अस्सी के दशक में मेरठ के दंगों के बाद मशहूर शायर बशीर बद्र ने कहा था- 'तेग़ मुंसिफ हो जहां दारो रसन हो शाहिद/ बेगुनाह कौन है इस शहर में क़ातिल के सिवा?' (यानी जहां तलवार जज हो और फांसी का फंदा गवाह हो, उस शहर में क़ातिल के अलावा बेगुनाह कौन है)। अजब इत्तेफाक है कि बद्र साहब मेरठ को छोड़कर नवाबों के शहर भोपाल में जा बसे। लेकिन आज जब भोपाल गैस त्रासदी का 25 वर्ष बाद फैसला आया तो उनका मेरठ पर कहा गया शेर भोपाल पर भी फिट बैठा।
पन्द्रह हजार लोगों के क़ातिलों को 25 वर्ष चले मुकदमे के बाद महज दो साल की सजा सुनाई गई जिसे कुल जमा 25 हजार रुपये के मुचलके पर उन्हें तत्काल रिहा भी कर दिया गया। तमाशा यह है कि भोपाल के सबसे बड़े मुजरिम एंडरसन को भारत सरकार आज तक अमरीका से मांगने की जुर्रत भी नहीं कर पाई। भगोड़ा एंडरसन भारत सरकार और भोपाल गैस पीड़ितों को मुंह चिढ़ाते हुए आज भी अमरीका में ऐश-ओ-आराम से रह रहा है और हमारे प्रधानमंत्री जब अमरीका जाते हैं तो जॉर्ज बुश को भारत का प्यार देकर आते हैं ताकि फिर कोई यूनियन कार्बाइड भोपाल कांड को अंजाम दे। जबकि भोपाल के पीड़ित हर पल तड़प् तड़प् कर जी रहे हैं और पिछले पच्चीस सालों से सजा भुगत रहे हैं।
भोपाल गैस त्रासदी पर आया अदालत का फैसला हमारे लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था के मुंह पर करारा तमाचा है। इस फैसले ने साबित कर दिया है कि मुल्क में ताकतवर अमीरों के लिए कानून अलग ढंग से काम करता है और जिस न्यायपालिका के निष्पक्ष होने का ढिंढोरा पीटा जाता है वह दुनिया का सबसे बड़ा झूठ है। क्या न्यायपालिका क्या सरकार क्या सीबीआई सब के सब भोपाल के क़ातिलों के हक़ में खड़े दिखाई दिए हैं।
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा है कि वह सजा बढ़वाए जाने के लिए कानून बनाए जाने का अनुरोध प्रधानमंत्री से करेंगे और कानून मंत्री वीरप्पा मोइली भी कड़ी सजा दिलाए जाने की बात कर रहे हैं। लेकिन जब तक यह कानून बनेगा (पता नहीं कब बनेगा?) भोपाल के बेगुनाहों के क़ातिल आरामतलब ज़िन्दगी पूरी करके अल्लाह को प्यारे हो चुके होंगे और पीड़ितों की आने वाली नस्लें भी सजा भुगत रही होंगी?
आज भले ही कानून मंत्री वीरप्पा मोइली कह रहे हों कि यह फैसला पीड़ितों के साथ मज़ाक है लेकिन यह भी कड़वा सच है कि यह मजाक करवाने के लिए भी तत्कालीन और वर्तमान कांग्रेसी सरकार भी कम जिम्मेदार नहीं है। आखिर कैसे बिना तत्कालीन कांग्रेस सरकार के सहयोग के मुख्य हत्यारा एंडरसन भारत छोड़कर भाग निकला? कैसे बिना सरकार के सहयोग के यूनियन कार्बाइड अपना हिस्सा बेचने में सफल हो गई? जाहिर है क़ातिलों के हाथ बहुत लम्बे थे इतने लम्बे कि उच्चतम न्यायालय का एक फैसला भी उनको बचाने में मददगार ही साबित हुआ।
भोपाल का फैसला हमारे पूरे सिस्टम पर सवालिया निशान लगाता है। इस फैसले से न्यायपालिका की भी साख गिरी है। सीबीआई और सरकार को तो लोग क़ातिलों के हमराही मान ही चुके हैं लेकिन उच्चतम न्यायालय की साख को भी बट्टा लगा है। सवाल यहां सियासी जमातों से हो सकता है कि अफजल गुरू को फांसी के फंदे पर लटकवा देने को बेकरार लोगों की जुबां पर पिछले पच्चीस सालों में एक बार भी एंडरसन को फांसी पर चढ़ा देने की बात क्यों नहीं आई? क्या सिर्फ इसलिए क्योंकि अफजल की फांसी से कुछ सियासतदानों को फायदा हो सकता है और भोपाल के बेगुनाहों के क़ातिलों को सजा मिलने से सियासी फायदा नहीं होगा?
भारत सरकार रोज पाकिस्तान से हाफिज़ सईद और लखवी को मांगती है। लेकिन क्या एक बार भी एंडरसन को अमरीका से मांगने का हौसला दिखाया गया। अमरीका से परमाणु करार करने के लिए अपनी सरकार को दांव पर लगा देने वाले अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री क्यों अमरीका से यह कहने का हौसला नहीं जुटा पाए कि जब तक हमें एंडरसन नहीं दोगे तुमसे कोई बात नहीं होगी? सईद और लखवी तो फिर भी कुछ लोगों को मारने के लिए अपने कुछ लोगों को मरवाते भी हैं लेकिन एंडरसन तो एक रात में पन्द्रह हजार लोगों का क़त्ल कर देता है। एंडरसन निश्चित रूप से लखवी और सईद और लादेन से बड़ा हत्यारा है।
दो दिसंबर 1982 के बाद से इस मुल्क में कई दफा कांग्रेस की सरकार रही, भारतीय जनता पार्टी की सरकार रही, राष्ट्रीय मोर्चा और संयुक्त मोर्चा की सरकार रही लेकिन किसी भी सरकार ने क़ातिलों को सजा दिलाना तो दूर बल्कि उन्हें महिमामंडित किया। सजायाफ्ता हत्यारों में से एक केशव महिन्द्रा, जो त्रासदी के समय यूनियन कार्बाइड का चेयरमैन था, की सत्ता के गलियारों में तूती बोलती रही। भाजपा प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद आज सरकार से भोपाल कांड के फैसले के आलोक में भले ही परमाणु दायित्व विधेयक पर चर्चा की मांग कर रहे हों लेकिन राष्ट्रभक्ति का प्रमाणपत्र बांटने वाली भारतीय जनता पार्टी की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने वर्ष 2002 में इसी केशव महिन्द्रा को पद्म भूषण पुरस्कार देने का ऐलान किया था। क्या तब वाजपेयी सरकार को नहीं मालूम था कि केशव महिन्द्रा पर भोपाल के 15000 बेगुनाहों के क़त्ल का मुकदमा चल रहा है?
महिन्द्रा का सफ़र यहीं खत्म नहीं होता है। वह सरकार की कई बड़ी महत्वपूर्ण और निर्णायक समितियों का भी सम्मानित सदस्य रहा है। वह ‘सेन्ट्रल एडवायजरी काउन्सिल ऑफ इंडस्ट्रीज' का सदस्य और कम्पनी मामलों के महत्वपूर्ण आयोग ‘सच्चर कमीशन ऑन कम्पनी लॉ एण्ड एमआरटीपी’ का सदस्य रहा। इससे भी बढ़कर बात यह है कि महिन्द्रा, प्रधानमंत्री की व्यापार और उद्योग पर बनी सलाहकार परिषद का सदस्य रहा है। अब समझा जा सकता है कि कैसे यह फैसला आने में पच्चीस साल लग गए? एंडरसन और केशव महिन्द्रा का गैंग भविष्य की विश्व की आर्थिक शक्ति बनते भारत (जिसका दावा प्रधानमंत्री और उनके प्रशंसक करते हैं) का मज़ाक उड़ा रहा है। क्या आपने भी सुना मनमोहन सिंह जी????
मंगलवार, 8 जून 2010
15000 बेगुनाहों का पद्म भूषण हत्यारा
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वेबसाइट संचालक अमलेन्दु उपाध्याय 30 वर्ष से अधिक अनुभव वाले वरिष्ठ पत्रकार और जाने माने राजनैतिक विश्लेषक हैं। वह पर्यावरण, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, युवा, खेल, कानून, स्वास्थ्य, समसामयिकी, राजनीति इत्यादि पर लिखते रहे हैं।
सोमवार, 31 मई 2010
ममता मीडिया की कारस्तानी और सरडीहा का सच
ममता मीडिया की कारस्तानी और सरडीहा का सच
अमलेन्दु उपाध्याय
ममता मीडिया की कारस्तानी और सरडीहा का सच
अमलेन्दु उपाध्याय
पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले में सरडीहा के पास हुई रेल दुर्घटना के तुरंत बाद देश भर में मचे बवंडर ने एक बारगी यह सोचने को मजबूर कर दिया था कि क्या वास्तव में भारत के नक्सलवादी नरपिशाच हैं? दुर्घटना स्थल पर पहुंची रेल मंत्री ममता बनर्जी ने जिस बेशर्मी और बेहूदगी से इसके लिए नक्सलवादियों को जिम्मेदार ठहराते हुए अपनी और अपने विभाग के निकम्मेपन से पल्ला झाड़ा और हमारे लोकतंत्र के तथाकथित चैथे स्तंभ बड़े पूंजीपतियों के टुकड़ों पर पलने वाले राष्ट्रीय मीडिया ने जिस निर्लज्जता के साथ इस दुर्घटना को नक्सली हमला करार दिया उसने मीडिया, नक्सलवाद और लोकतंत्र में नैतिकता के प्रश्नों पर एकबारगी फिर सोचने पर मजबूर कर दिया है।
पहली बात तो नक्सलियों की ही की जाए। नक्सलवादियों के लाख दावे के बावजूद कि वह आम आदमी की लड़ाई लड़ रहे हैं, उनके हथियारबंद संघर्ष को जायज नहीं ठहराया जा सकता। सिर्फ इसलिए नहीं कि भारत में लोकतंत्र नाम की कोई चीज सुनाई पड़ती है। बल्कि इसलिए भी कि नक्सली जिस क्रांति की बात करते हैं वह क्रांति उनके इस तरह के रास्ते से नहीं आ सकती है। क्रांति की भूमिका के लिए जो तीन चार प्रमुख कारण बताए जाते है,ं उनमें से कई महत्वपूर्ण कारण अभी भारत में मौजूद नहीं हैं और जब तक यह कारण नहीं होंगे क्रांति सफल नहीं हो सकती है। क्रांति की अनिवार्य षर्त है कि देश के अंदर गृह युद्ध के हालात होने चाहिए और राजनीतिक उठापटक का माहौल होना चाहिए, किसी बाहरी देश के आक्रमण का खतरा हो और राजसत्ता लाचार हो। लेकिन भारत में इस तरह के कोई हालात अभी तो नहीं हैं। सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों की आर्थिक नीतियां एक सी हैं और उनमें नीतिगत कोई मतभेद नहीं है बल्कि दोनों एक ही हैं। वहीं देश के अंदर बड़ी तेजी से एक संस्कारविहीन, फर्जीवाड़े की अर्थव्यवस्था की कोख से एक ऐसा उच्च मध्य वर्ग पैदा हुआ है जो स्वयं को पढ़ा लिखा कहता तो है लेकिन है फूहड़। इस वर्ग को नरसिंहराव- मनमोहन- वाजपेयी की तिकड़ी ने फलने फूलने का अवसर दिया है। यह वर्ग राजसत्ता का हिमायती हेै और उसके हर जुल्म- औ- सितम का हिमायती है। ऐसे में गरीबों के हितों की खातिर की जाने वाली कोई भी सशस्त्र क्रांति फलीभूत नहीं हो सकती है।
तो क्या नक्सलियों को आम आदमी की लड़ाई लड़ना बंद कर देना चाहिए? बिल्कुल नहीं! लेकिन उन्हें अपना रास्ता बदल देना चाहिए। पहले आम जनता के बीच जाकर समझाएं कि वह करना क्या चाहते हैं और उनका आम आदमी से कोई बैर नहीं है और पूंजीवादी मीडिया उनके खिलाफ मिथ्या प्रचार कर रहा है। वरना यही होगा जो सरडीहा के मामले में मीडिया ने ममता बनर्जी के सहयोग से किया। ममता ने घटनास्थल पर जाकर कहा कि विस्फोट किया गया है। जबकि खुद गृह मंत्रालय और वित्त मंत्री इस आरोप से सहमत नहीं हैं। मीडिया में ही जो रिपोर्ट्स आईं उनके मुताबिक वहां पचास मीटर तक फिश प्लेट्स उखाड़ी गई थीं और मौके पर लगता था कि ट्रैक की कई घंटों से जांच नहीं की गई थी। लेकिन हमारे न्यूज चैनल्स ममता बनर्जी के बयान को ही ले उड़े। हर चैनल चिल्ला रहा था नक्सली हमले में 76 मरे, रेलवे पर लाल हमला। बताया गया कि घटनास्थल से नक्सली समर्थक पीसीपीए के पोस्टर मिले हैं जिसमें इस घटना की जिम्मेदारी ली गई है। लेकिन किसी भी समाचार वाचक ने यह रहस्य खोलने की जहमत नहीं उठाई कि पीसीपीए नक्सलवादी नहीं है, उसे सिर्फ नक्सलियों की हिमायत हासिल है। पीसीपीए मुखिया छत्रधर महतो बाकायदा तृणमूल कांग्रेस का पदाधिकारी था और पिछले विधानसभा चुनाव में पीसीपीए ने तृणमूल कांग्रेस को समर्थन दिया था। इस लिहाज से अगर यह पीसीपीए का काम है तब तो इसके लिए ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ही ज्यादा जिम्मेदार है। वैसे भी तृणमूल जब तब बंगाल में रेलवे ट्रैक पर हमला करती रहती है और फिश प्लेट्स उखाड़ने में उसे महारत हासिल है।
वैसे भी अभी तक की घटनाओं में जब भी नक्सलियों ने रेलवे को कोई नुकसान पहुंचाया है तो तत्काल नजदीक के केबिन और रेलवे स्टेषन को सूचना पहुंचाई है ताकि कोई दुर्घटना न हो। सवाल यह है कि क्या हमारा मीडिया सकलडीहा का ठीकरा नक्सलियों के सिर फोड़कर ममता बनर्जी को निर्दोष साबित करना चाहता है? क्या यह सही नहीं है कि मृतकों में से पचास से भी अधिक ने दुर्धटना के 48 घंटे बाद सरकारी अव्यवस्था के चलते दम तोड़ा है? क्या यह भी सही नहीं है कि राहत ट्रेन दुर्घटनास्थल पर दो धंटे बाद और क्रेन आठ घंटे बाद पहुंची? क्या यह भी सही नहीं है कि रेलवे के सभी बड़े अफसर दुर्घटना स्थल पर ममता बनर्जी के साथ ही अगले दिन पहुंचे ? क्या इसके लिए भी नक्सली ही जिम्मेदार हैं? कायदे से इस दुर्घटना के लिए ममता बनर्जी को ततकाल त्यागपत्र दे देना चाहिए और प्रधानमंत्री को भी चाहिए कि इस हादसे की जांच में ममता की लापरवाही और साजिष की भी निष्पक्ष जांच करवाएं। एक तरफ ममता का कहना है कि घटना स्थल पर फिश प्लेटें बैल्ड की गई थीं और पेंड्रोल क्लिप या फिश प्लेट उखाड़े जाने का कोई प्रश्न ही नहीं है जबकि हमारे मीडिया के साथी ही मौके से बता रहेे हैं कि फिश प्लेटें उखड़ी हुई थीं। फिश प्लेटें उखड़ना रेलवें के लिए कोई नई बात नहीं है। एक अखबार ने खुलासा किया है कि देश की राजधानी दिल्ली से बीस किलोमीटर दूर गाजियाबाद के रास्ते के ट्रैक पर वर्ष 2010 में ही पांच हजार फिश प्लेटें उखड़ी पाई गई हैं। इतना ही नहीं उखड़ी हुई फिश प्लेटों के ऊपर से राजधानी एक्सप्रेस गुजर जाने की भी खबरें पिछले दिनों आई थीं। जाहिर है दिल्ली में अभी नक्सली नहीं पहुंचे हैं ममता आपा!!
लगातार तीन दिन तक हमारे समाचारपत्रों ने सरडीहा की दुर्घटना पर तो दस बीस लाइनें ही लिखी होंगी लेकिन नक्सलियों पर कई कई पन्ने काले किए। हमारे बड़े पत्रकारों ने अपनी लेखनी का सारा कला कौशल नक्सलियो पर ही खर्च कर दिया। किसी ने लिखा- ‘नक्सलियों ने फिर ढाया कहर’, तो किसी ने लिख डाला- ‘ भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनते जा रहे नक्सलियों ने पं. बंगाल में ट्रेन को निशाना बनाकर 76 मुसाफिरों को मार डाला’। गोया भूख गरीबी अषिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे अब भारत के लिए चुनौती रहे ही नहीं बस नक्सली ही रह गए हैं।
वह तो गनीमत है कि कुछ दिन पहले ही एयर इंडिया का विमान मंगलौर में दुर्घटनाग्रस्त हुआ। कहीं इत्तेफाक से यह दंतेवाड़ा या मिदनापुर में दुर्घटनाग्रस्त हुआ होता तो हमारे मीडिया के धुरंधर इसका इलजाम भी नक्सलियों के सिर रखते। तमाषा यह है कि पूरे मीडिया ने नक्सलियों को दोष मढ़ने में तो कोई देरी नहीं की लेकिन भाकपा माओवादी के मयूरभंज-पूर्वी सिंहभूम बाॅर्डर एरियेा कमेटी के प्रवक्ता मंगल सिंह के इस बयान कि ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस के विस्फोट में भाकपा माओवादी का हाथ नहीं हैं ऐसी घटनाओं से आम आदमी के साथ साथ माओवादी संगठन को भी नुकसान होता है ऐसी स्थिति में उनका संगठन ऐसी घटना को क्यों अंजाम देगा, को एक दो अखबारों ने ही कहीं कोने में लगाया। मीडिया के शोर में मंगल सिंह की यह आवाज कि ‘हम आम आदमी के हित में उनके अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष करते हैं न कि उन्हें नुकसान पहुंचाने के लिए?’ दबकर रह गई।
सरडीहा दुर्घटना की एफआईआर में नक्सलवादियों का जिक्र न होने पर स्यापा करने वाले हमारे बड़े पत्रकार साथी क्या अपनी असली जिम्मेदारी पर भी ध्यान देंगे????
अमलेन्दु उपाध्याय
ममता मीडिया की कारस्तानी और सरडीहा का सच
अमलेन्दु उपाध्याय
पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले में सरडीहा के पास हुई रेल दुर्घटना के तुरंत बाद देश भर में मचे बवंडर ने एक बारगी यह सोचने को मजबूर कर दिया था कि क्या वास्तव में भारत के नक्सलवादी नरपिशाच हैं? दुर्घटना स्थल पर पहुंची रेल मंत्री ममता बनर्जी ने जिस बेशर्मी और बेहूदगी से इसके लिए नक्सलवादियों को जिम्मेदार ठहराते हुए अपनी और अपने विभाग के निकम्मेपन से पल्ला झाड़ा और हमारे लोकतंत्र के तथाकथित चैथे स्तंभ बड़े पूंजीपतियों के टुकड़ों पर पलने वाले राष्ट्रीय मीडिया ने जिस निर्लज्जता के साथ इस दुर्घटना को नक्सली हमला करार दिया उसने मीडिया, नक्सलवाद और लोकतंत्र में नैतिकता के प्रश्नों पर एकबारगी फिर सोचने पर मजबूर कर दिया है।
पहली बात तो नक्सलियों की ही की जाए। नक्सलवादियों के लाख दावे के बावजूद कि वह आम आदमी की लड़ाई लड़ रहे हैं, उनके हथियारबंद संघर्ष को जायज नहीं ठहराया जा सकता। सिर्फ इसलिए नहीं कि भारत में लोकतंत्र नाम की कोई चीज सुनाई पड़ती है। बल्कि इसलिए भी कि नक्सली जिस क्रांति की बात करते हैं वह क्रांति उनके इस तरह के रास्ते से नहीं आ सकती है। क्रांति की भूमिका के लिए जो तीन चार प्रमुख कारण बताए जाते है,ं उनमें से कई महत्वपूर्ण कारण अभी भारत में मौजूद नहीं हैं और जब तक यह कारण नहीं होंगे क्रांति सफल नहीं हो सकती है। क्रांति की अनिवार्य षर्त है कि देश के अंदर गृह युद्ध के हालात होने चाहिए और राजनीतिक उठापटक का माहौल होना चाहिए, किसी बाहरी देश के आक्रमण का खतरा हो और राजसत्ता लाचार हो। लेकिन भारत में इस तरह के कोई हालात अभी तो नहीं हैं। सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों की आर्थिक नीतियां एक सी हैं और उनमें नीतिगत कोई मतभेद नहीं है बल्कि दोनों एक ही हैं। वहीं देश के अंदर बड़ी तेजी से एक संस्कारविहीन, फर्जीवाड़े की अर्थव्यवस्था की कोख से एक ऐसा उच्च मध्य वर्ग पैदा हुआ है जो स्वयं को पढ़ा लिखा कहता तो है लेकिन है फूहड़। इस वर्ग को नरसिंहराव- मनमोहन- वाजपेयी की तिकड़ी ने फलने फूलने का अवसर दिया है। यह वर्ग राजसत्ता का हिमायती हेै और उसके हर जुल्म- औ- सितम का हिमायती है। ऐसे में गरीबों के हितों की खातिर की जाने वाली कोई भी सशस्त्र क्रांति फलीभूत नहीं हो सकती है।
तो क्या नक्सलियों को आम आदमी की लड़ाई लड़ना बंद कर देना चाहिए? बिल्कुल नहीं! लेकिन उन्हें अपना रास्ता बदल देना चाहिए। पहले आम जनता के बीच जाकर समझाएं कि वह करना क्या चाहते हैं और उनका आम आदमी से कोई बैर नहीं है और पूंजीवादी मीडिया उनके खिलाफ मिथ्या प्रचार कर रहा है। वरना यही होगा जो सरडीहा के मामले में मीडिया ने ममता बनर्जी के सहयोग से किया। ममता ने घटनास्थल पर जाकर कहा कि विस्फोट किया गया है। जबकि खुद गृह मंत्रालय और वित्त मंत्री इस आरोप से सहमत नहीं हैं। मीडिया में ही जो रिपोर्ट्स आईं उनके मुताबिक वहां पचास मीटर तक फिश प्लेट्स उखाड़ी गई थीं और मौके पर लगता था कि ट्रैक की कई घंटों से जांच नहीं की गई थी। लेकिन हमारे न्यूज चैनल्स ममता बनर्जी के बयान को ही ले उड़े। हर चैनल चिल्ला रहा था नक्सली हमले में 76 मरे, रेलवे पर लाल हमला। बताया गया कि घटनास्थल से नक्सली समर्थक पीसीपीए के पोस्टर मिले हैं जिसमें इस घटना की जिम्मेदारी ली गई है। लेकिन किसी भी समाचार वाचक ने यह रहस्य खोलने की जहमत नहीं उठाई कि पीसीपीए नक्सलवादी नहीं है, उसे सिर्फ नक्सलियों की हिमायत हासिल है। पीसीपीए मुखिया छत्रधर महतो बाकायदा तृणमूल कांग्रेस का पदाधिकारी था और पिछले विधानसभा चुनाव में पीसीपीए ने तृणमूल कांग्रेस को समर्थन दिया था। इस लिहाज से अगर यह पीसीपीए का काम है तब तो इसके लिए ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ही ज्यादा जिम्मेदार है। वैसे भी तृणमूल जब तब बंगाल में रेलवे ट्रैक पर हमला करती रहती है और फिश प्लेट्स उखाड़ने में उसे महारत हासिल है।
वैसे भी अभी तक की घटनाओं में जब भी नक्सलियों ने रेलवे को कोई नुकसान पहुंचाया है तो तत्काल नजदीक के केबिन और रेलवे स्टेषन को सूचना पहुंचाई है ताकि कोई दुर्घटना न हो। सवाल यह है कि क्या हमारा मीडिया सकलडीहा का ठीकरा नक्सलियों के सिर फोड़कर ममता बनर्जी को निर्दोष साबित करना चाहता है? क्या यह सही नहीं है कि मृतकों में से पचास से भी अधिक ने दुर्धटना के 48 घंटे बाद सरकारी अव्यवस्था के चलते दम तोड़ा है? क्या यह भी सही नहीं है कि राहत ट्रेन दुर्घटनास्थल पर दो धंटे बाद और क्रेन आठ घंटे बाद पहुंची? क्या यह भी सही नहीं है कि रेलवे के सभी बड़े अफसर दुर्घटना स्थल पर ममता बनर्जी के साथ ही अगले दिन पहुंचे ? क्या इसके लिए भी नक्सली ही जिम्मेदार हैं? कायदे से इस दुर्घटना के लिए ममता बनर्जी को ततकाल त्यागपत्र दे देना चाहिए और प्रधानमंत्री को भी चाहिए कि इस हादसे की जांच में ममता की लापरवाही और साजिष की भी निष्पक्ष जांच करवाएं। एक तरफ ममता का कहना है कि घटना स्थल पर फिश प्लेटें बैल्ड की गई थीं और पेंड्रोल क्लिप या फिश प्लेट उखाड़े जाने का कोई प्रश्न ही नहीं है जबकि हमारे मीडिया के साथी ही मौके से बता रहेे हैं कि फिश प्लेटें उखड़ी हुई थीं। फिश प्लेटें उखड़ना रेलवें के लिए कोई नई बात नहीं है। एक अखबार ने खुलासा किया है कि देश की राजधानी दिल्ली से बीस किलोमीटर दूर गाजियाबाद के रास्ते के ट्रैक पर वर्ष 2010 में ही पांच हजार फिश प्लेटें उखड़ी पाई गई हैं। इतना ही नहीं उखड़ी हुई फिश प्लेटों के ऊपर से राजधानी एक्सप्रेस गुजर जाने की भी खबरें पिछले दिनों आई थीं। जाहिर है दिल्ली में अभी नक्सली नहीं पहुंचे हैं ममता आपा!!
लगातार तीन दिन तक हमारे समाचारपत्रों ने सरडीहा की दुर्घटना पर तो दस बीस लाइनें ही लिखी होंगी लेकिन नक्सलियों पर कई कई पन्ने काले किए। हमारे बड़े पत्रकारों ने अपनी लेखनी का सारा कला कौशल नक्सलियो पर ही खर्च कर दिया। किसी ने लिखा- ‘नक्सलियों ने फिर ढाया कहर’, तो किसी ने लिख डाला- ‘ भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनते जा रहे नक्सलियों ने पं. बंगाल में ट्रेन को निशाना बनाकर 76 मुसाफिरों को मार डाला’। गोया भूख गरीबी अषिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे अब भारत के लिए चुनौती रहे ही नहीं बस नक्सली ही रह गए हैं।
वह तो गनीमत है कि कुछ दिन पहले ही एयर इंडिया का विमान मंगलौर में दुर्घटनाग्रस्त हुआ। कहीं इत्तेफाक से यह दंतेवाड़ा या मिदनापुर में दुर्घटनाग्रस्त हुआ होता तो हमारे मीडिया के धुरंधर इसका इलजाम भी नक्सलियों के सिर रखते। तमाषा यह है कि पूरे मीडिया ने नक्सलियों को दोष मढ़ने में तो कोई देरी नहीं की लेकिन भाकपा माओवादी के मयूरभंज-पूर्वी सिंहभूम बाॅर्डर एरियेा कमेटी के प्रवक्ता मंगल सिंह के इस बयान कि ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस के विस्फोट में भाकपा माओवादी का हाथ नहीं हैं ऐसी घटनाओं से आम आदमी के साथ साथ माओवादी संगठन को भी नुकसान होता है ऐसी स्थिति में उनका संगठन ऐसी घटना को क्यों अंजाम देगा, को एक दो अखबारों ने ही कहीं कोने में लगाया। मीडिया के शोर में मंगल सिंह की यह आवाज कि ‘हम आम आदमी के हित में उनके अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष करते हैं न कि उन्हें नुकसान पहुंचाने के लिए?’ दबकर रह गई।
सरडीहा दुर्घटना की एफआईआर में नक्सलवादियों का जिक्र न होने पर स्यापा करने वाले हमारे बड़े पत्रकार साथी क्या अपनी असली जिम्मेदारी पर भी ध्यान देंगे????
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वेबसाइट संचालक अमलेन्दु उपाध्याय 30 वर्ष से अधिक अनुभव वाले वरिष्ठ पत्रकार और जाने माने राजनैतिक विश्लेषक हैं। वह पर्यावरण, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, युवा, खेल, कानून, स्वास्थ्य, समसामयिकी, राजनीति इत्यादि पर लिखते रहे हैं।
शनिवार, 8 मई 2010
फायदे से ज्यादा होगा नुकसान
फायदे से ज्यादा होगा नुकसान
अमलेंदु उपाध्याय
वर्श 2011 में होने वाली जनगणना के लिए जाति को भी आधार बनाए जाने के सवाल पर प्रमुख विपक्षी दल और सत्तारूढ़ दल उलझे हुए हैं। जहां जाति को आधार बनाए जाने की मांग करने वालों के अपने तर्क हैं तो वहीं इसकी खिलाफत करने वालों के भी अपने तर्क हैं लेकिन मजेदार बात यह है कि जाति के आधार पर जनगणना की मांग करने वाले लोग उन डाॅ. राम मनोहर लोहिया के षिश्य और वारिस होने का दावा करते हैं जिन डाॅ लोहिया ने ‘जाति तोड़ो - दाम बांधो’ का नारा दिया था।
हालांकि अगर जनगणना में जाति को भी एक आधार बना लिया जाएगा तो तैयारियों के लिहाज से कोई पहाड़ नहीं टूट पड़ेगा। लेकिन खुद सरकार के बड़े लोग इस मसले पर आपस में उलझे हुए लगते हैं। बताया जाता है कि कैबिनेट की बैठक में ही मंत्रीगण आपस में इस मसले पर बुरी तरह उलझ गए। जबकि भारतीय जनता पार्टी को इस बहाने आरएसएस का एजेंडा सदन में लागू करने और देषभक्ति के प्रमाणपत्र बांटने का अच्छा मौका हाथ लग गया। लेकिन इससे असल मुद्दा पीछे छूट गया।
वैसे समाजवादी धड़े से नाइत्तेफाकियों के बावजूद उनके तर्क में कुछ असर भी है। मसलन जब जनगणना में बहुत सी बेवजह बातों को भी पूछा जाता है तो जाति पूछने में हर्ज ही क्या है? एक समाजवादी नेता ने व्यक्तिगत बातचीत में कहा कि ‘कांग्रेस को इसमें परेषानी क्या है? यही कि पिछड़े तबके के लोगों को अपनी वस्तुस्थिति मालूम पड़ जाएगी और वह राजनीति और नौकरियों में अपनी ज्यादा हिस्सेदारी मांगेंगे?’ तर्क है जानदार। क्योंकि जाति की गणना होने पर नुकसान सवर्णाें को हो सकता है और देष भर में यह मांग उठ सकती है कि जब इनकी आबादी कम है तो यह नौकरियों में ज्यादा क्यों हैं,? यही कारण है कि कांग्रेस और भाजपा दोनों अन्दरूनी तौर पर जाति की गणना कराए जाने के खिलाफ हैं क्योंकि दोनों ही दलों का नेतृत्व सवर्ण है और जो पिछड़ा और दलित नेतृत्व उनके यहां है भी तो वह केवल षो पीस है, निर्णय ले सकने की स्थिति में नहीं है।
हां जाति आधारित जनगणना का एक लाभ जरूर मिल सकता है। अभी हर जाति अपनी तादाद अपने हिसाब से बताती है और नौकरियों और राजनीति में हिस्सेदारी मांगती है। तब इस रंगदारी में थोड़ा फर्क पड़ेगा और यह बात साबित हो जाएगी कि पिछड़े तबके की जातियों के लोग 52 प्रतिषत हैं भी या नहीं।
लेकिन अगर निहित राजनीतिक स्वार्थों को छोड़कर बात की जाए तो जाति आधारित जनगणना के बहुत से दूरगामी दुश्परिणाम होंगे। पहली बात तो भारतीय समाज वैसे ही धोर जातिवादी है और हर जाति खुद को दूसरे से श्रेश्ठ साबित करने पर जुटी रहती है। ऐसी जनगणना से जाति के बंधन और मजबूत होंगे। जिस जाति प्रथा को तोड़ने और समाज में समरसता लाने की हवाई बातें बार बार की जाती हैं तब तो वह हवाई बातें भी होना बन्द हो जाएंगी। फिर हिन्दुओं में ही लगभग चार हजार जातियां हैं। इसके बाद हर जाति में किरोणीमल बैंसला और किरोड़ी लाल मीणा पैदा हो जाएंगे जो देष को चैन से नहीं बैठने देंगे। अभी तो बिहार में दलितों में महादलित और पिछड़ों में अति पिछड़े ही छांटे जा रहे हैं, तब हर जाति खुद को महादलित और लुप्तप्राय प्रजाति साबित करते हुए अधिक संरक्षण की मांग करेगी। जिसका दुश्परिणाम यह होगा कि देष का विकास और आर्थिक उन्नति की बातें पीछे छूट जाएंगी और जातिगत समीकरणों के लिहाज से ही महत्वपूर्ण फैसले होने लगेंगे।
इसका जो सबसे बड़ा खतरा है वह यह है कि राश्ट्रीय भावना का एकदम लोप हो जाएगा और राजनेता राश्ट्रहित की बातें न सोचकर जातिहित की ही बातें करने लगेंगेे। ऐसा स्वतंत्रता संग्राम के आन्दोलन के दौरान हो भी चुका है। इतिहास साक्षी है कि डाॅ भीमराव अम्बेडकर ने अंगेजों से कहा था कि वह देष छोड़कर तब तक न जाएं जब तक कि दलितों को हिन्दुओं के षोशण से मुक्ति न मिल जाए। और इस बहाने अंग्रेज इस देष में चैथाई सदी तक ज्यादा रुके रहे। जिसका खमियाजा हमने देष विभाजन के रूप में भी देखा और देष को जबर्दस्त नुकसान उठाने पड़े। अगर समाजवादी धड़ा इस बात की गारंटी दे कि इस तरह का कोई दुरूपयोग इस जनगणना का नहीं होगा तो जाति आधारित जनगणना भी कराई जा सकती है अन्यथा इसका फायदा तो बहुत कम होगा और देष को नुकसान बहुत बड़ा होगा ।
इस बहाने अंग्रेज इस देश में चौथाई सदी तक ज्यादा रूके रहे, जिसका खमियाजा हमने देश विभाजन के रूप में भी देखा और देश को जबरदस्त नुकसान उठाने पड़े। अगर समाजवादी धड़ा इस बात की गारंटी दे कि इस तरह का कोई दुरूपयोग इस जनगणना का नहीं होगा, तो जाति आधारित जनगणना भी कराई जा सकती है, अन्यथा इसका फायदा तो बहुत कम होगा। देश को नुकसान बहुत बड़ा होगा।
अमलेंदु उपाध्याय
वर्श 2011 में होने वाली जनगणना के लिए जाति को भी आधार बनाए जाने के सवाल पर प्रमुख विपक्षी दल और सत्तारूढ़ दल उलझे हुए हैं। जहां जाति को आधार बनाए जाने की मांग करने वालों के अपने तर्क हैं तो वहीं इसकी खिलाफत करने वालों के भी अपने तर्क हैं लेकिन मजेदार बात यह है कि जाति के आधार पर जनगणना की मांग करने वाले लोग उन डाॅ. राम मनोहर लोहिया के षिश्य और वारिस होने का दावा करते हैं जिन डाॅ लोहिया ने ‘जाति तोड़ो - दाम बांधो’ का नारा दिया था।
हालांकि अगर जनगणना में जाति को भी एक आधार बना लिया जाएगा तो तैयारियों के लिहाज से कोई पहाड़ नहीं टूट पड़ेगा। लेकिन खुद सरकार के बड़े लोग इस मसले पर आपस में उलझे हुए लगते हैं। बताया जाता है कि कैबिनेट की बैठक में ही मंत्रीगण आपस में इस मसले पर बुरी तरह उलझ गए। जबकि भारतीय जनता पार्टी को इस बहाने आरएसएस का एजेंडा सदन में लागू करने और देषभक्ति के प्रमाणपत्र बांटने का अच्छा मौका हाथ लग गया। लेकिन इससे असल मुद्दा पीछे छूट गया।
वैसे समाजवादी धड़े से नाइत्तेफाकियों के बावजूद उनके तर्क में कुछ असर भी है। मसलन जब जनगणना में बहुत सी बेवजह बातों को भी पूछा जाता है तो जाति पूछने में हर्ज ही क्या है? एक समाजवादी नेता ने व्यक्तिगत बातचीत में कहा कि ‘कांग्रेस को इसमें परेषानी क्या है? यही कि पिछड़े तबके के लोगों को अपनी वस्तुस्थिति मालूम पड़ जाएगी और वह राजनीति और नौकरियों में अपनी ज्यादा हिस्सेदारी मांगेंगे?’ तर्क है जानदार। क्योंकि जाति की गणना होने पर नुकसान सवर्णाें को हो सकता है और देष भर में यह मांग उठ सकती है कि जब इनकी आबादी कम है तो यह नौकरियों में ज्यादा क्यों हैं,? यही कारण है कि कांग्रेस और भाजपा दोनों अन्दरूनी तौर पर जाति की गणना कराए जाने के खिलाफ हैं क्योंकि दोनों ही दलों का नेतृत्व सवर्ण है और जो पिछड़ा और दलित नेतृत्व उनके यहां है भी तो वह केवल षो पीस है, निर्णय ले सकने की स्थिति में नहीं है।
हां जाति आधारित जनगणना का एक लाभ जरूर मिल सकता है। अभी हर जाति अपनी तादाद अपने हिसाब से बताती है और नौकरियों और राजनीति में हिस्सेदारी मांगती है। तब इस रंगदारी में थोड़ा फर्क पड़ेगा और यह बात साबित हो जाएगी कि पिछड़े तबके की जातियों के लोग 52 प्रतिषत हैं भी या नहीं।
लेकिन अगर निहित राजनीतिक स्वार्थों को छोड़कर बात की जाए तो जाति आधारित जनगणना के बहुत से दूरगामी दुश्परिणाम होंगे। पहली बात तो भारतीय समाज वैसे ही धोर जातिवादी है और हर जाति खुद को दूसरे से श्रेश्ठ साबित करने पर जुटी रहती है। ऐसी जनगणना से जाति के बंधन और मजबूत होंगे। जिस जाति प्रथा को तोड़ने और समाज में समरसता लाने की हवाई बातें बार बार की जाती हैं तब तो वह हवाई बातें भी होना बन्द हो जाएंगी। फिर हिन्दुओं में ही लगभग चार हजार जातियां हैं। इसके बाद हर जाति में किरोणीमल बैंसला और किरोड़ी लाल मीणा पैदा हो जाएंगे जो देष को चैन से नहीं बैठने देंगे। अभी तो बिहार में दलितों में महादलित और पिछड़ों में अति पिछड़े ही छांटे जा रहे हैं, तब हर जाति खुद को महादलित और लुप्तप्राय प्रजाति साबित करते हुए अधिक संरक्षण की मांग करेगी। जिसका दुश्परिणाम यह होगा कि देष का विकास और आर्थिक उन्नति की बातें पीछे छूट जाएंगी और जातिगत समीकरणों के लिहाज से ही महत्वपूर्ण फैसले होने लगेंगे।
इसका जो सबसे बड़ा खतरा है वह यह है कि राश्ट्रीय भावना का एकदम लोप हो जाएगा और राजनेता राश्ट्रहित की बातें न सोचकर जातिहित की ही बातें करने लगेंगेे। ऐसा स्वतंत्रता संग्राम के आन्दोलन के दौरान हो भी चुका है। इतिहास साक्षी है कि डाॅ भीमराव अम्बेडकर ने अंगेजों से कहा था कि वह देष छोड़कर तब तक न जाएं जब तक कि दलितों को हिन्दुओं के षोशण से मुक्ति न मिल जाए। और इस बहाने अंग्रेज इस देष में चैथाई सदी तक ज्यादा रुके रहे। जिसका खमियाजा हमने देष विभाजन के रूप में भी देखा और देष को जबर्दस्त नुकसान उठाने पड़े। अगर समाजवादी धड़ा इस बात की गारंटी दे कि इस तरह का कोई दुरूपयोग इस जनगणना का नहीं होगा तो जाति आधारित जनगणना भी कराई जा सकती है अन्यथा इसका फायदा तो बहुत कम होगा और देष को नुकसान बहुत बड़ा होगा ।
इस बहाने अंग्रेज इस देश में चौथाई सदी तक ज्यादा रूके रहे, जिसका खमियाजा हमने देश विभाजन के रूप में भी देखा और देश को जबरदस्त नुकसान उठाने पड़े। अगर समाजवादी धड़ा इस बात की गारंटी दे कि इस तरह का कोई दुरूपयोग इस जनगणना का नहीं होगा, तो जाति आधारित जनगणना भी कराई जा सकती है, अन्यथा इसका फायदा तो बहुत कम होगा। देश को नुकसान बहुत बड़ा होगा।
वेबसाइट संचालक अमलेन्दु उपाध्याय 30 वर्ष से अधिक अनुभव वाले वरिष्ठ पत्रकार और जाने माने राजनैतिक विश्लेषक हैं। वह पर्यावरण, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, युवा, खेल, कानून, स्वास्थ्य, समसामयिकी, राजनीति इत्यादि पर लिखते रहे हैं।
बुधवार, 5 मई 2010
सड़क पर दुष्मन संसद में यार
सड़क पर दुष्मन संसद में यार
अमलेन्दु उपाध्याय
अकसर कहा जाता है कि राजनीति में दो ओर दो चार नहीं होते हैं और राजनीति में जो दिखता है वह होता नहीं हैं और जो होता है वह दिखता नहीं है। इन कहावतों को एक बार फिर मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव और मायावती ने विपक्ष के कटौती प्रस्ताव पर कांग्रेस का दामन थाम कर सही साबित कर दिया है। अभी कुल जमा चार दिन भी तो नहीं बीते हैं जब डॉ. अम्बेडकर के जन्म दिवस पर कार्यक्रम को लेकर कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी में उत्तर प्रदेष में जमकर युद्ध हुआ था और कांग्रेस के इतिहास की पुस्तक में डॉ. अम्बेडकर का जिक्र न होने और अम्बेडकर जयंती के कांग्रेसी पोस्टर पर अम्बेडकर का चित्र न होने पर बसपा ने कांग्रेस पर हमला बोला था।
उधर मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी और लालू प्रसाद यादव का कुनबा राश्ट्रीय जनता दल, न केवल महिला आरक्षण बिल पर किसी भी हद तक कांग्रेस के खिलाफ जाने पर आमादा थे बल्कि 27 अप्रैल को ही वामपंथी दलों द्वारा आहूत भारत बन्द में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे थे, वही सपा और राजद भी ठीक उसी दिन 27 अर्पैल को लोकसभा के अन्दर कांग्रेस के तारणहार बन बैठे। यानी सड़क पर कांग्रेस के विरोध में और सदन में कांग्रेस के एजेन्ट। इससे भी ज्यादा आष्चर्य इस बात पर है कि मायावती और मुलायम सिंह की रंजिष किसी से छिपी नहीं है। दोनों एक म्यान में दो तलवार की तरह साथ नहीं रह सकते। लेकिन मनमोहन सिंह की सरकार बचाने के लिए दोनों को एक प्लेटफार्म पर आने से भी कोई एतराज नहीं रहा। माया मुलायम का ऐसा प्रेम भाव किसी समीकरण की वजह से नहीं है। बल्कि इसके पीछे दोनों के अपने अपने भय हैं और इस कदम के पीछे सबसे बड़ा कारक सीबीआई है।
याद होगा आईपीएल धोटाले की गूंज जब जोर षोर से हो रही थी ठीक उसी समय मायावती ने एक बहुत ही मार्मिक बयान दिया था कि सबको छोड़कर सीबीआई उनके पीछे ही पड़ी है। ठीक है कि मायावती ने आर्थिक गड़बड़ियां की हैं, लेकिन यूपीए सरकार के जो छह मंत्री आईपीएल घोटाले की जद में आ रहे थे उन पर सरकार की खामोषी न केवल मायावती के आरोपों को सही साबित करती है बल्कि कटौती प्रस्ताव पर लोकसभा में कांग्रेस के समर्थन के असल कारण को भी बिन बोले बयां कर देती है।
इसी तरह याद होगा लोकसभा चुनाव के समय कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह का मायावती को धमकाने वाला बयान कि कांग्रेस के पास सीबीआई है काफी चर्चा में रहा था और उसके बाद देखने में आया कि जब जब मायावती ने कांग्रेस से पंगा लेने की या उसके षिकंजे से निकलने की जुर्रत करने की हिमाकत की सीबीआई का डंडा मायावती पर चलने लगा।
लालू प्रसाद यादव तो खैर हमेषा से सीबीआई के निषाने पर रहे हैं और कभी अपनों तो कभी गैरों के द्वारा सीबीआई से प्रताड़ित होते रहे हैं। जाहिर है कि जब लोकसभा में उनकी ताकत कम हो गई है औॅर कुछ महीनों बाद ही बिहार में विधानसभा का चुनाव होना है, ऐसे में भला क्यों लालू प्रसाद यादव कांग्रेस से पंगा लेकर अपने और अपने परिजनों के लिए मुसीबत खड़ा करना चाहेंगे? कुछ दिन पहले ही वह झारखण्ड में कांग्रेस का सीबीआई का तुरुप का पत्ता मधु कोड़ा पर चलते हुए देख ही चुके हैं।
लालू और माया जैसी ही कुछ मजबूरियां मुलायम सिंह की भी हैं। अपने अन्तःकरण से तो मुलायम सिंह कांग्रेस से दो हाथ करना भी चाहते हैं लेकिन सीबीआई का खौफ उन्हें भी पीछे धकेल देता है। मुलायम और उनके परिजनों के खिलाफ एक कांग्रेसी नेता विष्वनाथ चतुर्वेदी उर्फ मोहन की एक षिकायत पर आय से अधिक संपत्ति का मामला सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है। मजेदार बात यह है कि सीबीआई ने ही उन पर मुकदमा चलाने की अनुमति मांगी थी लेकिन यूपीए पार्ट वन सरकार बचाने के लिए जिस तत्परता से मुलायम सिंह आगे आए उसका इनाम देते हुए वही सीबीआई कहने लगी कि अब मुकदमा चलाने की आवष्यकता नहीं है। इतना ही नहीं बल्कि बताया तो जाता है कि षिकायतकर्ता कांग्रेसी नेता विष्वनाथ चतुर्वेदी उर्फ मोहन उस दिन के बाद से अदालत ही नहीं पहुंचे हैं। अब अगर मुलायम सिंह कटौती प्रस्ताव पर कांग्रेस के खिलाफ मत दे देते तो सीबीआई को अदालत में यह कहने कि मुकदमा चलाने की जरूरत है और मोहन को अदालत में उपस्थित होने में कितना समय लगता, यह मुलायम सिंह अच्छी तरह जानते हैं। मुलायम सिंह पर ऐसे दबाव हैं। इसका पता उनके पुराने सखा रहे अमर सिंह की एक धमकी से चलता है। अभी कुछ दिन पहले अमर सिंह ने बयान दिया था कि यदि मुलायम के सिपहसालारों ने उनके (अमर) ऊपर हमले बन्द नहीं किए तो वह आय से अधिक संपत्ति के मामले में स्वयं अदालत पहुंचकर जांच मेें सहयोग करेंगे। देखने में आया कि इस बयान के बाद अमर सिंह के खिलाफ सपा नेताओं ने बोलना बन्द कर दिया। इसका मतलब है कि सीबीआई का कुछ न कुछ मामला है जरूर।
ल्ेाकिन उत्तर प्रदेष की जंग में इस घटनाक्रम का सबसे ज्यादा फायदा मुलायम सिंह को पहुंचा और केन्द्र में मनमोहन सरकार बचा ले जाने के बावजूद यूपी में सर्वाधिक नुकसान कांग्रेस को हुआ। लोकसभा चुनाव से ऐन पहले मुलायम सिंह की कुछ बड़ी गल्तियों का साीधा लाभ कांग्रेस को पहुंचा था और वह यूपी में एक बड़ी ताकत बनकर उभरी थी। उसके बाद प्रदेष कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोषी के मायावती के खिलाफ आग उगलते बयान ने कांग्रेस का ग्राफ काफी ऊंचा उठा दिया था जिसका नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस प्रत्याषी राज बब्बर फिरोजाबाद के उपचुनाव में मुलायम की पुत्रवधु को हराकर जीत गए। मायावती से रोज रोज की तू-तू, मैं-मैं से कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में एक जोष आ गया था और राहुल बाबा के दलितों के धर जाकर भोजन करने की नौटंकी भी कुछ कमाल करती दिख रही थी और कांग्रेस का मिषन 2012 भी कुछ सफल होता दिख रहा था। लेकिन मनमोहन सरकार बचाने के लिए की गई कांग्रेसी जुगलबन्दी ने यूपी में कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की कमर तोड़ कर रख दी। उन्हें लग रहा है कि सड़क पर तो कांग्रेसी नेतृत्व कार्यकताओं को मायावती की पुलिस की लाठियों से पिटवा रहा है और खुद दिल्ली में बैठकर मायावती की चिरौरी कर रहा हेै
कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की इसी उधेड़बुन का सर्वाधिक फायदा मुलायम सिंह को हुआ है। मायावती और कांग्रेस की तकरार से समाजवादी पार्टी बैकफुट पर जाने लगी थी और मायावती के विरोध के लोग कांग्रेस के साथ गोलबन्द होने लगे थे। लेकिन अब इस तबके का तेजी से कांग्रेस से मोहभंग होने लगा है और उसे लगने लगा है कि मायावती से लड़ाई तो मुलायम सिंह ही लड़ सकते हैं। इधर सपा ने भी 27 अप्रैल को भले ही भारत बन्द का नारा महंगाई और कांग्रेस के विरोध में दिया हो लेकिन सड़कों पर जिस तरह उसके कार्यकर्ता उतरे उन्होंने टारगेट कांग्रेस को कम और मायावती और राज्य सरकार को ही ज्यादा बनाया। नतीजतन बैकफुट पर जा रही सपा एक बार फिर फ्रन्टफुट पर आ गई और कांग्रेस अपने किए पर पछताने के लिए नेपथ्य में चली गई। भले ही कांग्रेसी इस बात पर खुष हो रहे हों कि उन्होंने विपक्ष के दांव को विफल करते हुए मनमोहन सिंह की सरकार बचा ली लेकिन यूपी की जंग में कांग्रेस ने जो खोया है उसकी भरपााई आने वाले बीस सालों में भी मुष्किल है। कांग्रेस ने यूपी में न केवल अपने कार्यकर्ताओं के अरमानों का गला धोटा है बल्कि रीता जोषी और दिग्विजय सिंह की मेहनत पर भी पानी फेर दिया है। अब राहुल बाबा चाहे कलावती के धर जाएं या जलवर्शा के उन्हें कुछ हासिल होने वाला नहीं है।
अमलेन्दु उपाध्याय
अकसर कहा जाता है कि राजनीति में दो ओर दो चार नहीं होते हैं और राजनीति में जो दिखता है वह होता नहीं हैं और जो होता है वह दिखता नहीं है। इन कहावतों को एक बार फिर मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव और मायावती ने विपक्ष के कटौती प्रस्ताव पर कांग्रेस का दामन थाम कर सही साबित कर दिया है। अभी कुल जमा चार दिन भी तो नहीं बीते हैं जब डॉ. अम्बेडकर के जन्म दिवस पर कार्यक्रम को लेकर कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी में उत्तर प्रदेष में जमकर युद्ध हुआ था और कांग्रेस के इतिहास की पुस्तक में डॉ. अम्बेडकर का जिक्र न होने और अम्बेडकर जयंती के कांग्रेसी पोस्टर पर अम्बेडकर का चित्र न होने पर बसपा ने कांग्रेस पर हमला बोला था।
उधर मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी और लालू प्रसाद यादव का कुनबा राश्ट्रीय जनता दल, न केवल महिला आरक्षण बिल पर किसी भी हद तक कांग्रेस के खिलाफ जाने पर आमादा थे बल्कि 27 अप्रैल को ही वामपंथी दलों द्वारा आहूत भारत बन्द में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे थे, वही सपा और राजद भी ठीक उसी दिन 27 अर्पैल को लोकसभा के अन्दर कांग्रेस के तारणहार बन बैठे। यानी सड़क पर कांग्रेस के विरोध में और सदन में कांग्रेस के एजेन्ट। इससे भी ज्यादा आष्चर्य इस बात पर है कि मायावती और मुलायम सिंह की रंजिष किसी से छिपी नहीं है। दोनों एक म्यान में दो तलवार की तरह साथ नहीं रह सकते। लेकिन मनमोहन सिंह की सरकार बचाने के लिए दोनों को एक प्लेटफार्म पर आने से भी कोई एतराज नहीं रहा। माया मुलायम का ऐसा प्रेम भाव किसी समीकरण की वजह से नहीं है। बल्कि इसके पीछे दोनों के अपने अपने भय हैं और इस कदम के पीछे सबसे बड़ा कारक सीबीआई है।
याद होगा आईपीएल धोटाले की गूंज जब जोर षोर से हो रही थी ठीक उसी समय मायावती ने एक बहुत ही मार्मिक बयान दिया था कि सबको छोड़कर सीबीआई उनके पीछे ही पड़ी है। ठीक है कि मायावती ने आर्थिक गड़बड़ियां की हैं, लेकिन यूपीए सरकार के जो छह मंत्री आईपीएल घोटाले की जद में आ रहे थे उन पर सरकार की खामोषी न केवल मायावती के आरोपों को सही साबित करती है बल्कि कटौती प्रस्ताव पर लोकसभा में कांग्रेस के समर्थन के असल कारण को भी बिन बोले बयां कर देती है।
इसी तरह याद होगा लोकसभा चुनाव के समय कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह का मायावती को धमकाने वाला बयान कि कांग्रेस के पास सीबीआई है काफी चर्चा में रहा था और उसके बाद देखने में आया कि जब जब मायावती ने कांग्रेस से पंगा लेने की या उसके षिकंजे से निकलने की जुर्रत करने की हिमाकत की सीबीआई का डंडा मायावती पर चलने लगा।
लालू प्रसाद यादव तो खैर हमेषा से सीबीआई के निषाने पर रहे हैं और कभी अपनों तो कभी गैरों के द्वारा सीबीआई से प्रताड़ित होते रहे हैं। जाहिर है कि जब लोकसभा में उनकी ताकत कम हो गई है औॅर कुछ महीनों बाद ही बिहार में विधानसभा का चुनाव होना है, ऐसे में भला क्यों लालू प्रसाद यादव कांग्रेस से पंगा लेकर अपने और अपने परिजनों के लिए मुसीबत खड़ा करना चाहेंगे? कुछ दिन पहले ही वह झारखण्ड में कांग्रेस का सीबीआई का तुरुप का पत्ता मधु कोड़ा पर चलते हुए देख ही चुके हैं।
लालू और माया जैसी ही कुछ मजबूरियां मुलायम सिंह की भी हैं। अपने अन्तःकरण से तो मुलायम सिंह कांग्रेस से दो हाथ करना भी चाहते हैं लेकिन सीबीआई का खौफ उन्हें भी पीछे धकेल देता है। मुलायम और उनके परिजनों के खिलाफ एक कांग्रेसी नेता विष्वनाथ चतुर्वेदी उर्फ मोहन की एक षिकायत पर आय से अधिक संपत्ति का मामला सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है। मजेदार बात यह है कि सीबीआई ने ही उन पर मुकदमा चलाने की अनुमति मांगी थी लेकिन यूपीए पार्ट वन सरकार बचाने के लिए जिस तत्परता से मुलायम सिंह आगे आए उसका इनाम देते हुए वही सीबीआई कहने लगी कि अब मुकदमा चलाने की आवष्यकता नहीं है। इतना ही नहीं बल्कि बताया तो जाता है कि षिकायतकर्ता कांग्रेसी नेता विष्वनाथ चतुर्वेदी उर्फ मोहन उस दिन के बाद से अदालत ही नहीं पहुंचे हैं। अब अगर मुलायम सिंह कटौती प्रस्ताव पर कांग्रेस के खिलाफ मत दे देते तो सीबीआई को अदालत में यह कहने कि मुकदमा चलाने की जरूरत है और मोहन को अदालत में उपस्थित होने में कितना समय लगता, यह मुलायम सिंह अच्छी तरह जानते हैं। मुलायम सिंह पर ऐसे दबाव हैं। इसका पता उनके पुराने सखा रहे अमर सिंह की एक धमकी से चलता है। अभी कुछ दिन पहले अमर सिंह ने बयान दिया था कि यदि मुलायम के सिपहसालारों ने उनके (अमर) ऊपर हमले बन्द नहीं किए तो वह आय से अधिक संपत्ति के मामले में स्वयं अदालत पहुंचकर जांच मेें सहयोग करेंगे। देखने में आया कि इस बयान के बाद अमर सिंह के खिलाफ सपा नेताओं ने बोलना बन्द कर दिया। इसका मतलब है कि सीबीआई का कुछ न कुछ मामला है जरूर।
ल्ेाकिन उत्तर प्रदेष की जंग में इस घटनाक्रम का सबसे ज्यादा फायदा मुलायम सिंह को पहुंचा और केन्द्र में मनमोहन सरकार बचा ले जाने के बावजूद यूपी में सर्वाधिक नुकसान कांग्रेस को हुआ। लोकसभा चुनाव से ऐन पहले मुलायम सिंह की कुछ बड़ी गल्तियों का साीधा लाभ कांग्रेस को पहुंचा था और वह यूपी में एक बड़ी ताकत बनकर उभरी थी। उसके बाद प्रदेष कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोषी के मायावती के खिलाफ आग उगलते बयान ने कांग्रेस का ग्राफ काफी ऊंचा उठा दिया था जिसका नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस प्रत्याषी राज बब्बर फिरोजाबाद के उपचुनाव में मुलायम की पुत्रवधु को हराकर जीत गए। मायावती से रोज रोज की तू-तू, मैं-मैं से कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में एक जोष आ गया था और राहुल बाबा के दलितों के धर जाकर भोजन करने की नौटंकी भी कुछ कमाल करती दिख रही थी और कांग्रेस का मिषन 2012 भी कुछ सफल होता दिख रहा था। लेकिन मनमोहन सरकार बचाने के लिए की गई कांग्रेसी जुगलबन्दी ने यूपी में कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की कमर तोड़ कर रख दी। उन्हें लग रहा है कि सड़क पर तो कांग्रेसी नेतृत्व कार्यकताओं को मायावती की पुलिस की लाठियों से पिटवा रहा है और खुद दिल्ली में बैठकर मायावती की चिरौरी कर रहा हेै
कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की इसी उधेड़बुन का सर्वाधिक फायदा मुलायम सिंह को हुआ है। मायावती और कांग्रेस की तकरार से समाजवादी पार्टी बैकफुट पर जाने लगी थी और मायावती के विरोध के लोग कांग्रेस के साथ गोलबन्द होने लगे थे। लेकिन अब इस तबके का तेजी से कांग्रेस से मोहभंग होने लगा है और उसे लगने लगा है कि मायावती से लड़ाई तो मुलायम सिंह ही लड़ सकते हैं। इधर सपा ने भी 27 अप्रैल को भले ही भारत बन्द का नारा महंगाई और कांग्रेस के विरोध में दिया हो लेकिन सड़कों पर जिस तरह उसके कार्यकर्ता उतरे उन्होंने टारगेट कांग्रेस को कम और मायावती और राज्य सरकार को ही ज्यादा बनाया। नतीजतन बैकफुट पर जा रही सपा एक बार फिर फ्रन्टफुट पर आ गई और कांग्रेस अपने किए पर पछताने के लिए नेपथ्य में चली गई। भले ही कांग्रेसी इस बात पर खुष हो रहे हों कि उन्होंने विपक्ष के दांव को विफल करते हुए मनमोहन सिंह की सरकार बचा ली लेकिन यूपी की जंग में कांग्रेस ने जो खोया है उसकी भरपााई आने वाले बीस सालों में भी मुष्किल है। कांग्रेस ने यूपी में न केवल अपने कार्यकर्ताओं के अरमानों का गला धोटा है बल्कि रीता जोषी और दिग्विजय सिंह की मेहनत पर भी पानी फेर दिया है। अब राहुल बाबा चाहे कलावती के धर जाएं या जलवर्शा के उन्हें कुछ हासिल होने वाला नहीं है।
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मुलायम सिंह यादव,
राजनीति,
लालू प्रसाद यादव
वेबसाइट संचालक अमलेन्दु उपाध्याय 30 वर्ष से अधिक अनुभव वाले वरिष्ठ पत्रकार और जाने माने राजनैतिक विश्लेषक हैं। वह पर्यावरण, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, युवा, खेल, कानून, स्वास्थ्य, समसामयिकी, राजनीति इत्यादि पर लिखते रहे हैं।
शनिवार, 17 अप्रैल 2010
दंतेवाड़ा का अपराधी कौन
दंतेवाड़ा का अपराधी कौन
अमलेन्दु उपाध्याय
छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में नक्सलियों के हमले में सीआरपीएफ के 76 जवानों के मारे जाने के बाद देष भर में गम और गुस्से का माहौल है। देष के असफल गृह मंत्री और कॉरपोरेट जगत के अच्छे वकील पी चिदंबरम भी काफी गुस्से में बताए जाते हैं। यहां तक कि चिदंबरम अपने इस्तीफे की भी पेषकष कर चुके हैं। लेकिन, जैसा कि तय था, प्रधानमंत्री ने उनका इस्तीफा नामंजूर कर दिया है और उन्हें खून की होली खेलने की मौन स्वीकृति दे दी है।
जाहिर है एक सभ्य समाज में ऐसे नृषंस हमले की इजाजत किसी भी आधार पर नहीं दी जा सकती है। लेकिन इस हमले की पृश्ठभूमि और उसके मूल कारण पर भी सम्यक विचार की जरूरत है। कई रक्षा विषेशज्ञ और पुलिस के बड़े अफसरों समेत प्रधानमंत्री और यहां तक कि लोकतंत्र के तथाकथित चौथे स्तंभ मीडिया के कई बड़े पत्रकार भी नक्सलवाद को देष के लिए सबसे गंभीर चुनौती बता चुके हैं। इसके बावजूद सर्वाधिक गंभीर चुनौती से निपटने के लिए सरकार के पास कोई कारगर योजना नहीं है बल्कि सरकार गृह मंत्री के नेतृत्व में स्वयं खून की होली खेल रही है।
अब आवाजें उठ रही हैं कि नक्सलियों के खिलाफ वायुसेना को उतारा जाया जाना चाहिए। इस तर्क के समर्थन में बहुत निर्लज्जता के साथ देष के कई बड़े पत्रकार और राजनेता उतर आए हैं। पुलिस के रिटायर्ड अफसर तो खैर हैं ही चिदंबरम के समर्थन में। पूर्व डीजीपी प्रकाष सिंह का कहना है- ‘छत्तीसगढ़ में नक्सलियों ने जिस प्रकार से जवानों का खून बहाया है वह देष के लिए गंभीर चुनौती है। ऐसी चुनौती जिसका जवाब उन्हीं की भाशा में देना होगा’। लेकिन सवाल यह है कि क्या हवाई हमले से नक्सलवाद खत्म हो जाएगा? अगर इस बात की गारंटी दी जाए तो क्या बुराई है? नक्सलवाद के इतिहास पर नजर डालें तो यह बात सामने आती है कि अतीत में जितनी बार भी दमन और हत्याओं और फर्जी एन्काउन्टरों की झड़ी लगाई गई, नक्सलवाद उतनी ही तेजी से फैला क्योंकि हमारी सरकारों की नीयत नहीं बदली। जिस कदम के लिए चिदंबरम की पीठ थपथपाई जा रही है वैसा कदम तो सिद्धार्थ षंकर रे बहुत पहले ही उठा चुके हैं, लेकिन नतीजा क्या निकला? यही कि बंगाल के एक गांव से षुरू हुआ आंदोलन आज पन्द्रह राज्यों में फैल गया। अब जब चिदंबरम दो तीन साल में नक्सलवाद के सफाए की बात कर रहे हैं तो तय मानिए कि इन दो तीन सालों में ही पूरा देष नक्सलवाद की गिरत में होगा, बस दुआ कीजिए चिदंबरम सही सलामत देष के गृह मंत्री बने रहें।
फिर हम यह स्वीकार करने के लिए तैयार क्यों नहीं हैं कि नक्सली हिंसा हमारी 60 सालों की राजनीतिक और प्रषासनिक असफलता का नतीजा है। आजादी के बाद विकास का जो पूंजीवादी रास्ता अपनाया गया उसकी परिणिति यह होनी ही थी। यहां यह भी याद रखना चाहिए कि नक्सलवादी आंदोलन जम्मू-कष्मीर, पंजाब और पूर्वोत्तर के राज्यों की तरह या ‘हिन्दू राश्ट्र’ की तरह अलगाववादी आंदोलन नहीं है। लेकिन देष के बाहरी षत्रु इस फिराक में जरूर बैठे हैं कि कब नक्सलियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई हो और फिर सारी दुनिया को बताया जाए कि भारत में गृह युद्ध छिड़ गया है। ऐसी स्थिति बनने के लिए केवल और केवल एक षख्स जिम्मेदार होगा जिसका नाम पी चिदंबरम है और जो दुर्भाग्य से इस समय देष का गृह मंत्री है। फिर नक्सलवादी अलगाववादी नहीं हैं उन्होंने अलग मुल्क बनाने की बात नहीं की है। वह व्यवस्था बदलने की बात करते हैं, संविधान बदलने की बात करते हैं। संविधान बदलने की बात तो राश्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भी करता है, नक्सलियों ने कोई बाबरी मस्जिद नहीं गिराई है।
हालांकि चिदंबरम ने बहुत सधे हुए पत्ते फेंके थे। मसलन ऑपरेषन ग्रीन हंट प्रारंभ करने से पहले अखबारों और प्रचार माध्यमों के जरिए नक्सलियों के खिलाफ मिथ्या प्रचार की न केवल संघी और गोयबिल्स नीति अपनाई गई बल्कि नीचता की पराकाश्ठा पार करते हुए एक विज्ञापन जारी किया गया जिसमें कहा गया -”पहले माओवादियों ने खुषहाल जीवन का वायदा किया/ फिर, वे पति को अगवा कर ले गये/ फिर, उन्होंने गांव के स्कूल को उड़ा डाला/ अब, वे मेरी 14 साल की लड़की को ले जाना चाहते हैं।/ रोको, रोको भगवान के लिए इस अत्याचार को रोको“।
यह विज्ञापन गृह मंत्रालय द्वारा जनहित में जारी किया गया जिसके मुखिया चिदंबरम हैं। जाहिर है उनकी सहमति से ही यह जारी हुआ। लेकिन प्रष्न यह है कि इसमें उस महिला का नाम क्यों नहीं खोला गया जिसकी 14 साल की लड़की को नक्सली ले जाना चाहते हैं? क्या चिदंबरम साहब बताने का कश्ट करेंगे कि नक्सली किसकी लड़की को ले जाना चाहते हैं। इसके तुरंत बाद गृह मंत्री गली के षोहदों की स्टाइल में कह रहे थे कि नक्सलियों को दौड़ा दौड़ा कर मारेंगे। एक तरफ वह नक्सलियों को मारने की बात कह रहे थे तो दूसरी तरफ ‘ऑपरेषन ग्रीन हंट’ जैसे किसी ऑपरेषन के जारी होने को नकार भी रहे थे। जबकि ठीक उसी समय छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री ननकीराम कंवर बयान दे रहे थे कि ऑपरेषन ग्रीन हंट के दौरान 25 मार्च तक 90 माओवादी छत्तीसगढ़ में मारे गए हैं। जब चिदंबरम की सेना आदिवासियों को मारने जाएगी तो क्या वे फूल माला लेकर स्वागत करेंगे? जाहिर है वे वही करेंगे जो उन्होंने दंतेवाड़ा में किया। फिर किस आधार पर इस कांड के लिए अब नक्सली ही जिम्मेदार हैं? क्या दंतेवाड़ा के लिए वह षख्स जिम्मेदार नहीं है जो एक दिन पहले ही पं बंगाल में कह रहा था कि नक्सली कायर हैं सामने क्यो नहीं आते? अब जब वे सामने आ गए तो चिदंबरम रोते क्यों हैं? और अब यह बात सामने भी आ गई है कि चिदंबरम की कारगुजारियों की खुद कांग्रेस के अंदर जबर्दस्त मुखालिफत हो रही है।
इस घटना के तुरंत बाद चिदंबरम ने बयान दिया कि -‘ये माओवादी हेैं जिन्होंने राज्य को ‘दुष्मन’ और संघर्श को ‘युद्ध’ का नाम दिया है। हमने इस षब्द का कभी इस्तेमाल नहीं किया । ऐसे लोगों ने राज्य पर युद्ध थोपा है जिनके पास हथियार रखने और मारने का कानूनी अधिकार नहीं है।’ क्या कहना चाहते हैं हमारे गृह मंत्री? यही कि राज्य के पास हथियार रखने और निरीह आदिवासियों को मारने का कानूनी अधिकार है?
ताज्जुब यह है कि दुर्गा वाहिनी, बजरंग दल जैसे खूंखार कबीले बनाने वाला और दषहरे के रोज षस्त्र पूजन करने वाले उस आरएसएस ने भी जिसके पूर्वजों ने 15 अगस्त 1947 को बेमिसाल गद्दारी का दिन कहा था , दंतेवाड़ा कांड को भारत के लोकतांत्रिक सत्ता प्रतिश्ठान को माओवाद, नक्सलवाद की खुली चुनौती और माओवादियों को नृषंस हत्यारा बताया है।
दंतेवाड़ा कांड पर गुस्से का इजहार करने वाले यह सवाल क्यों नहीं पूछते कि सीआरपीएफ के यह जवान घटना स्थल के पास क्या करने गए थे जबकि वह स्थान ऑपरेषन के लिए चिन्हित नहीं था। अखबारों में आई रिपोर्ट्स बताती हैं कि गृह मंत्रालय के अधिकारी स्वयं इस बात पर हैरान हैं कि जब हमले वाला इलाका कार्रवाई के लिए चिन्हित केंद्रीत जगहों में नहीं था तो इतनी संख्या में जवान जंगल के अंदर तक क्यों गए? इतना ही नहीं दंतेवाड़ा पर लानत मलानत करने वाले मीडिया ने एक दिन पहले ही यह खबर क्यों नहीं दी कि जवान इस घटना से पहले आदिवासियों की एक बस्ती में गए थे और नक्सलियों की सर्च के नाम पर उन्होंने 26 महिलाओं के साथ बदसुलूकी की थी और एक महिला का हाथ भी तोड़ दिया था। यह खबर सिर्फ एक समाचार एजेंसी के द्वारा तब जारी की गई जब नक्सलियों ने दंतेवाड़ा को अंजाम दे दिया। जरा सवाल देष पर मर मिटने वाले सरकारी षहीदों के साथियों से भी पूछ लिया जाना चाहिए कि घटनास्थल से कुल चार किलोमीटर दूरी पर ही सीआरपीएफ का कैंप था लेकिन घटनास्थल पर कोई सहायता इस कैंप से क्यों नहीं पहुंचाई गई?
जब तक नक्सलवाद की असल वजह पर ध्यान नहीं दिया जाएगा, जल-जंगल-जमीन का सही बंटवारा नहीं होगा और बड़े पूंजीपतियों के दलाल हमारे भ्रश्ट राजनेता जब तक यह सच्चाई स्वीकार नहीं कर लेते कि नक्सलवाद कानून व्यवस्था की समस्या नहीं है बल्कि राजनीतिक समस्या है तब तक चिदंबरम मार्का खून खराबे से कुछ हासिल नहीं होने वाला। एक वाकया इस बात को समझाने के लिए काफी है कि पष्चिम बंगाल के षालबनी में जिंदल स्टील पांच हजार करोड़ रूपये की लागत से इस्पात संयंत्र लगा रही है और माओवादी यहां जिंदल के चार कर्मचारियों को मार चुके हैं। लेकिन जिंदल का एक पाइप निर्माण संयंत्र दिल्ली के नजदीक गाजियाबाद में कई वर्शों से बंद पड़ा है वहां मजदूरों की छंटनी की जा चुकी है और कई एकड़ में फैले संयंत्र में प्लॉटिंग करने की जिंदल योजना बना रहा है। सवाल यह है कि जिंदल गाजियाबाद के संयंत्र को चालू न करके बंगाल में नया संयंत्र क्यो लगा रहा है? अगर इस सवाल का जवाब ईमानदारी से दे दिया जाए तो नक्सलवाद को समझने में बहुत मदद मिलेगी।
सारे प्रकरण के दौरान स्वयं को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ घोशित करने वाले उस मीडिया का रोल, (जिसके लिए दंतेवाड़ा से ज्यादा महत्वपूर्ण सानिया और षोएब की षादी और आईपीएल है) बहुत ही घातक और चिदंबरम के एजेंट का रहा। थोड़े दिन पहले ही चिदंबरम को लौह पुरूश सरदार वल्लभ भाई पटेल का अवतार घोशित करने वाले एक पत्रकार के संपादकत्व में चलने वाले एक चैनल के रायपुर से रिपोर्टर ने फतवा जारी कर दिया कि अब सुरक्षा बलों को पूरी छूट दे देनी चाहिए। तो चाट पकौड़ी के ठेलों पर खड़े होकर इंडिया का जायका बताने वाले एक समाचार वाचक ( उन्हें पत्रकार कहते हुए षर्म आती है) ने भी ऐसी घोशणा कर डाली। जबकि एक बड़े पत्रकार जिन्होंने टाईम्स समूह की नौकरी इसलिए छोड़ दी थी कि वहां ब्रांड मैनेजर संपादकीय में दखलंदाजी करते हैं, लिखा- ‘माओवादी भारत के लोकतंत्र को नकली लोकतंत्र या दिखावटी लोकतंत्र मानते हैं और कहते हैं कि जैसे माओत्से तुंग ने बंदूक के बल पर चीन में सत्ता पर कब्जा किया, वैसे ही भारत में भी जरूरी है। आज जब नक्सलवादी बाकायदा सेना बनाकर हमारे अर्द्धसैनिक बलों के निषना बना रहे हैं, प्रष्न और सारे मुद्दे गौण हो गए हैं। माओवादियों ने बड़ा हमला करके युद्ध का बिगुल बजाया है, उन्हें कड़ा जवाब देना जरूरी हैं’। यानी अब यह मुद्दा रहा ही नहीं कि चिदंबरम कभी उन खनिज कंपनियों के वकील रहे हैं जिनके हितों की रक्षा के लिए ऑपरेषन ग्रीन हंट चलाया जा रहा है? वह आगे लिखते हैं- ”हममें से अनेक सिर्फ आधार पर कि ये माओवादी आदिवासियों के हमदर्द हैं, इनकी सषस्त्र संघर्श की भूमिका से सहमत न होते हुए भी इनसे सहानुभूति रखते आए है। क्योंकि यह दावा किया जा रहा था कि ये उन आदिवासियों के लिए काम करते हैं जो बार बार विस्थापित होते रहे हैं। जो लगातार षोशण का षिकार हैं। हम यह मानते आए हैं कि अगर आदिवासी इलाकों का विकास हो जाए, उनकी अपने इलाके के संसाधनों के बंटवारे पर आवाज सुनी जाने लगे तो नक्सलवाद या माओवाद की समस्या का हल निकल आए लेकिन हम गलत थे और यह गलती हमें स्वीकार करनी चाहिए।’ कितनी ईमानदारी के साथ इन्होंने अपनी गलती स्वीकार कर ली है। इसी तरह एक खुफिया अफसर की तरह पटना से एक पत्रकार ने रिपोर्ट दी- ‘नक्सली संगठन अब नेपाल के रास्ते चीन से हथियार मंगाने लगे हैं। नेपाल के माओवादियों से बिहार के नक्सली संगठनों का गठजोड़ हो गया है।’
यह गृह मंत्री का कमाल है कि गृह सचिव जीके पिल्लई की हैसियत लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता अरूंधती राय को धोखेबाज करार देने की हो गई है। एक अंग्रेजी दैनिक से बात में उन्होंने कहा कि राय ने संसदीय लोकतंत्र की उस गरिमा को ठेस पहुचाई है जो उन्हें स्वतंत्र रूप से मनमाफिक राय जाहिर करने की छूट देती है।
कभी नक्सली आंदोलन के बड़े कमांडर रहे असीम चटर्जी ने हाल ही में कहीं कहा था कि-‘ भारत में संसदीय प्रणाली है। इतिहास साक्षी है जिन जगहों पर संसदीय प्रणाली है वहां कभी भी क्रांतिकारी आंदोलन सफल नहीं रहा।’ असीम दा के विचारों से इत्तेफाक रखते हुए भी एक सवाल यहां छोड़ा जा रहा है कि जहां सूरत मुबई अहमदाबाद की सड़कों पर कांच की बोतलों पर लड़कियां नंगी करके नचाई जाती हों और उनसे सामूहिक बलात्कार की वीडियो रिकॉर्डिंग की जाती हो, जहां गुलबर्ग सोसाइटी, नरोदा पाटिया और बेस्ट बेकरी कांड के हत्यारे षासक हों, जहां बेलछी, लक्ष्मणपुर बाथे आबाद हों, जहां 1984 के सिखों के कातिल अभी तक छुट्टा घूम रहे हो, जहां मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने के बाद डेढ़ लाख किसान आत्महत्या कर चुके हों, जिस मुल्क की लगभग चालीस फीसदी आबादी गरीबी की रेखा से नीचे रह रही हो, क्या यही लोकतंत्र है? अगर यही लोकतंत्र है जिसकी रक्षा करने का दावा किया जा रहा है तो ऐसे लोकतंत्र को जितना जल्दी हो सके आग के हवाले कर देना चाहिए।
अमलेन्दु उपाध्याय
छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में नक्सलियों के हमले में सीआरपीएफ के 76 जवानों के मारे जाने के बाद देष भर में गम और गुस्से का माहौल है। देष के असफल गृह मंत्री और कॉरपोरेट जगत के अच्छे वकील पी चिदंबरम भी काफी गुस्से में बताए जाते हैं। यहां तक कि चिदंबरम अपने इस्तीफे की भी पेषकष कर चुके हैं। लेकिन, जैसा कि तय था, प्रधानमंत्री ने उनका इस्तीफा नामंजूर कर दिया है और उन्हें खून की होली खेलने की मौन स्वीकृति दे दी है।
जाहिर है एक सभ्य समाज में ऐसे नृषंस हमले की इजाजत किसी भी आधार पर नहीं दी जा सकती है। लेकिन इस हमले की पृश्ठभूमि और उसके मूल कारण पर भी सम्यक विचार की जरूरत है। कई रक्षा विषेशज्ञ और पुलिस के बड़े अफसरों समेत प्रधानमंत्री और यहां तक कि लोकतंत्र के तथाकथित चौथे स्तंभ मीडिया के कई बड़े पत्रकार भी नक्सलवाद को देष के लिए सबसे गंभीर चुनौती बता चुके हैं। इसके बावजूद सर्वाधिक गंभीर चुनौती से निपटने के लिए सरकार के पास कोई कारगर योजना नहीं है बल्कि सरकार गृह मंत्री के नेतृत्व में स्वयं खून की होली खेल रही है।
अब आवाजें उठ रही हैं कि नक्सलियों के खिलाफ वायुसेना को उतारा जाया जाना चाहिए। इस तर्क के समर्थन में बहुत निर्लज्जता के साथ देष के कई बड़े पत्रकार और राजनेता उतर आए हैं। पुलिस के रिटायर्ड अफसर तो खैर हैं ही चिदंबरम के समर्थन में। पूर्व डीजीपी प्रकाष सिंह का कहना है- ‘छत्तीसगढ़ में नक्सलियों ने जिस प्रकार से जवानों का खून बहाया है वह देष के लिए गंभीर चुनौती है। ऐसी चुनौती जिसका जवाब उन्हीं की भाशा में देना होगा’। लेकिन सवाल यह है कि क्या हवाई हमले से नक्सलवाद खत्म हो जाएगा? अगर इस बात की गारंटी दी जाए तो क्या बुराई है? नक्सलवाद के इतिहास पर नजर डालें तो यह बात सामने आती है कि अतीत में जितनी बार भी दमन और हत्याओं और फर्जी एन्काउन्टरों की झड़ी लगाई गई, नक्सलवाद उतनी ही तेजी से फैला क्योंकि हमारी सरकारों की नीयत नहीं बदली। जिस कदम के लिए चिदंबरम की पीठ थपथपाई जा रही है वैसा कदम तो सिद्धार्थ षंकर रे बहुत पहले ही उठा चुके हैं, लेकिन नतीजा क्या निकला? यही कि बंगाल के एक गांव से षुरू हुआ आंदोलन आज पन्द्रह राज्यों में फैल गया। अब जब चिदंबरम दो तीन साल में नक्सलवाद के सफाए की बात कर रहे हैं तो तय मानिए कि इन दो तीन सालों में ही पूरा देष नक्सलवाद की गिरत में होगा, बस दुआ कीजिए चिदंबरम सही सलामत देष के गृह मंत्री बने रहें।
फिर हम यह स्वीकार करने के लिए तैयार क्यों नहीं हैं कि नक्सली हिंसा हमारी 60 सालों की राजनीतिक और प्रषासनिक असफलता का नतीजा है। आजादी के बाद विकास का जो पूंजीवादी रास्ता अपनाया गया उसकी परिणिति यह होनी ही थी। यहां यह भी याद रखना चाहिए कि नक्सलवादी आंदोलन जम्मू-कष्मीर, पंजाब और पूर्वोत्तर के राज्यों की तरह या ‘हिन्दू राश्ट्र’ की तरह अलगाववादी आंदोलन नहीं है। लेकिन देष के बाहरी षत्रु इस फिराक में जरूर बैठे हैं कि कब नक्सलियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई हो और फिर सारी दुनिया को बताया जाए कि भारत में गृह युद्ध छिड़ गया है। ऐसी स्थिति बनने के लिए केवल और केवल एक षख्स जिम्मेदार होगा जिसका नाम पी चिदंबरम है और जो दुर्भाग्य से इस समय देष का गृह मंत्री है। फिर नक्सलवादी अलगाववादी नहीं हैं उन्होंने अलग मुल्क बनाने की बात नहीं की है। वह व्यवस्था बदलने की बात करते हैं, संविधान बदलने की बात करते हैं। संविधान बदलने की बात तो राश्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भी करता है, नक्सलियों ने कोई बाबरी मस्जिद नहीं गिराई है।
हालांकि चिदंबरम ने बहुत सधे हुए पत्ते फेंके थे। मसलन ऑपरेषन ग्रीन हंट प्रारंभ करने से पहले अखबारों और प्रचार माध्यमों के जरिए नक्सलियों के खिलाफ मिथ्या प्रचार की न केवल संघी और गोयबिल्स नीति अपनाई गई बल्कि नीचता की पराकाश्ठा पार करते हुए एक विज्ञापन जारी किया गया जिसमें कहा गया -”पहले माओवादियों ने खुषहाल जीवन का वायदा किया/ फिर, वे पति को अगवा कर ले गये/ फिर, उन्होंने गांव के स्कूल को उड़ा डाला/ अब, वे मेरी 14 साल की लड़की को ले जाना चाहते हैं।/ रोको, रोको भगवान के लिए इस अत्याचार को रोको“।
यह विज्ञापन गृह मंत्रालय द्वारा जनहित में जारी किया गया जिसके मुखिया चिदंबरम हैं। जाहिर है उनकी सहमति से ही यह जारी हुआ। लेकिन प्रष्न यह है कि इसमें उस महिला का नाम क्यों नहीं खोला गया जिसकी 14 साल की लड़की को नक्सली ले जाना चाहते हैं? क्या चिदंबरम साहब बताने का कश्ट करेंगे कि नक्सली किसकी लड़की को ले जाना चाहते हैं। इसके तुरंत बाद गृह मंत्री गली के षोहदों की स्टाइल में कह रहे थे कि नक्सलियों को दौड़ा दौड़ा कर मारेंगे। एक तरफ वह नक्सलियों को मारने की बात कह रहे थे तो दूसरी तरफ ‘ऑपरेषन ग्रीन हंट’ जैसे किसी ऑपरेषन के जारी होने को नकार भी रहे थे। जबकि ठीक उसी समय छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री ननकीराम कंवर बयान दे रहे थे कि ऑपरेषन ग्रीन हंट के दौरान 25 मार्च तक 90 माओवादी छत्तीसगढ़ में मारे गए हैं। जब चिदंबरम की सेना आदिवासियों को मारने जाएगी तो क्या वे फूल माला लेकर स्वागत करेंगे? जाहिर है वे वही करेंगे जो उन्होंने दंतेवाड़ा में किया। फिर किस आधार पर इस कांड के लिए अब नक्सली ही जिम्मेदार हैं? क्या दंतेवाड़ा के लिए वह षख्स जिम्मेदार नहीं है जो एक दिन पहले ही पं बंगाल में कह रहा था कि नक्सली कायर हैं सामने क्यो नहीं आते? अब जब वे सामने आ गए तो चिदंबरम रोते क्यों हैं? और अब यह बात सामने भी आ गई है कि चिदंबरम की कारगुजारियों की खुद कांग्रेस के अंदर जबर्दस्त मुखालिफत हो रही है।
इस घटना के तुरंत बाद चिदंबरम ने बयान दिया कि -‘ये माओवादी हेैं जिन्होंने राज्य को ‘दुष्मन’ और संघर्श को ‘युद्ध’ का नाम दिया है। हमने इस षब्द का कभी इस्तेमाल नहीं किया । ऐसे लोगों ने राज्य पर युद्ध थोपा है जिनके पास हथियार रखने और मारने का कानूनी अधिकार नहीं है।’ क्या कहना चाहते हैं हमारे गृह मंत्री? यही कि राज्य के पास हथियार रखने और निरीह आदिवासियों को मारने का कानूनी अधिकार है?
ताज्जुब यह है कि दुर्गा वाहिनी, बजरंग दल जैसे खूंखार कबीले बनाने वाला और दषहरे के रोज षस्त्र पूजन करने वाले उस आरएसएस ने भी जिसके पूर्वजों ने 15 अगस्त 1947 को बेमिसाल गद्दारी का दिन कहा था , दंतेवाड़ा कांड को भारत के लोकतांत्रिक सत्ता प्रतिश्ठान को माओवाद, नक्सलवाद की खुली चुनौती और माओवादियों को नृषंस हत्यारा बताया है।
दंतेवाड़ा कांड पर गुस्से का इजहार करने वाले यह सवाल क्यों नहीं पूछते कि सीआरपीएफ के यह जवान घटना स्थल के पास क्या करने गए थे जबकि वह स्थान ऑपरेषन के लिए चिन्हित नहीं था। अखबारों में आई रिपोर्ट्स बताती हैं कि गृह मंत्रालय के अधिकारी स्वयं इस बात पर हैरान हैं कि जब हमले वाला इलाका कार्रवाई के लिए चिन्हित केंद्रीत जगहों में नहीं था तो इतनी संख्या में जवान जंगल के अंदर तक क्यों गए? इतना ही नहीं दंतेवाड़ा पर लानत मलानत करने वाले मीडिया ने एक दिन पहले ही यह खबर क्यों नहीं दी कि जवान इस घटना से पहले आदिवासियों की एक बस्ती में गए थे और नक्सलियों की सर्च के नाम पर उन्होंने 26 महिलाओं के साथ बदसुलूकी की थी और एक महिला का हाथ भी तोड़ दिया था। यह खबर सिर्फ एक समाचार एजेंसी के द्वारा तब जारी की गई जब नक्सलियों ने दंतेवाड़ा को अंजाम दे दिया। जरा सवाल देष पर मर मिटने वाले सरकारी षहीदों के साथियों से भी पूछ लिया जाना चाहिए कि घटनास्थल से कुल चार किलोमीटर दूरी पर ही सीआरपीएफ का कैंप था लेकिन घटनास्थल पर कोई सहायता इस कैंप से क्यों नहीं पहुंचाई गई?
जब तक नक्सलवाद की असल वजह पर ध्यान नहीं दिया जाएगा, जल-जंगल-जमीन का सही बंटवारा नहीं होगा और बड़े पूंजीपतियों के दलाल हमारे भ्रश्ट राजनेता जब तक यह सच्चाई स्वीकार नहीं कर लेते कि नक्सलवाद कानून व्यवस्था की समस्या नहीं है बल्कि राजनीतिक समस्या है तब तक चिदंबरम मार्का खून खराबे से कुछ हासिल नहीं होने वाला। एक वाकया इस बात को समझाने के लिए काफी है कि पष्चिम बंगाल के षालबनी में जिंदल स्टील पांच हजार करोड़ रूपये की लागत से इस्पात संयंत्र लगा रही है और माओवादी यहां जिंदल के चार कर्मचारियों को मार चुके हैं। लेकिन जिंदल का एक पाइप निर्माण संयंत्र दिल्ली के नजदीक गाजियाबाद में कई वर्शों से बंद पड़ा है वहां मजदूरों की छंटनी की जा चुकी है और कई एकड़ में फैले संयंत्र में प्लॉटिंग करने की जिंदल योजना बना रहा है। सवाल यह है कि जिंदल गाजियाबाद के संयंत्र को चालू न करके बंगाल में नया संयंत्र क्यो लगा रहा है? अगर इस सवाल का जवाब ईमानदारी से दे दिया जाए तो नक्सलवाद को समझने में बहुत मदद मिलेगी।
सारे प्रकरण के दौरान स्वयं को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ घोशित करने वाले उस मीडिया का रोल, (जिसके लिए दंतेवाड़ा से ज्यादा महत्वपूर्ण सानिया और षोएब की षादी और आईपीएल है) बहुत ही घातक और चिदंबरम के एजेंट का रहा। थोड़े दिन पहले ही चिदंबरम को लौह पुरूश सरदार वल्लभ भाई पटेल का अवतार घोशित करने वाले एक पत्रकार के संपादकत्व में चलने वाले एक चैनल के रायपुर से रिपोर्टर ने फतवा जारी कर दिया कि अब सुरक्षा बलों को पूरी छूट दे देनी चाहिए। तो चाट पकौड़ी के ठेलों पर खड़े होकर इंडिया का जायका बताने वाले एक समाचार वाचक ( उन्हें पत्रकार कहते हुए षर्म आती है) ने भी ऐसी घोशणा कर डाली। जबकि एक बड़े पत्रकार जिन्होंने टाईम्स समूह की नौकरी इसलिए छोड़ दी थी कि वहां ब्रांड मैनेजर संपादकीय में दखलंदाजी करते हैं, लिखा- ‘माओवादी भारत के लोकतंत्र को नकली लोकतंत्र या दिखावटी लोकतंत्र मानते हैं और कहते हैं कि जैसे माओत्से तुंग ने बंदूक के बल पर चीन में सत्ता पर कब्जा किया, वैसे ही भारत में भी जरूरी है। आज जब नक्सलवादी बाकायदा सेना बनाकर हमारे अर्द्धसैनिक बलों के निषना बना रहे हैं, प्रष्न और सारे मुद्दे गौण हो गए हैं। माओवादियों ने बड़ा हमला करके युद्ध का बिगुल बजाया है, उन्हें कड़ा जवाब देना जरूरी हैं’। यानी अब यह मुद्दा रहा ही नहीं कि चिदंबरम कभी उन खनिज कंपनियों के वकील रहे हैं जिनके हितों की रक्षा के लिए ऑपरेषन ग्रीन हंट चलाया जा रहा है? वह आगे लिखते हैं- ”हममें से अनेक सिर्फ आधार पर कि ये माओवादी आदिवासियों के हमदर्द हैं, इनकी सषस्त्र संघर्श की भूमिका से सहमत न होते हुए भी इनसे सहानुभूति रखते आए है। क्योंकि यह दावा किया जा रहा था कि ये उन आदिवासियों के लिए काम करते हैं जो बार बार विस्थापित होते रहे हैं। जो लगातार षोशण का षिकार हैं। हम यह मानते आए हैं कि अगर आदिवासी इलाकों का विकास हो जाए, उनकी अपने इलाके के संसाधनों के बंटवारे पर आवाज सुनी जाने लगे तो नक्सलवाद या माओवाद की समस्या का हल निकल आए लेकिन हम गलत थे और यह गलती हमें स्वीकार करनी चाहिए।’ कितनी ईमानदारी के साथ इन्होंने अपनी गलती स्वीकार कर ली है। इसी तरह एक खुफिया अफसर की तरह पटना से एक पत्रकार ने रिपोर्ट दी- ‘नक्सली संगठन अब नेपाल के रास्ते चीन से हथियार मंगाने लगे हैं। नेपाल के माओवादियों से बिहार के नक्सली संगठनों का गठजोड़ हो गया है।’
यह गृह मंत्री का कमाल है कि गृह सचिव जीके पिल्लई की हैसियत लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता अरूंधती राय को धोखेबाज करार देने की हो गई है। एक अंग्रेजी दैनिक से बात में उन्होंने कहा कि राय ने संसदीय लोकतंत्र की उस गरिमा को ठेस पहुचाई है जो उन्हें स्वतंत्र रूप से मनमाफिक राय जाहिर करने की छूट देती है।
कभी नक्सली आंदोलन के बड़े कमांडर रहे असीम चटर्जी ने हाल ही में कहीं कहा था कि-‘ भारत में संसदीय प्रणाली है। इतिहास साक्षी है जिन जगहों पर संसदीय प्रणाली है वहां कभी भी क्रांतिकारी आंदोलन सफल नहीं रहा।’ असीम दा के विचारों से इत्तेफाक रखते हुए भी एक सवाल यहां छोड़ा जा रहा है कि जहां सूरत मुबई अहमदाबाद की सड़कों पर कांच की बोतलों पर लड़कियां नंगी करके नचाई जाती हों और उनसे सामूहिक बलात्कार की वीडियो रिकॉर्डिंग की जाती हो, जहां गुलबर्ग सोसाइटी, नरोदा पाटिया और बेस्ट बेकरी कांड के हत्यारे षासक हों, जहां बेलछी, लक्ष्मणपुर बाथे आबाद हों, जहां 1984 के सिखों के कातिल अभी तक छुट्टा घूम रहे हो, जहां मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने के बाद डेढ़ लाख किसान आत्महत्या कर चुके हों, जिस मुल्क की लगभग चालीस फीसदी आबादी गरीबी की रेखा से नीचे रह रही हो, क्या यही लोकतंत्र है? अगर यही लोकतंत्र है जिसकी रक्षा करने का दावा किया जा रहा है तो ऐसे लोकतंत्र को जितना जल्दी हो सके आग के हवाले कर देना चाहिए।
वेबसाइट संचालक अमलेन्दु उपाध्याय 30 वर्ष से अधिक अनुभव वाले वरिष्ठ पत्रकार और जाने माने राजनैतिक विश्लेषक हैं। वह पर्यावरण, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, युवा, खेल, कानून, स्वास्थ्य, समसामयिकी, राजनीति इत्यादि पर लिखते रहे हैं।
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