी जैसे लोग अपने कैरियर, घरबार और व्यापार को छोड़कर इस तरह के आन्दोलन से न केवल जुड़ जाते हैं बल्कि अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देते हैं। ताज्जुब इसलिए भी होता है कि अतिवामपंथी आंदोलन से जुड़ने वाले लोग न तो धर्म के पहरूए हैं, न जेहादी हैं, न जातिवादी आन्दोलन से निकलकर आए हैं। फिर उन्हें यह जुनून कहाॅं से मिलता है?
यहाॅं यह याद रखना चाहिए कि कोबाड़ गांधी इस तरह का पहला उदाहरण नहीं हैं, जिन्होंने माक्र्सवाद के सिद्धान्तों के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया हो। इससे पहले भी ईएमएस नंबूदरीपाद जैसे लोग भी हुए हैं जिनका राजघराने से ताल्लुक रहा और उनकी जमींदारी देष में सर्वाधिक मालगुजारी वसूलने वाली रियासत समझी जाती थी। लेकिन नम्बूदरीपाद अपनी सारी संपत्ति कम्युनिस्ट पार्टी को सौंपकर पूर्णकालिक कार्यकर्ता बन गए थे। कोबाड़ गांधी के जुनून को एक और तरीके से समझा जा सकता है। गौतम बुद्ध भी अपना सारा राजपाट छोड़कर दुख के निदान की तलाष में ही भिक्षु बन गए थे। लेकिन बुद्ध का रास्ता अध्यात्म का था, पलायन का था और कोबाड़ ने जो रास्ता चुना, वह है तो बुद्ध के समानान्तर ही लेकिन वह विचार का रास्ता है, संघर्श का रास्ता है, पलायन का नहीं।
यह भी बात गौेर करने लायक है कि नक्सलवाद से प्रभावित क्षेत्र वही ज्यादा हैं जहाॅं जंगल और आदिवासी ज्यादा हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि जंगल नक्सलवादियों की मदद करते हैं। बल्कि समस्या की तह तक जाना होगा। नब्बे के दषक में जब इस मुल्क में नरसिंहाराव और मनमोहन सिंह मार्का उदारीकरण आया जिसे चिदंबरम जैसे हार्वर्ड उत्पादित अर्थषास्त्रियों ने और धार दी तो देष में नए किस्म का पूॅंजीवाद आया और सरकारों की भूमिका भी बदलने लगी। नब्बे के दषक से पहले सरकार की भूमिका कल्याणकारी राज्य की मानी जाती थी। दिखावे के लिए ही सही ‘गरीबी हटाओ’ के नारे लगते थे। लेकिन नरसिंहाराव-वाजपेयी-मनमोहन की तिकड़ी ने सरकारों की भूमिका एक एनजीआंे की बना दी और सरकारें बड़े पूॅंजीपतियों और घोटालेबाजों की जेब की गुलाम बनकर रह गईं और अब तो प्रधानमंत्री जनता को नसीहत भी देने लगे हैं कि वह और महॅंगाई के लिए तैयार रहे।
उदारीकरण की आंधी में औद्योगिकीकरण और तथाकथित विकास के नाम पर किसानों की जमीनें हथियाए जाने लगीं और जंगल से आदिवासियों को बेदखल करके कारखाने लगने लगे। क्या संयोग है कि सारी बड़ी कंपनियों के काॅरपोरेट दफ्तर तो मुंबई और कोलकाता में हैं लेकिन कई कई हजार एकड़ में लगने वाले उनके प्लांट छत्तीसगढ़ और झारखण्ड के जंगलों में लग रहे हैं। बाॅंध बन तो रहे हैं विकास के नाम पर लेकिन यह बाॅंध बलि ले रहे हैं हजारों गांवों के लोगों की। इस विकास और औद्योगिकीकरण से एक आम आदमी को लाभ होने के बजाए नुकसान ही हुआ है।
काफी पहले दो छोटी सी खबरें अलग अलग अखबारों में पढ़ी थीं। एक हाल ही की घटना राजस्थान की थी। उस खबर के मुताबिक कुछ आदिवासियों को पुलिस ने पकड़ा था जिन से लगभग बारह हजार रूपए मूल्य का आंवला पकड़ा गया था। सरकार का तर्क था कि इस आंवले पर अधिकार उस ठेकेदार का है जिसे वन उपज का ठेका दिया गया है। दूसरी खबर के मुताबिक मुकेष अंबानी के जामनगर रिफाइनरी प्लांट में कई सैकड़ा एकड़ में बेहतरीन आम के पेड़ लगे हुए हैं और उन आमों का निर्यात विदेषों को किया जाता है।
अगर आपके पास दृश्टि है तो नक्सलवाद के बढ़ते प्रभाव को समझने और समझाने के लिए यह छोटी सी दो खबरें काफी हैं। राजस्थान की घटना बताती है कि जंगल से आदिवासियों का अधिकार खत्म कर दिया गया है। और अंबानी की खबर बताती है कि जामनगर का प्लांट हजारों लोगों को विस्थापित करके ही स्थापित हुआ होगा और किसानों को उनकी जमीन से बेदखल करके मुकेष अंबानी अब आम की खेती भी कर रहे हैं। इन्हीं विस्थापित लोगों के समर्थन से नक्सलवाद का विस्तार हो रहा है। यह कटु सत्य है और इसे चिदंबरम चाहे स्वीकार करें या न करें - इस विस्थापित आम आदमी के समर्थन से ही नक्सलवाद को षह मिल रही है। खुद सरकारी आंकडें बताते हैं कि वर्श 2006 में 1,509 नक्सली वारदातें हुई। जबकि वर्श 2007 में 1,565 वारदातें हुई। इन वारदातों में वर्श 2006 में 157 सुरक्षा बलों के जवान और 521 नागरिक मारे गए जबकि वर्श 2007 में 236 सुरक्षा बलों के जवान और 460 नागरिक मारे गए।
मीडिया में जो खबरें आ रही हैं, उनके मुताबिक नक्सलवाद प्रभावित राज्यों में पुलिस बल के आधुनिकीकरण के नाम पर कई हजार करोड़ रूपए सरकार खर्च करेगी। जाहिर है इसमें से अधिकांष रूपया अत्याधुनिक हथियारों की खरीद पर खर्च किया जाएगा और एक बड़ी रकम खुफिया नेटवर्क बनाने के नाम पर खर्च होगी, जिसका कोई हिसाब किताब पुलिस अफसरों को नहीं देना होता है। जाहिर है जब तक इस नेटवर्क के नाम पर और हथियारों की खरीद के नाम पर सरकार यह धन मुहैया कराती रहेगी तब तक नक्सलियों के नाम पर आम गरीब आदिवासी पुलिस मुठभेड़ों में मरता रहेगा और प्रतिषोध में इन गरीबों का समर्थन नक्सलियों को ही मिलता रहेगा। सवाल यह भी है कि आतंकवाद नक्सलवाद प्रभावित राज्यों में विकास के नाम पर जो धन राज्यों को दिया जाता है उस धन का क्या प्रयोग होता है? अगर यह धन विकास पर ही खर्च हो रहा है तो वह विकास कहाॅं हो रहा है? अक्सर समाचारपत्रों में रिपोटर््स प्रकाषित होती हैं कि नक्सली अपने क्षेत्रों में ठेकेदारों से लेवी वसूल करते हैं। खबरें सही होती भी हैं। लेकिन यही खबरें प्रष्न भी छोड़ती हैं कि नक्सली यह लेवी किन लोगों से वसूलते हैं? आम गरीब आदमी तो लेवी देता नहीं हैं। लेवी देता है भ्रश्ट ठेकेदार और इंजीनियर। जाहिर है कि अगर यह नक्सलियों को लेवी नहीं भी देगा तो उस पैसे को विकास में नहीं लगाएगा बल्कि अपनी जेब भरेगा।
इसलिए चिदंबरम जी को समझना होगा कि नक्सलवाद विचार है और विचार बन्दूकों से कुचले नहीं जाते। इसके लिए खुद चिदंबरम जी को इस व्यवस्था में सुधार करना होगा और खुद भी एक वैचारिक व्यक्ति बनना होगा। सरकार को एनजीओ की भूमिका छोड़ कर कल्याणकारी राज्य की भूमिका निभानी होगी और विकास का पैमाना बदलना होगा विस्थापन की बुनियाद पर विकास नहीं चलेगा। वरना आप एक कोबाड़ को पकड़ेंगे दस नए कोबाड़ पैदा हो जाएंगे। अभी तक का इतिहास तो यही बताता है कि नक्सली पैदा होता नहीं है बल्कि यह व्यवस्था( जिसके पैरोकार चिदंबरम और मनमोहन हैं) बनाती है। नक्सलियों का हिंसा का रास्ता एकदम गलत है , लेकिन उनका उद्देष्य गलत कहा जाए? कोबाड़ की गिरफ्तारी या छत्तीसगढ़ में नक्सलियों के नाम पर आदिवासियों का सामूहिक नरसंहार समस्या का हल कभी नहीं बन सकेगा।
अमलेन्दु उपाध्याय
पिछले महीने गिरफ्तार किए गए नकसली नेता कोबाड़ गांधी की दिल्ली में गिरफ्तारी से देष में एक बहस छिड़ गई है। पहले जब नक्सल समस्या पर बहस होती थी तब इसे कुंठित युवाओं की सत्ता लालसा या भटके हुए वामपंथी अतिवादी बताकर इसे कानून व्यवस्था का प्रष्न बता दिया जाता था और राजकाज चलता रहता था। लेकिन इस बार बहस कुछ नए किस्म की है।
कोबाड़ गांधी इसके लिए बधाई के पात्र हैं कि उनके बहाने ही सही नक्सलवाद एक बार फिर चर्चा में है और उनकी गिरफ्तारी के बहाने ही सही, माओवादी आन्दोलन को फिर से समझने की जरूरत महसूस की जाने लगी है। भले ही गृह मंत्री पी. चिदंबरम नक्सलवाद को सबसे बड़ा खतरा बता रहे हों लेकिन उनकी सरकार में ही लोग उनके इस विचार से पूर्णतया सहमत नहीं दिखते हैं। स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह यह कहने को मजबूर हो गए हैं कि नक्सलवाद सिर्फ कानून व्यवस्था का मामला नहीं है। और यह बात सही भी है। कानून व्यवस्था के मसले दषकों तक नहीं चला करते हैं। नक्सलवाद इस देष में लगभग तीन दषक से भी ज्यादा समय से पनप रहा है और इसका प्रभाव कम होने के बजाए लगातार बढ़ता ही गया है। किसी भी आतंकवादी आन्दोलन के पूरे दौर में जितने आतंकवादी मारे जाते होंगे उससे कहीं ज्यादा नक्सली हर साल पुलिस के हाथों मारे जाते हैं। अकेले छत्तीसगढ़ में एक वर्श में चार सौ के आसपास कथित नक्सली मारे गए हैं। लेकिन कोई तो बात है जो नक्सलवाद का जुनून बढ़ता ही जाता है।
दिल्ली की गद्दी पर बैठे हुक्मरानों और पूॅंजीवादी रुझान के बुद्धिजीवियों के माथे पर इस प्रष्न को लेकर चिंता की लकीरें गहरी हो गई हैं कि आखिर क्या बात है कि कोबाड़ गांधी जैसे लोग अपने कैरियर, घरबार और व्यापार को छोड़कर इस तरह के आन्दोलन से न केवल जुड़ जाते हैं बल्कि अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देते हैं। ताज्जुब इसलिए भी होता है कि अतिवामपंथी आंदोलन से जुड़ने वाले लोग न तो धर्म के पहरूए हैं, न जेहादी हैं, न जातिवादी आन्दोलन से निकलकर आए हैं। फिर उन्हें यह जुनून कहाॅं से मिलता है?
यहाॅं यह याद रखना चाहिए कि कोबाड़ गांधी इस तरह का पहला उदाहरण नहीं हैं, जिन्होंने माक्र्सवाद के सिद्धान्तों के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया हो। इससे पहले भी ईएमएस नंबूदरीपाद जैसे लोग भी हुए हैं जिनका राजघराने से ताल्लुक रहा और उनकी जमींदारी देष में सर्वाधिक मालगुजारी वसूलने वाली रियासत समझी जाती थी। लेकिन नम्बूदरीपाद अपनी सारी संपत्ति कम्युनिस्ट पार्टी को सौंपकर पूर्णकालिक कार्यकर्ता बन गए थे। कोबाड़ गांधी के जुनून को एक और तरीके से समझा जा सकता है। गौतम बुद्ध भी अपना सारा राजपाट छोड़कर दुख के निदान की तलाष में ही भिक्षु बन गए थे। लेकिन बुद्ध का रास्ता अध्यात्म का था, पलायन का था और कोबाड़ ने जो रास्ता चुना, वह है तो बुद्ध के समानान्तर ही लेकिन वह विचार का रास्ता है, संघर्श का रास्ता है, पलायन का नहीं।
यह भी बात गौेर करने लायक है कि नक्सलवाद से प्रभावित क्षेत्र वही ज्यादा हैं जहाॅं जंगल और आदिवासी ज्यादा हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि जंगल नक्सलवादियों की मदद करते हैं। बल्कि समस्या की तह तक जाना होगा। नब्बे के दषक में जब इस मुल्क में नरसिंहाराव और मनमोहन सिंह मार्का उदारीकरण आया जिसे चिदंबरम जैसे हार्वर्ड उत्पादित अर्थषास्त्रियों ने और धार दी तो देष में नए किस्म का पूॅंजीवाद आया और सरकारों की भूमिका भी बदलने लगी। नब्बे के दषक से पहले सरकार की भूमिका कल्याणकारी राज्य की मानी जाती थी। दिखावे के लिए ही सही ‘गरीबी हटाओ’ के नारे लगते थे। लेकिन नरसिंहाराव-वाजपेयी-मनमोहन की तिकड़ी ने सरकारों की भूमिका एक एनजीआंे की बना दी और सरकारें बड़े पूॅंजीपतियों और घोटालेबाजों की जेब की गुलाम बनकर रह गईं और अब तो प्रधानमंत्री जनता को नसीहत भी देने लगे हैं कि वह और महॅंगाई के लिए तैयार रहे।
उदारीकरण की आंधी में औद्योगिकीकरण और तथाकथित विकास के नाम पर किसानों की जमीनें हथियाए जाने लगीं और जंगल से आदिवासियों को बेदखल करके कारखाने लगने लगे। क्या संयोग है कि सारी बड़ी कंपनियों के काॅरपोरेट दफ्तर तो मुंबई और कोलकाता में हैं लेकिन कई कई हजार एकड़ में लगने वाले उनके प्लांट छत्तीसगढ़ और झारखण्ड के जंगलों में लग रहे हैं। बाॅंध बन तो रहे हैं विकास के नाम पर लेकिन यह बाॅंध बलि ले रहे हैं हजारों गांवों के लोगों की। इस विकास और औद्योगिकीकरण से एक आम आदमी को लाभ होने के बजाए नुकसान ही हुआ है।
काफी पहले दो छोटी सी खबरें अलग अलग अखबारों में पढ़ी थीं। एक हाल ही की घटना राजस्थान की थी। उस खबर के मुताबिक कुछ आदिवासियों को पुलिस ने पकड़ा था जिन से लगभग बारह हजार रूपए मूल्य का आंवला पकड़ा गया था। सरकार का तर्क था कि इस आंवले पर अधिकार उस ठेकेदार का है जिसे वन उपज का ठेका दिया गया है। दूसरी खबर के मुताबिक मुकेष अंबानी के जामनगर रिफाइनरी प्लांट में कई सैकड़ा एकड़ में बेहतरीन आम के पेड़ लगे हुए हैं और उन आमों का निर्यात विदेषों को किया जाता है।
अगर आपके पास दृश्टि है तो नक्सलवाद के बढ़ते प्रभाव को समझने और समझाने के लिए यह छोटी सी दो खबरें काफी हैं। राजस्थान की घटना बताती है कि जंगल से आदिवासियों का अधिकार खत्म कर दिया गया है। और अंबानी की खबर बताती है कि जामनगर का प्लांट हजारों लोगों को विस्थापित करके ही स्थापित हुआ होगा और किसानों को उनकी जमीन से बेदखल करके मुकेष अंबानी अब आम की खेती भी कर रहे हैं। इन्हीं विस्थापित लोगों के समर्थन से नक्सलवाद का विस्तार हो रहा है। यह कटु सत्य है और इसे चिदंबरम चाहे स्वीकार करें या न करें - इस विस्थापित आम आदमी के समर्थन से ही नक्सलवाद को षह मिल रही है। खुद सरकारी आंकडें बताते हैं कि वर्श 2006 में 1,509 नक्सली वारदातें हुई। जबकि वर्श 2007 में 1,565 वारदातें हुई। इन वारदातों में वर्श 2006 में 157 सुरक्षा बलों के जवान और 521 नागरिक मारे गए जबकि वर्श 2007 में 236 सुरक्षा बलों के जवान और 460 नागरिक मारे गए।
मीडिया में जो खबरें आ रही हैं, उनके मुताबिक नक्सलवाद प्रभावित राज्यों में पुलिस बल के आधुनिकीकरण के नाम पर कई हजार करोड़ रूपए सरकार खर्च करेगी। जाहिर है इसमें से अधिकांष रूपया अत्याधुनिक हथियारों की खरीद पर खर्च किया जाएगा और एक बड़ी रकम खुफिया नेटवर्क बनाने के नाम पर खर्च होगी, जिसका कोई हिसाब किताब पुलिस अफसरों को नहीं देना होता है। जाहिर है जब तक इस नेटवर्क के नाम पर और हथियारों की खरीद के नाम पर सरकार यह धन मुहैया कराती रहेगी तब तक नक्सलियों के नाम पर आम गरीब आदिवासी पुलिस मुठभेड़ों में मरता रहेगा और प्रतिषोध में इन गरीबों का समर्थन नक्सलियों को ही मिलता रहेगा। सवाल यह भी है कि आतंकवाद नक्सलवाद प्रभावित राज्यों में विकास के नाम पर जो धन राज्यों को दिया जाता है उस धन का क्या प्रयोग होता है? अगर यह धन विकास पर ही खर्च हो रहा है तो वह विकास कहाॅं हो रहा है? अक्सर समाचारपत्रों में रिपोटर््स प्रकाषित होती हैं कि नक्सली अपने क्षेत्रों में ठेकेदारों से लेवी वसूल करते हैं। खबरें सही होती भी हैं। लेकिन यही खबरें प्रष्न भी छोड़ती हैं कि नक्सली यह लेवी किन लोगों से वसूलते हैं? आम गरीब आदमी तो लेवी देता नहीं हैं। लेवी देता है भ्रश्ट ठेकेदार और इंजीनियर। जाहिर है कि अगर यह नक्सलियों को लेवी नहीं भी देगा तो उस पैसे को विकास में नहीं लगाएगा बल्कि अपनी जेब भरेगा।
इसलिए चिदंबरम जी को समझना होगा कि नक्सलवाद विचार है और विचार बन्दूकों से कुचले नहीं जाते। इसके लिए खुद चिदंबरम जी को इस व्यवस्था में सुधार करना होगा और खुद भी एक वैचारिक व्यक्ति बनना होगा। सरकार को एनजीओ की भूमिका छोड़ कर कल्याणकारी राज्य की भूमिका निभानी होगी और विकास का पैमाना बदलना होगा विस्थापन की बुनियाद पर विकास नहीं चलेगा। वरना आप एक कोबाड़ को पकड़ेंगे दस नए कोबाड़ पैदा हो जाएंगे। अभी तक का इतिहास तो यही बताता है कि नक्सली पैदा होता नहीं है बल्कि यह व्यवस्था( जिसके पैरोकार चिदंबरम और मनमोहन हैं) बनाती है। नक्सलियों का हिंसा का रास्ता एकदम गलत है , लेकिन उनका उद्देष्य गलत कहा जाए? कोबाड़ की गिरफ्तारी या छत्तीसगढ़ में नक्सलियों के नाम पर आदिवासियों का सामूहिक नरसंहार समस्या का हल कभी नहीं बन सकेगा।
वेबसाइट संचालक अमलेन्दु उपाध्याय 30 वर्ष से अधिक अनुभव वाले वरिष्ठ पत्रकार और जाने माने राजनैतिक विश्लेषक हैं। वह पर्यावरण, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, युवा, खेल, कानून, स्वास्थ्य, समसामयिकी, राजनीति इत्यादि पर लिखते रहे हैं।
शनिवार, 3 अक्टूबर 2009
सादगी पर सियासत
सादगी पर सियासत
अमलेन्दु उपाध्याय
पिछले दिनों षताब्दी में आम आदमी बनकर या़त्रा करने के बाद राहुल बाबा अचानक लखनऊ के पास बाराबंकी जिले के रामनगर के पास एक दलित गाॅंव में जा पहुॅंचे और लोकसभा चुनाव से पहले जिस तरह उन्होंने एडिसन के बल्ब की तरह ‘कलावती’ का आविश्कार किया था उसी तरह बाराबंकी में उन्होंने ‘जलवर्शा’ की सफल खोज की। कांग्रेसी युवराज राहुल बाबा का अगला टारगेट उत्तर प्रदेष है। इसलिए उनके मीडिया मैनेजर कायदे से मीडिया प्रबंधन कर रहे हैं और उनकी छवि निर्माण में व्यस्त हैं। लिहाजा उनकी सादगी के चर्चे कुछ ज्यादा ही हो रहे हैं और सोने पर सुहागा यह है कि राहुल बाबा बिना बताए दलितों के घर भी पहुॅंच रहे हैं और उनके घर पर भोजन भी कर रहे हैं।
राहुल बाबा के इस महान कार्य की तारीफ होनी चाहिए थी, सो हुई भी और बहन जी को धक्का लगना था सो लगा ही। जाहिर है यह सारी नौटंकी उत्तर प्रदेष में होने के कारण दलित की बेटी बहन मायावती का क्रोधित होना स्वाभाविक है। लेकिन इस तू-तू- मैं-मैं में असल सवाल पीछे छूटता जा रहा है कि राहुल बाबा के इस कलावती-जलवर्शा नाटक से आम दलितों का क्या भला हो रहा है? क्या इस नौटंकी से दलितों की रोजी रोटी के अवसर बढ़ गए? या दलितों को बराबरी का हक मिल गया? अगर ऐसा है या हमारे कांग्रेसी विद्वजन ऐसा मानते हैं कि राहुल बाबा के तूफानी दौरों ने दलितों का जीवन बदल दिया है और अब आम दलित की रोजाना मजदूरी पचास रूपये प्रतिदिन से बढ़कर इक्यावन रूपये प्रतिदिन हो गई है, तब तो मानना पड़ेगा कि राहुल बाबा कांग्रेस के सपूत हैं और जिस काम को इंदिरा और राजीव नहीं कर पाए उसे राहुल बाबा करके अपनी सात पुष्तों के गुनाहों का प्रायष्चित कर रहे हैं।
जहां तक राहुल बाबा की सादगी का सवाल है तो यह सादगी की मुहिम तब षुरू हुई जब विदेषमंत्री एसएम कृश्णा और विदेष राज्य मंत्री षषि थरूर की विलासिता की पोल देष के सामने खुली कि किस तरह से ‘कांग्रेस का हाथ/ आम आदमी के साथ’ का नारा देने वाले कांग्रेसी भद्रजन जनता की मेहनत की कमाई पर गुलछर्रे उड़ा रहे हैं। उसके बाद राहुल बाबा ने षताब्दी में यात्रा की। उनकी षताब्दी यात्रा को मीडिया में प्रचारित किया गया कि राहुल ने आम आदमी की तरह षताब्दी में सफर किया। मुबारक हो! अब भद्र कांग्रेसजनों और उनके मीडियाई पिछलग्गुओं ने आम आदमी की परिभाशा भी बदल दी। अब आम आदमी षताब्दी में यात्रा करता है और विमान की इकाॅनाॅमी क्लास में मवेषी यात्रा करते हैं। इस हिसाब से पैसेंजर ट्रेन में या रेलगाड़ी के जनरल डिब्बे में कीड़े मकोड़े यात्रा करते हैं। यह एक शडयन्त्र है। राहुल की षताब्दी यात्रा के बहाने आम आदमी की परिभाशा बदली जा रही है। राहुल को अगर साधारण आदमी बनने का इतना ही षौक है तो जरा किसी रेल की जनरल बोगी में सफर कर लें आम आदमी बनने का सारा नषा काफूर हो जाएगा।
इससे पहले राहुल बाबा को भी सादगी याद नहीं आई थी अचानक सारे कांग्रेसियों के सिर पर सादगी का भूत सवार हांे गया। राहुल बाबा ने बाराबंकी में ‘दलित ग्राम प्रधान’ के घर पर भोजन तो किया लेकिन वहां से 250 किमी दूर उस गोरखपुर जाने की जहमत नहीं उठा पाए जहां जापानी बुखार से तीन सौ से ज्यादा दलितों के बच्च्ेा पिछले दो माह में ही मारे गए हैं। वैसे राहुल बाबा समझदार हैं इसीलिए वह दलितों के घर जाकर तो खाना खा रहे हैं, लेकिन किसी दलित को दस जनपथ लाकर खाना नहीं खिला रहे हैं यह बात दीगर है कि दस जनपथ पर एक इफ्तार पार्टी पर ही लगभग एक करोड़ रूपया खर्च हो जाता है। क्या राहुल बाबा अपने इस दलित अभियान के तहत अगली यात्रा बिहार की करना पसंद करेंगे जहां वह दलित जाति ‘मुसहरों के टोले में रात गुजारें और उनके साथ भोजन करके यह जानने का प्रयास करेंगे कि यह लोग जिस भोजन (चूहे) को खाने की वजह से मुसहर नाम से जाने जाते हैं उसे और लोग क्यों नहीे खाते?
यह राहुल गांधी का दुर्भाग्य है कि जब वह गांव में गए तो उन्हें लोगों ने पहचाना ही नहीं और उन्हें बताना पड़ा कि वह राजीव गांधी के बेटे हैं। केवल यही एक घटना राहुल की सादगी की पोल पट्टी खोलने के लिए काफी है। क्या राजीव गांधी को कभी बताने की जरूरत पड़ी थी कि वह इंदिरा गांधी के बेटे हैं? या इंदिरा गांधी को कभी बताने की जरूरत पड़ी थी कि वह जवाहर लाल नेहरू की बेटी हैं? लेकिन राहुल गांधी को बताना पड़ रहा है कि वह राजीव गांधी के बेटे हैं।
राहुल अपने नाटक से कांग्रेस के लिए ही मुसीबतें खड़ी कर रहे हैं। अब अगर राहुल दलित इलाकों का विकास न होने के लिए कोस रहे हैं, तो किसको? इस देष पर पांच दषक तक कांग्रेस का षासन रहा। लिहाजा विकास न होने का दोश तो सबसे अधिक कांग्रेस के ही सिर पर है। फिर राहुल सवाल किससे कर रहे हैं?
रहा सवाल राहुल की सादगी का, अगर आज इंदिरा गांधी जीवित होतीं तो क्या कीतीं? मनोहर ष्याम जोषी ने इंदिरा गांधी का एक बार साक्षात्कार लिया था जब इंदिरा जी प्रधानमंत्री थीं। जोषी जी ने कांग्रेसी नेताओं की सादगी पर उनसे सवाल पूछा तो इंदिरा जी ने जबाव दिया-”यह सही है कि कांग्रेस को सादगी और जनसेवा की दिषा में नेतृत्व देना चाहिए लेकिन जो लोग यह समझते हैं कि बॅंगला छोड़कर झोपड़ी में जा बसना चाहिए नेताओं को, वह बात एक दिखावटी षगल सी मालूम होती है। कुछ सहूलियतें जरूरी होती हैं सरकारी कामकाज के लिए, सुरक्षा और गोपनीयता के भी कुछ तकाजे होते हैं। उनके पूरे किए जाने का मतलब षानो-षौकत नहीं है। हाॅं उससे अधिक कुछ होता तो वह ठीक नहीं।“ कुछ समझे राहुल बाबा! आपकी दादी स्व. इंदिरा जी आपकी सादगी को एक दिखावटी षगल बता रही हैं। इसलिए युवराज अब तो आम आदमी बनने का नाटक करके गरीबों की गरीबी का मजाक उड़ाना बन्द करो!!!
(लेखक राजनीतिक समीक्षक हैं और ‘दि संडे पोस्ट’ में सह संपादक हैं।)
अमलेन्दु उपाध्याय
पिछले दिनों षताब्दी में आम आदमी बनकर या़त्रा करने के बाद राहुल बाबा अचानक लखनऊ के पास बाराबंकी जिले के रामनगर के पास एक दलित गाॅंव में जा पहुॅंचे और लोकसभा चुनाव से पहले जिस तरह उन्होंने एडिसन के बल्ब की तरह ‘कलावती’ का आविश्कार किया था उसी तरह बाराबंकी में उन्होंने ‘जलवर्शा’ की सफल खोज की। कांग्रेसी युवराज राहुल बाबा का अगला टारगेट उत्तर प्रदेष है। इसलिए उनके मीडिया मैनेजर कायदे से मीडिया प्रबंधन कर रहे हैं और उनकी छवि निर्माण में व्यस्त हैं। लिहाजा उनकी सादगी के चर्चे कुछ ज्यादा ही हो रहे हैं और सोने पर सुहागा यह है कि राहुल बाबा बिना बताए दलितों के घर भी पहुॅंच रहे हैं और उनके घर पर भोजन भी कर रहे हैं।
राहुल बाबा के इस महान कार्य की तारीफ होनी चाहिए थी, सो हुई भी और बहन जी को धक्का लगना था सो लगा ही। जाहिर है यह सारी नौटंकी उत्तर प्रदेष में होने के कारण दलित की बेटी बहन मायावती का क्रोधित होना स्वाभाविक है। लेकिन इस तू-तू- मैं-मैं में असल सवाल पीछे छूटता जा रहा है कि राहुल बाबा के इस कलावती-जलवर्शा नाटक से आम दलितों का क्या भला हो रहा है? क्या इस नौटंकी से दलितों की रोजी रोटी के अवसर बढ़ गए? या दलितों को बराबरी का हक मिल गया? अगर ऐसा है या हमारे कांग्रेसी विद्वजन ऐसा मानते हैं कि राहुल बाबा के तूफानी दौरों ने दलितों का जीवन बदल दिया है और अब आम दलित की रोजाना मजदूरी पचास रूपये प्रतिदिन से बढ़कर इक्यावन रूपये प्रतिदिन हो गई है, तब तो मानना पड़ेगा कि राहुल बाबा कांग्रेस के सपूत हैं और जिस काम को इंदिरा और राजीव नहीं कर पाए उसे राहुल बाबा करके अपनी सात पुष्तों के गुनाहों का प्रायष्चित कर रहे हैं।
जहां तक राहुल बाबा की सादगी का सवाल है तो यह सादगी की मुहिम तब षुरू हुई जब विदेषमंत्री एसएम कृश्णा और विदेष राज्य मंत्री षषि थरूर की विलासिता की पोल देष के सामने खुली कि किस तरह से ‘कांग्रेस का हाथ/ आम आदमी के साथ’ का नारा देने वाले कांग्रेसी भद्रजन जनता की मेहनत की कमाई पर गुलछर्रे उड़ा रहे हैं। उसके बाद राहुल बाबा ने षताब्दी में यात्रा की। उनकी षताब्दी यात्रा को मीडिया में प्रचारित किया गया कि राहुल ने आम आदमी की तरह षताब्दी में सफर किया। मुबारक हो! अब भद्र कांग्रेसजनों और उनके मीडियाई पिछलग्गुओं ने आम आदमी की परिभाशा भी बदल दी। अब आम आदमी षताब्दी में यात्रा करता है और विमान की इकाॅनाॅमी क्लास में मवेषी यात्रा करते हैं। इस हिसाब से पैसेंजर ट्रेन में या रेलगाड़ी के जनरल डिब्बे में कीड़े मकोड़े यात्रा करते हैं। यह एक शडयन्त्र है। राहुल की षताब्दी यात्रा के बहाने आम आदमी की परिभाशा बदली जा रही है। राहुल को अगर साधारण आदमी बनने का इतना ही षौक है तो जरा किसी रेल की जनरल बोगी में सफर कर लें आम आदमी बनने का सारा नषा काफूर हो जाएगा।
इससे पहले राहुल बाबा को भी सादगी याद नहीं आई थी अचानक सारे कांग्रेसियों के सिर पर सादगी का भूत सवार हांे गया। राहुल बाबा ने बाराबंकी में ‘दलित ग्राम प्रधान’ के घर पर भोजन तो किया लेकिन वहां से 250 किमी दूर उस गोरखपुर जाने की जहमत नहीं उठा पाए जहां जापानी बुखार से तीन सौ से ज्यादा दलितों के बच्च्ेा पिछले दो माह में ही मारे गए हैं। वैसे राहुल बाबा समझदार हैं इसीलिए वह दलितों के घर जाकर तो खाना खा रहे हैं, लेकिन किसी दलित को दस जनपथ लाकर खाना नहीं खिला रहे हैं यह बात दीगर है कि दस जनपथ पर एक इफ्तार पार्टी पर ही लगभग एक करोड़ रूपया खर्च हो जाता है। क्या राहुल बाबा अपने इस दलित अभियान के तहत अगली यात्रा बिहार की करना पसंद करेंगे जहां वह दलित जाति ‘मुसहरों के टोले में रात गुजारें और उनके साथ भोजन करके यह जानने का प्रयास करेंगे कि यह लोग जिस भोजन (चूहे) को खाने की वजह से मुसहर नाम से जाने जाते हैं उसे और लोग क्यों नहीे खाते?
यह राहुल गांधी का दुर्भाग्य है कि जब वह गांव में गए तो उन्हें लोगों ने पहचाना ही नहीं और उन्हें बताना पड़ा कि वह राजीव गांधी के बेटे हैं। केवल यही एक घटना राहुल की सादगी की पोल पट्टी खोलने के लिए काफी है। क्या राजीव गांधी को कभी बताने की जरूरत पड़ी थी कि वह इंदिरा गांधी के बेटे हैं? या इंदिरा गांधी को कभी बताने की जरूरत पड़ी थी कि वह जवाहर लाल नेहरू की बेटी हैं? लेकिन राहुल गांधी को बताना पड़ रहा है कि वह राजीव गांधी के बेटे हैं।
राहुल अपने नाटक से कांग्रेस के लिए ही मुसीबतें खड़ी कर रहे हैं। अब अगर राहुल दलित इलाकों का विकास न होने के लिए कोस रहे हैं, तो किसको? इस देष पर पांच दषक तक कांग्रेस का षासन रहा। लिहाजा विकास न होने का दोश तो सबसे अधिक कांग्रेस के ही सिर पर है। फिर राहुल सवाल किससे कर रहे हैं?
रहा सवाल राहुल की सादगी का, अगर आज इंदिरा गांधी जीवित होतीं तो क्या कीतीं? मनोहर ष्याम जोषी ने इंदिरा गांधी का एक बार साक्षात्कार लिया था जब इंदिरा जी प्रधानमंत्री थीं। जोषी जी ने कांग्रेसी नेताओं की सादगी पर उनसे सवाल पूछा तो इंदिरा जी ने जबाव दिया-”यह सही है कि कांग्रेस को सादगी और जनसेवा की दिषा में नेतृत्व देना चाहिए लेकिन जो लोग यह समझते हैं कि बॅंगला छोड़कर झोपड़ी में जा बसना चाहिए नेताओं को, वह बात एक दिखावटी षगल सी मालूम होती है। कुछ सहूलियतें जरूरी होती हैं सरकारी कामकाज के लिए, सुरक्षा और गोपनीयता के भी कुछ तकाजे होते हैं। उनके पूरे किए जाने का मतलब षानो-षौकत नहीं है। हाॅं उससे अधिक कुछ होता तो वह ठीक नहीं।“ कुछ समझे राहुल बाबा! आपकी दादी स्व. इंदिरा जी आपकी सादगी को एक दिखावटी षगल बता रही हैं। इसलिए युवराज अब तो आम आदमी बनने का नाटक करके गरीबों की गरीबी का मजाक उड़ाना बन्द करो!!!
(लेखक राजनीतिक समीक्षक हैं और ‘दि संडे पोस्ट’ में सह संपादक हैं।)
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वेबसाइट संचालक अमलेन्दु उपाध्याय 30 वर्ष से अधिक अनुभव वाले वरिष्ठ पत्रकार और जाने माने राजनैतिक विश्लेषक हैं। वह पर्यावरण, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, युवा, खेल, कानून, स्वास्थ्य, समसामयिकी, राजनीति इत्यादि पर लिखते रहे हैं।
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