सोमवार, 31 दिसंबर 2012
इस भ्रष्ट व्यवस्था के चलते किसी सामाजिक न्याय की उम्मीद की जा सकती है ?
कथित दलित अथवा बहुजन स्वामी नेताओं और उनकी तलछनों का लक्ष्य अपनी भुखमरी दूर करके जनता को बेवकूफ बनाने में अधिक है, ये ताक़तें अपने आधार के साथ भारत के सबसे बडे प्रदेश में हकूमतें भी चला चुकी है और देश उनके तमाम कथित चमत्कारों से भलिभांति परिचित भी है। इनका सीमित चिंतन बुनियादी रूप से समाज के इस क्रांतिकारी तबके के गले में नौकरियों का सरकारी पट्टा डालता है बल्कि खतरनाक रूप से दुनिया के दूसरे देशों में चल रही क्रांतिकारी तहरीकों से भी जबरन दूर रखता है। उन्हें जनता के उन आन्दोलनों से अनभिज्ञ रखता है जहाँ दमित पीड़ित समाज ने अपनी तकदीरे स्वयं बदली हैं।
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दामिनी गैंग रेप प्रसंग और बहुजनस्वामियों का अट्टहास

बुधवार, 19 दिसंबर 2012
पुलिस का दिखा क्रूर चेहरा तो सोनिया ने घाव पर नमक छिड़का !

बिहार का सृजन : मिथ क्या सत्य क्या

शिव को नहीं भाये प्रभात, पसंद उनकी तो मर

दिन बहुरेंगे डाकघरों के

विश्व भूख सूचकांक में भारत : भूख, कुपोषण से मुक्त कराने के प्रचार की धोखाधड़ी

लो आ गयी बंगाल की दूसरी ममता !!

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012
खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश प्रचार और असलियत

रोजगार की गारंटी में शामिल नहीं है वेतन की गारंटी

क्या काले लोगों का अस्तित्व नहीं ?

…और खत्म हो गया दलितों का सामाजिक बहिष्कार

भूमंडलीकरण के राक्षस को पहचानने में मदद करता है काशीनाथ सिंह का लेखन

सवाल यह है, इन बच्चों को कौन बचायेगा ?

धारा 498-ए अप्राकृतिक व अन्यायपूर्ण!

आखिर मुकेश अम्बानी का इरादा क्या है?

आखिर हरिवंश सिंह जैसों के ठेगें पर क्यों है प्रेस कानून !

सिंधिया ही दे सकते हैं मध्यप्रदेश कांग्रेस को संजीवनी

सुशासन बाबू के कुशासन में उभरा परिवर्तन का एक नया चेहरा

‘दलित संघर्ष को गलत दिशा में ले गई हैं मायावती’ : दारापुरी,

गुरुवार, 13 दिसंबर 2012
समाजवादी आंबेडकर

भारत को भी तैयार करने होंगे अपने ओबामा

अंबेडकर के नाम पर धंधा करने वाले कभी भी जाति का विनाश नहीं होने देगें

जैसी दवा चिकित्सक लिखें , उस पर निर्भर है कैंसर का खर्च, फिर भी सिप्ला के दाम में कटौती से राहत की उम्मीद

निजीकरण की राह पर रेलवे

पीएम की डिनर डिप्लोमेसी मेहनतकशों के मृत्यु भोज (!) का उत्सव

भारत में बस गये 1290 पाकिस्तानी

बुधवार, 12 दिसंबर 2012
इतिहास की पुनरावृत्ति है एफडीआई का आगमन

मंगलवार, 11 दिसंबर 2012
लोकतंत्र चला बाज़ार वाया चुनाव आयोग

करोड़ों लोगों की रोजी रोटी पर लात मारने का पुख्ता इंतजाम

छत्तीसगढ़ को तीन साल में 1870 करोड़ रॉयल्टी

सरकार का चेहरा ज्यादा हिंसक है

मोदी को मनमोहन का अभयदान

सियासत के शामियाने में राज और नीतीश मुस्कुराते हैं

लोकतंत्र का पंचनामा

सोमवार, 10 दिसंबर 2012
क्या अंबेडकर और लोहिया भी कॉर्पोरेट राज का ऐसा ही निर्लज्ज समर्थन करते !

भारतीय समुद्रों की लूट का लाईसेंस

एक ही बार में भ्रष्टाचार और परिवारवाद- दोनों से लड़ने का भरम तोड़ दिया बीजेपी ने

शौकत पर लश्कर का ठप्पा लगाने की फिराक में यूपी एटीएस!

एम डी एम घोटाले की सीबीआई जाँच रिपोर्ट : दो डीएम और दो सीडीओ के नाम भी शामिल!!!

वनाधिकार, भूमि अधिकार व महिला हिंसा के सवाल पर प्रदर्शन करेंगे जनसंगठन

आईटी एक्ट की धारा 66-ए और 79 को प्रासंगिक माना सरकार ने

नौ महीने में केवल दस दंगे : जियो मेरे युवराज

नेता जी सपा समर्थित गुण्डागर्दी आपको प्रधानमंत्री नहीं बनने देगी

हिन्दी पत्रकारिता का प्रभाष काल

दो मौतों पर नतमस्तक पूंजीवादी राजनीतिज्ञ और मीडिया

कैंसर से जूझते हुए शावेज़!!! …शावेज़… शावेज़ यहां से वहां तक…शावेज़

पूंजी का खेल समझना है तो दिनोंदिन अभेद्य होते जा रहे ममताराज का तिलिस्म देखिये !

एस्टर आई केयर के दिल्ली में पहले सेंटर का उद्घाटन

ज्ञानक्रांति का फैसला भी लेंगी क्या दीदी ?

अर्थव्यवस्था की बीमारी का इलाज उस दवा से नहीं होगा जो इस बीमारी की जड़ है

आरोप लगाने के बाद उन आरोपों से कोई वफादारी नहीं रहती केजरीवाल की

हां, भारत हिन्दू राष्ट्र है।

आखिर क्या मिला सूचना के अधिकार अधिनियम से ?

सुशासनी सरकार का कीर्तिमान : मनरेगा में 5 साल- गड़बड़ी की 105 शिकायतें

रविवार, 9 दिसंबर 2012
संगठन की दुहाई देने वाली भाजपा में व्यक्ति हो गए हावी

लूट के इस महाभोज में सबसे ज्यादा किसी का पेट भरा तो वह था मीडिया

भाजपा पर संघ का नियंत्रण

पित्रोदा को बढई,प्रणव को बंगाली और मनमोहन को सरदार बना दिया !

चोर बाजे जोर से

भविष्य के संघर्षों के लिए मार्गदर्शन करेगी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की 21वीं कांग्रेस

कपटपूर्ण रणनीति से निकली पार्टी का नाम भी कपट से भरा है

कलम का ‘सिपाही’ बनने की आपाधापी

इमाम साहब तोप लेने आए थे, छुरी लेकर गए – आजम

जोड़ों के चोट के लिए आर्थोस्कोपी काफी कारगर

माया व बजरंगी को सजा यानि मोदी को मजा

आपातकाल में भी नहीं हुआ ऐसा तो !

सामंत की कचहरी में इंसाफ

चलो प्रधानमंत्री बना जाये

गहलोत समझें तो यह तमाचे से कम नहीं है

दो मौतों पर नतमस्तक पूंजीवादी राजनीतिज्ञ और मीडिया

असली हीरो आप तो फास्ट ट्रेक कोर्ट आमिर के कहने पर क्यों?

प्रेम : हमारे दौर का सबसे बड़ा संदेह

आज का एफडीआई सेकुलर है अगर आठ साल पहले आता तो साम्प्रदायिक होता

पश्चिमी देशों के अभिभावकों को ‘टाइगर मॉम’ की सीख

विचारधारा का संगम कॉफी हाऊस

शनिवार, 8 दिसंबर 2012
Now IITs on PPP mode

संजय जोशी पर साफ दिखा नरेंद्र मोदी का खौफ

आरोप लगाने के बाद उन आरोपों से कोई वफादारी नहीं रहती केजरीवाल की

सड़क पर कोई मासूम घायल न हो

बाबू जगजीवन राम को आदर्श मानते हैं भारत के न्यायप्रिय लोग

ब्राह्मणों की सक्रिय भूमिका थी आंबेडकर के अछूतोद्धार के काम में

जी.डी.पी में सिर्फ १४ फीसदी का योगदान करनेवाले कृषि क्षेत्र की सरकार को कोई खास परवाह नहीं है

आई.सी.यू. की ओर जाती हुई अर्थव्यवस्था

सी ए जी की रिपोर्ट दोबारा पढ़िए सिब्बल साहब!

सॉफ्ट स्टेट का हार्ड मैसेज

‘ऑपरेशन फर्रुखाबाद’ का राजनीति पर असर

ये कैसा है दुर्भाग्य का योग, ममता के हाथों में महिला आयोग

राजनीति अब करिश्मे की उम्मीद किससे करेगी साहेब !

परिवारवाद को सींचने में मुलायम सिंह का बहुमूल्य योगदान

अशोक हॉल में नादिरशाह

डिंपल से सीख लें फेसबुकिया बुद्धिजीवी

अखबारों/चैनलों का वश चलता तो वे सार्वजनिक तौर पर किसी चौराहे पर कसाब को फांसी पर लटका देते

अत्याधुनिक तकनीक और अत्याधुनिक बर्बरता के अस्त्रों से लैस महानायक

A nation betrayed

Gujarat: Who will Muslims vote for?

शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012
बारीक तौर पर चल रही हैं लेखकों को बाँटने की साजि़शें

संगठन के नीचे दबता जा रहा संविधान

हेल्पलाइन तो ठीक पर मुख्यमन्त्री महोदय…….

ये वाम दलों की जीत है

खबर ‘स्टुपिड’ हो सकती है पर निराधार नहीं !

मंगलवार, 4 दिसंबर 2012
अत्याधुनिक तकनीक और अत्याधुनिक बर्बरता के अस्त्रों से लैस महानायक

सोमवार, 3 दिसंबर 2012
कांशीराम की पत्रकारिता
पुस्तक में कांशीराम के 77 संपादकीय लेख संकलित किये गये हैं। पहला लेख ‘समाचार सेवाओं की आवश्यकता’ पर है, जिसमें कांशीराम ने बहुत सही सवाल उठाया है कि जातिवादी हिन्दू प्रेस दलित और शोषित समाज के समाचारों को ब्लैक आउट करता है। वे इस लेख में लिखते हैं कि इसलिये डा. आंबेडकर ने निजी समाचार सेवा के महत्व को समझ कर 1920 में ‘मूकनायक’, 1927 में ‘बहिष्कृत भारत’, 1930 में ‘जनता’ और 1955 में ‘प्रबुद्ध भारत’ नाम से समाचार पत्र निकाले थे। लेख में ‘दि आपे्रस्ड इण्डियन’ पत्रिका की शुरुआत के सम्बन्ध में लिखा है, ‘आवश्यकता और अवसर दोनों से हमें चुनौती स्वीकार करने की पे्ररणा मिली है तथा समाचार सेवा के क्षेत्र में कूदने की तैयारी है।’ वे अन्त में लिखते हैं, अगले दो सालों में देश के कोने-कोने से समाचार सेवा का विस्तार हो जायगा।’
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सोमवार, 26 नवंबर 2012
राजनीतिक वर्चस्ववाद के दांव पर अंबेडकर स्मारक
रंगभेदी व्यवस्था के वर्चस्ववाद को यथावत बनाये रखने और उसे महिमामंडित करने के लिए मूर्तियां और स्मारक बेहद अनिवार्य हैं। व्यक्ति की मूर्ति बनाकर उसकी विचारधारा और उसके मिशन को तिलांजलि देने का श्राद्धकर्म सबसे महान कर्मकांड है, जिसकी जनमानस में अमिट छाप बन जाती है।
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राजनीतिक वर्चस्ववाद के दांव पर अंबेडकर स्मारक
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राजनीतिक वर्चस्ववाद के दांव पर अंबेडकर स्मारक

शनिवार, 24 नवंबर 2012
एनटीपीसी में और विनिवेश को जीओएम की मंजूरी

तो फिर छला गया बुंदेलखंड …….अब हमार का हुई, मुख्यमंत्री धोखा दीन है !

गुरुवार, 22 नवंबर 2012
कसाब नहीं है सरबजीत, जरदारी को बोले जस्टिस काटजू

बुधवार, 21 नवंबर 2012
एक दिन जमीन को लील लेंगे पूंजी के दलाल और सत्ता के काले लोग

कला विधाओं का कोलाज है श्रीनिवास श्रीकान्त का रचनाकार

खन्नात की नरबदिया आर्मो

यूपी को गुजरात नहीं बनने देगी भाकपा

राहुल को जिम्मा देने के अलावा चारा भी क्या था?

मंगलवार, 20 नवंबर 2012
जस्टिस काटजू ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री से पूछा, कहाँ है लोकतन्त्र

गाज़ा पट्टी में इज़राइल के हमले के विरोध में भारत में भी विरोध के स्वर

रविवार, 18 नवंबर 2012
अच्छा बताओ तो गाजापट्टी क्या है ? भेड़ों का बाड़ा या जिन्दा कब्रगाह………….

शनिवार, 17 नवंबर 2012
सती महिमा से खाप सत्ता तक

विश्व भूख सूचकांक में भारत : भूख, कुपोषण से मुक्त कराने के प्रचार की धोखाधड़ी

जेम्स बॉन्ड की राजनीति

शुक्रवार, 16 नवंबर 2012
लोनिया टोला में पकड़े गए दंगाई –एक पहलु ये भी !

जोड़ों के चोट के लिए आर्थोस्कोपी काफी कारगर

स्वार्थप्रेरित होती पाँव छूने की परंपरा

खाप गोत्र के सवाल विज्ञान के आइने में

हेल्पलाइन तो ठीक पर मुख्यमन्त्री महोदय…….

बुधवार, 14 नवंबर 2012
सवाल यह है, इन बच्चों को कौन बचायेगा ?

रविवार, 11 नवंबर 2012
चल झूठे, एसटीएफ का एएसपी झूठ नहीं बोल सकता !

शनिवार, 10 नवंबर 2012
नौ महीने में केवल दस दंगे : जियो मेरे युवराज
ये हालात सिर्फ इसलिये पैदा हो रहे हैं कि अफसरों का इकबाल खत्म हो चुका है। कानून-व्यवस्था के लिए सरकार लम्बा समय नहीं मांग सकती। वास्तविकता यह है कि मुख्यमंत्री अथवा प्रधानमंत्री का तेवर देख कर ही अधिकारियों के काम करने का रवैया बदल जाता है और अगर तेवर दिखाने के लिए भी समय की जरूरत हो, तो इस पर आश्चर्य जरूर होता है।
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नौ महीने में केवल दस दंगे : जियो मेरे युवराज
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नौ महीने में केवल दस दंगे : जियो मेरे युवराज

गुरुवार, 8 नवंबर 2012
राहें चार अभियानों की
"अन्ना के अभियान से लाखों लोग इसलिए नहीं जुड़े कि वे लोकपाल कानून को अपने सभी दुखों की रामबाण दवा समझते थे। वे इसलिए जुड़े थे कि इसमें उन्हें अनंत संभावना दिख रही थी। इस संभावना को अन्ना की टीम ने बंटे दिमाग के कारण भंवर में फंसा दिया है। जो कल तक अन्ना की टीम थी, वह अब अन्ना की प्रतिद्वंद्वी है।"
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राहें चार अभियानों की
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बुधवार, 7 नवंबर 2012
किसानों की जमीनों को छीनने के सवाल पर एकजुट हैं बसपा और सपा

मंगलवार, 6 नवंबर 2012
इरोम की नहीं, लोकतंत्र की हार है यह चुप्पी !

सोमवार, 5 नवंबर 2012
विशेष राज्य का दर्ज़ा बाद में, पहले नवरुणा दिलाओ सुशासन बाबू
बिहार के मुख्यमंत्री सुशासन बाबू जिस समय पटना में अधिकार रैली करके दहाड़ रहे थे ठीक उसी समय मुजफ्फरपुर के छात्र मुजफ्फरपुर से अपहृत ११ वर्षीय नववरूणा का 44 दिन बीतने के बाद भी पता न चलने पर दिल्ली में जंतर मंतर पर धरना देकर बिहार में बढ़ती हत्या, बलात्कार और अपहरण की घटनाओं पर अपनी चिंता व्यक्त करते हुए सरकार से मांग कर रहे थे कि आम बिहारियों कि सुरक्षा सरकार सुनिश्चित करें..................Read Moreon hastakshep.com
विशेष राज्य का दर्ज़ा बाद में, पहले नव वरुणा दिलाओ सुशासन बाबू
विशेष राज्य का दर्ज़ा बाद में, पहले नव वरुणा दिलाओ सुशासन बाबू

भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन के शोर में गुम न हो जाय, इरोम शर्मिला की आवाज
इरोम शर्मिला ने जब भूख हड़ताल की शुरुआत की थी, उस वक्त वे 28 साल की युवा थीं। कुछ लोगों को लगा था कि यह कदम एक युवा द्वारा भावुकता में उठाया गया है। लेकिन समय के साथ इरोम शर्मिला के इस संघर्ष की सच्चाई लोगों के सामने आती गई। जिस अंधियारे के विरुध्द इरोम शर्मिला का संघर्ष है, इसमें उनके साथ कुछ भी हो सकता है। इसलिए जरूरी है कि भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन के शोर में इरोम शर्मिला की आवाज गुम न हो जाय, यह सुनी व समझी जाय तथा इसके पक्ष में जनमत तैयार हो।................................Read More on hastakshep.com
भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन के शोर में गुम न हो जाय, इरोम शर्मिला की आवाज
भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन के शोर में गुम न हो जाय, इरोम शर्मिला की आवाज

हर कोई अयोध्या के धोबी की भूमिका निभाने को आतुर है
क्या भ्रष्टाचार ही हमारे राष्ट्रीय जीवन का एकमात्र मुद्दा बच गया है। अगर ऐसा है तो सार्वजनिक जीवन में शुचिता कायम करने के नाम पर हाल-हाल में जो आंदोलन हुए वे क्यों असफल हो गए।.................................................अरविंद केजरीवाल अपनी राजनीतिक पहचान बनाने के लिए व्यग्र हैं। राबर्ट वाड्रा के बहाने सोनिया गांधी पर हमला करने से उन्हें मीडिया में प्रचार और सस्ती लोकप्रियता मिल सकती है। शायद इसीलिए उन्होंने कानूनी कार्रवाई के बजाय मीडिया ट्रायल का रास्ता चुना।.....................................Read More on hastakshep.com
हर कोई अयोध्या के धोबी की भूमिका निभाने को आतुर है
हर कोई अयोध्या के धोबी की भूमिका निभाने को आतुर है

कोड ऑफ साइलेंस बन गया है सेल्फ रेगुलेशन

समन्वय भाषाई सम्मान 2012 कँवल भारती को

भारत-चीन व्यापार की चिंताएं और संभावनाएं

रविवार, 4 नवंबर 2012
ऐसे तो ना सुधरेगी कानून व्यवस्था ?

शनिवार, 3 नवंबर 2012
ये जो नया बिहार है… बड़ा खतरनाक है

गुरुवार, 1 नवंबर 2012
एक असफल प्रयास ‘‘शुद्रा द राईजिंग’’

बुधवार, 31 अक्टूबर 2012
शेखर जोशी को मिले श्रीलाल शुक्ल सम्मान की त्रासदी
इफ़्को और उदय शंकर अवस्थी को जानना चाहिए कि वह तो गाली नहीं सम्मान दे रहे हैं और इस तरह अपमानित कर के? इस से तो श्रीलाल शुक्ल की आत्मा भी कलप जाएगी !
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अब हालात बहुत बदल गए हैं। अब तो लोग सम्मान का जुगाड़ करते हैं, सम्मान खरीदते हैं, लॉबीइंग करते हैं। आदि-आदि, करते हैं। वगैरह-वगैरह करते हैं। राजनीतिक, उद्योगपति, फ़िल्म आदि के लोग तो यह सब अब खुल्लमा-खुल्ला करने लगे हैं। हमारे साहित्यकार आदि भी इसी चूहा दौड़ में खुल्लम-खुल्ला दौड़ लगाने लगे हैं। प्रायोजित-नियोजित आदि सब कुछ करने लगे हैं। कुछ लोग तो अब यह सब नहीं हो पाने पर खुद ही पुरस्कार आदि भी शुरु कर लेते हैं और ले भी लेते हैं। खुद ही संस्था गठित कर लेंगे। या पत्रिका निकाल लेंगे। या मित्रवत कह कर यह सब प्रायोजित करवा लेंगे। बाकायदा खर्चा-वर्चा दे कर।
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शेखर जोशी को मिले श्रीलाल शुक्ल सम्मान की त्रासदी
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अब हालात बहुत बदल गए हैं। अब तो लोग सम्मान का जुगाड़ करते हैं, सम्मान खरीदते हैं, लॉबीइंग करते हैं। आदि-आदि, करते हैं। वगैरह-वगैरह करते हैं। राजनीतिक, उद्योगपति, फ़िल्म आदि के लोग तो यह सब अब खुल्लमा-खुल्ला करने लगे हैं। हमारे साहित्यकार आदि भी इसी चूहा दौड़ में खुल्लम-खुल्ला दौड़ लगाने लगे हैं। प्रायोजित-नियोजित आदि सब कुछ करने लगे हैं। कुछ लोग तो अब यह सब नहीं हो पाने पर खुद ही पुरस्कार आदि भी शुरु कर लेते हैं और ले भी लेते हैं। खुद ही संस्था गठित कर लेंगे। या पत्रिका निकाल लेंगे। या मित्रवत कह कर यह सब प्रायोजित करवा लेंगे। बाकायदा खर्चा-वर्चा दे कर।
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शेखर जोशी को मिले श्रीलाल शुक्ल सम्मान की त्रासदी

शनिवार, 27 अक्टूबर 2012
वित्तीय सुनामी को न्यौता

शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2012
एटीएस की विवादित कार्यशैली पर स्थिति स्पष्ट करने का अखिलेश सरकार पर दबाव
"दारापुरी ने एटीएस और खुफिया एजेंसियों पर इस्लामोफोबिया और असुरक्षा का माहौल फैलाने का आरोप लगाते हुए कहा कि जिस तरह अभी पिछले दिनों दिल्ली की एक अदालत से प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की डेढ़ सौवीं वर्षगंाठ पर विस्फोट करने की फिराक में रहने का आरोप लगाकर पकड़ा था, बेगुनाह बरी हुए हैं। जिससे समझा जा सकता है कि राष्ट्रवाद के नाम पर असुरक्षा का भय दिखाने में किस तरह खुफिया एजेंसियां शामिल हैं।"
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एटीएस की विवादित कार्यशैली पर स्थिति स्पष्ट करने का अखिलेश सरकार पर दबाव
गुरुवार, 25 अक्टूबर 2012
अखिलेश का यूपी अब गुजरात बनेगा-फैजाबाद शुरुआत करेगा
- फैजाबाद में दंगा राज्य सरकार के प्रोत्साहन से हुआ ?
- दंगे में खुफिया एजेंसी की भूमिका संदिग्ध ?
- दंगों में आईबी की भूमिका की जांच हो, एसीशर्मा को तत्काल हटाया जाय- रिहाई मंच की मांग
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अखिलेश का यूपी अब गुजरात बनेगा-फैजाबाद शुरुआत करेगा

पार्टनर आपकी पाॅलिटिक्स क्या है ?
तरुण भटनागर लिखते हैं कि ‘‘बस्तर में लूट मची है, शोषण, अन्याय और अत्याचार है।’’ लेकिन यह सब कौन कर रहा है और इसके पीछे कौन है ? इस पर वे एक बार फिर अपनी कहानी और पत्र दोनों ही जगह खामोश रहते हैं। कहीं कोई जरा सा भी इशारा नहीं। या यूं कहें, जानते हुए भी असल सवालों से किनाराकशी है। भटनागर यदि जरा सा भी तटस्थ होते, तो वे इस शोषण, अन्याय और अत्याचार के पीछे छिपे असली चेहरों को आसानी से पहचान लेते। उनकी इस बात से शायद ही कोई इत्तेफाक जतलाए कि जंगल में पहले आंदोलन पहुंचा। सच बात तो यह है कि आंदोलन से बहुत पहले सरकार पहुंच चुकी थी। वह भी अपने शोषणकारी चेहरे के साथ।
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पार्टनर आपकी पाॅलिटिक्स क्या है ?
बुधवार, 24 अक्टूबर 2012
शिवमूर्ति की स्वीकृति का बैंड-बाजा
दलितोत्थान की गाथाएं अब सब की जुबान पर हैं। ए राजा से लगायत मायावती तक। राजधानियों के राजमार्गों से लगायत गांवों की मेड़ों तक।.......
शिवमूर्ति एक ईमानदार कथाकार हैं। इस लिए वह कथ्य में अपने जातिगत विरोध वाले मित्रों की तरह बेईमानी नहीं कर पाते
कोई कितना भी बेहतरीन रचनाकार क्यों न हो, हर कोई उसे पढ़ेगा ही यह भी कतई ज़रुरी नहीं है।
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शिवमूर्ति एक ईमानदार कथाकार हैं। इस लिए वह कथ्य में अपने जातिगत विरोध वाले मित्रों की तरह बेईमानी नहीं कर पाते
कोई कितना भी बेहतरीन रचनाकार क्यों न हो, हर कोई उसे पढ़ेगा ही यह भी कतई ज़रुरी नहीं है।
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शिवमूर्ति की स्वीकृति का बैंड-बाजा

रविवार, 21 अक्टूबर 2012
यही परम्परा रही है अपनी-आदर्श उच्चतम रखो लेकिन जियो निम्नतम
अगर गृह मंत्रालय के अंतर्गत आने वाली सीबीआई संदिग्ध हो सकती है तो पार्टी का लोकपाल भी हो सकता है। एक और बात की लोकपाल भले ही जज होगा पर होगा तो रिटायर्ड ही। संविधान के अनुसार शक्तियाँ पद को मिलती हैं व्यक्ति को नहीं
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यही परम्परा रही है अपनी-आदर्श उच्चतम रखो लेकिन जियो निम्नतम। |
...
यही परम्परा रही है अपनी-आदर्श उच्चतम रखो लेकिन जियो निम्नतम। |
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शनिवार, 20 अक्टूबर 2012
जनता रोटी मांग रही है और वो ‘शराब’ खोज रहे हैं
कहा क्या जा रहा है, संसदीय व्यवस्था बकवास है। तो कौन सी व्यवस्था सही है उसे बताओ ? राजनीति मे बेईमान लोग हैं। तो आपका एतराज उन बेईमानों पर है या राजनीति पर ? उस संदेश को तो देखिये जो बाहर ज़हर की तरह फैलाया जा रहा है। इतना ही नहीं राजनीति करने वाला कम से कम पाँच साल में ही सही लेकिन जनता के सामने जाता तो है उसकी जवाबदेही बनती है। लेकिन नौकरशाही को देखिये उसकी कौन सी जवाबदेही है ? उसका एक ही एजेंडा है – ‘देख तो रहे हैं ऊपर तक देना पड़ता है’
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जनता रोटी मांग रही है और वो ‘शराब’ खोज रहे हैं
अमरीकी “आवाज़” से क्या रिश्ता है आपका, मोहतरम केजरीवाल साहब ?
अब देखना यह है कि पंद्रह मंत्रियों और कई नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप मढ़ने वाली अरविन्द केजरीवाल एंड कंपनी, केजरीवाल के खिलाफ सीबीआई जांच की मांग करती है या नहीं?
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अमरीकी “आवाज़” से क्या रिश्ता है आपका, मोहतरम केजरीवाल साहब ?
शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2012
राहुल बाबा किसान भी हैं पर विदर्भ या बुंदेलखंड के नहीं !

बुधवार, 17 अक्टूबर 2012
कुछ मीत मिले एक मीट हुई
"हम डोमेनवाले यह तो नहीं कह सकते कि हम फेसबुक हो जाएंगे या फिर कोई देशी गूगल खड़ा कर देंगे. लेकिन ये डोमेनवाले उन शोहदों और निठल्लों से ज्यादा आगे जरूर खड़े नजर आते हैं जो दिन रात फेसबुक पर बैठे बैठे लाइक खोजते रहते हैं."
कुछ मीत मिले एक मीट हुई
कुछ मीत मिले एक मीट हुई

मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012
नये घोटालों से चमड़ी बचाने की फिराक

अगर देश को एक रखना है तो . . संसाधनों को बांट दो

करोड़ों भारतीयों की सामाजिक सुरक्षा और जीवन भर की कमाई दांव पर है

लोकतंत्र बचाना है तो विधायिका और कार्यपालिका को अलग करना होगा

सोमवार, 15 अक्टूबर 2012
तथ्यों और सूचनाओं के साथ बलात्कार, मीडिया की फितरत बन चुकी है

मज़दूर मरा तो ख़बर न टीवी पर आयी न अखबार में
स्पेशल एक्सप्लोइटेशन जोन (एस ई ज़ेड )
गुड़गाँव के आटोमोबाइल मज़दूरों की स्थिति की एक झलक
मज़दूर मरा तो ख़बर न टीवी पर आयी न अखबार में
गुड़गाँव के आटोमोबाइल मज़दूरों की स्थिति की एक झलक
मज़दूर मरा तो ख़बर न टीवी पर आयी न अखबार में

रविवार, 14 अक्टूबर 2012
इसी मौत मरने थे अन्ना -बाबा के तथाकथित आन्दोलन
केजरीवाल या तो बहुत भोले हैं या बहुत शातिर जो वे कहते हैं कि ग्राम पंचायतों को ज्यादा अधिकार देने से जनता के हाथों में सत्ता आ जायेगी। हर कोई जानता है कि पंचायतों पर धनी किसानों, गाँव के धनाढ्यों, दबंगों का कब्ज़ा है। पंचायती राज का ढाँचा लागू ही किया गया है ग्रामीण क्षेत्र के शासक वर्गों को सत्ता में भागीदार बनाने के लिए। गाँव में प्रधान वही चुना जाता है जो पैसे और डण्डे के दम पर वोट खरीद सकता है। ज्यादातर छोटे किसानों और मज़दूरों की उसमें कोई भागीदारी नहीं होती। हर पंचायती क्षेत्र में ज्यादातर धनी किसानों-कुलकों-दबंगों के परिवार के सदस्य या उनका कोई लग्गू-भग्गू ही चुनाव जीतता है। जब तक आर्थिक ढाँचे में कोई बदलाव न हो, तब तक कैसी भी चुनाव प्रणाली हो, आर्थिक रूप से ताक़तवर लोग ही चुनकर ऊपर जायेंगे।
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इसी मौत मरने थे अन्ना -बाबा के तथाकथित आन्दोलन
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इसी मौत मरने थे अन्ना -बाबा के तथाकथित आन्दोलन

खाता न बही, फोर्ड फाउंडेशन के दूत जो कहें, सो सही

अपनी ही तलाश में भटक रहे बंजारा किस्म के इंसान की दास्तान हैं निदा

शनिवार, 13 अक्टूबर 2012
राजनीति में भागीदारी से ही पुंस दासता से मुक्ति मिलेगी स्त्रियों को

व्याधि की कविता ! नहीं, नजर की व्याधि

भाजपाई मुख्यमंत्री के सहयोग से एक किसान आन्दोलन की हत्या !

राइफल की छांव में, मुस्कान ओठों पर लिए, श्वेत खादी में अहिंसा के पुजारी आ गये

शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2012
मराठी नाटकों को आर्थिक झंझट से मुक्त कर देगी महाराष्ट्र कलानिधि
मुंबई में महाराष्ट्र कलानिधि नाम की संस्था का विधिवत उदघाटन कर दिया गया. शुरू तो यह पहली ही हो गयी थी लेकिन अब यह पूरे ताम झाम के साथ मराठी कलाजगत में प्रविष्ट हो गयी है. यह संस्था मराठी नाटक, सिनेमा और सीरियलों की गुणवता को बेहतर बनाने के लिए काम करेगी. महाराष्ट्र कलानिधि की योजना है कि मराठी मनोरंजन की संपदा को हर तरह से समर्थन दिया जाए.
मराठी नाटकों को आर्थिक झंझट से मुक्त कर देगी महाराष्ट्र कलानिधि
मराठी नाटकों को आर्थिक झंझट से मुक्त कर देगी महाराष्ट्र कलानिधि

…तो लोहिया होते महात्मा गांधी की विरासत के वारिस

गुरुवार, 11 अक्टूबर 2012
किसान के दर्द पर गडकरी की मौज

बुधवार, 10 अक्टूबर 2012
जनतंत्र पर हावी जुगाड़तंत्र

अंग्रेजी क्यों चाहिए प्रशासन को ?

‘हिन्दू‘ कोई राष्ट्रीयता नहीं वह केवल हिन्दुओं की धार्मिक पहचान है

हिन्दी साहित्य में अस्मिता विमर्श के सबसे बड़े आलोचक हैं रामविलास शर्मा

मंगलवार, 9 अक्टूबर 2012
रॉबर्ट वाड्रा को कॉमनवेल्थ खेलों के ठेकों की हो जांच, बोले आज़म भाई

तो मुलायम का परिवार भैंस चराता ?
दलितों की रहनुमाई का दावा करने वाली मायावती की रैली में मंच पर दलितों का प्रतिनिधित्व देखने को नहीं मिला। नसीमुद्दीन सिद्दकी, स्वामी प्रसाद मौर्या, के साथ ब्राह्मण कुलभूषण सतीश चंद्र मिश्र, सुरेंद्र प्रसाद मिश्र और रामवीर उपाध्याय मंच को सुशोभित कर रहे थे।
तो मुलायम का परिवार भैंस चराता ?
तो मुलायम का परिवार भैंस चराता ?

कैंसर से जूझते हुए शावेज़!!! …शावेज़… शावेज़ यहां से वहां तक…शावेज़
एक मशाल लगातार जल रही है, वेनेज़ुएला में, जो लातिनी अमरीका को ही नहीं पूरी दुनिया को प्रेरित कर रही है. विश्व पूंजीवाद को झन्नाटेदार तमाचा मार सकता है एक छोटा-सा देश,
कैंसर से जूझते हुए शावेज़!!! …शावेज़… शावेज़ यहां से वहां तक…शावेज़
कैंसर से जूझते हुए शावेज़!!! …शावेज़… शावेज़ यहां से वहां तक…शावेज़

“जमीन की लड़ाई में सारी दुनिया आई है”
अब चाहे, लंगोटी पहन कर मोदी दंगल में मनमोहन के मुकाबले उतरें या बंगाल की शेरनी राजग में दोबारा दाखिल हो जाएँ, कोई फर्क नहीं पड़ने वाला!
“जमीन की लड़ाई में सारी दुनिया आई है”
“जमीन की लड़ाई में सारी दुनिया आई है”

परंपरा की ओर उन्मुख होते हुए भी रूढ़िवादी नहीं थे डॉ. रामविलास शर्मा

परंपरा की ओर उन्मुख होते हुए भी रूढ़िवादी नहीं थे डॉ. रामविलास शर्मा

सोमवार, 8 अक्टूबर 2012
हिन्दी का 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला है नौवां विश्व हिन्दी सम्मेलन ?

कलम का सिपाही जो आजीवन आम आदमी के दर्द को लिखता रहा

लोकल क्षत्रपों की अराजक राजनीति के चक्रव्यूह में फंस गयीं ममता

कचेहरी सीरियल बम विस्फोट कांड : जारी है खुफिया एजेंसियों की खुराफात !

रविवार, 7 अक्टूबर 2012
जब इस कब्रिस्तान में जाग उठेंगे खेत! आमीन
जीवन जीने के संसाधनों के असमान वितरण के कारण देश में 35 अरबपतियों के चलते अस्सी करोड़ गरीब अपने हक से वंचित हो गए हैं। देश में 24 करोड़ लोग भूमिहीन हैं। सरकार की प्राथमिकता लोगों को भूमि स्वामी बनाने की नहीं बल्कि भूमिहीन करने की है। यही कारण है कि केंद्र सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण कानून के जरिए किसानों की जमीनों के अधिग्रहण की प्रक्रिया आसान की जा रही है। भूमि सुधार के बिना अधिग्रहण कानून में संशोधन का मकसद जल, जंगल जमीन और आजीविका के हक हकूक की लड़ाई को खत्म करना!
जिंदा कौमें वक्त बदलने का इंतजार नहीं करतीं, वक्त बदल देती हैं! हमे अपने हक की लड़ाई खुद ही लड़नी होगी और इसके लिए एकजुट होकर अपनी ताकत का एहसास कराना होगा।
जब इस कब्रिस्तान में जाग उठेंगे खेत! आमीन
जिंदा कौमें वक्त बदलने का इंतजार नहीं करतीं, वक्त बदल देती हैं! हमे अपने हक की लड़ाई खुद ही लड़नी होगी और इसके लिए एकजुट होकर अपनी ताकत का एहसास कराना होगा।
जब इस कब्रिस्तान में जाग उठेंगे खेत! आमीन

१० जनपथ द्वारा संचालित हो रही टीम केजरीवाल ?

समाजवाद गैर जरूरी है, अमर सिंह जरूरी है : सपा का नया दर्शन

शर्मनाक है कांग्रेसियों का रॉबर्ट वाड्रा के बचाव में इस तरह उतर पड़ना
समझ नहीं आता प्रशांत भूषण जैसे वकील के हाथ में ऐसे महत्वपूर्ण साक्ष्य हों फिर भी उन्होंने न्यायालय में जनहित याचिका दायर करने के बारे में क्यों नहीं सोचा ?
शर्मनाक है कांग्रेसियों का रॉबर्ट वाड्रा के बचाव में इस तरह उतर पड़ना
शर्मनाक है कांग्रेसियों का रॉबर्ट वाड्रा के बचाव में इस तरह उतर पड़ना

शनिवार, 6 अक्टूबर 2012
पश्चिम बंगाल के बहाने : मुरदे जिंदों को जकड़े हुए हैं …………….
अभी सिर्फ 16 महीने बीते हैं जब वाममोर्चा सरकार के लंबे 34 साल के शासन का, बल्कि एक क्रांतिकारी नाटक का पटाक्षेप हुआ था। यह कोई मामूली घटना नहीं थी। यदि वाममोर्चा का यह लंबा शासन अपने आप में एक इतिहास था तो इस शासन का पतन भी कम ऐतिहासिक नहीं कहलायेगा। वाममोर्चा सरकार के अवसान को सिर्फ ममता बनर्जी और उनकी टोली की करामात समझना या इसे वाममोर्चा के नेताओं और कार्यकर्ताओं के कुछ भटकावों और कदाचारों का परिणाम मानना इसकी गंभीरता को कम करना और इसके ऐतिहासिक सार को अनदेखा करने जैसा होगा।
पश्चिम बंगाल के बहाने : मुरदे जिंदों को जकड़े हुए हैं …………….
पश्चिम बंगाल के बहाने : मुरदे जिंदों को जकड़े हुए हैं …………….

बदले बदले से सुशासन बाबू नज़र आते हैं !

Is ‘Hindu’ our identity and Nationalism?

मुलायम बचा रहे हैं एसटीऍफ़ और आईबी अधिकारियों को !
निमेष आयोग की रिपोर्ट को न जारी कर मुलायम एसटीएफ और आईबी के अधिकारियों को बचाने की फिराक में – रिहाई मंच
संविधान के खिलाफ सांप्रदायिक टिप्पणी करने वाले खुफिया अधिकारियों को तत्काल निलंबित करे सरकार
बेगुनाहों की रिहाई के वादे पर स्थिति स्पष्ट करें अखिलेश – रिहाई मंच
मुलायम बचा रहे हैं एसटीऍफ़ और आईबी अधिकारियों को !
संविधान के खिलाफ सांप्रदायिक टिप्पणी करने वाले खुफिया अधिकारियों को तत्काल निलंबित करे सरकार
बेगुनाहों की रिहाई के वादे पर स्थिति स्पष्ट करें अखिलेश – रिहाई मंच
मुलायम बचा रहे हैं एसटीऍफ़ और आईबी अधिकारियों को !

चर्चा में फिर वामपंथी दल, थैंक्स दलित बहुजन किस्म के बुद्धिजीवी

शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2012
खबर नहीं प्रौपेगैण्डा है केजरीवाल का खुलासा

किस्सा सब्ज़ बाग़ और अरविंद केजरीवाल की नई पार्टी

विदेश राज्यमंत्री के हाथों हुआ ‘अनुवाद मूल्यांकन’ पुस्तक का लोकार्पण

सोचो, अगर मारे जाने वाले और आत्महत्या करने वाले लोग अहिंसा का रास्ता छोड़ दें! तो ?

गुरुवार, 4 अक्टूबर 2012
सेमीफाइनल नहीं फ़ाइनल मैच है गुजरात विधानसभा चुनाव

पाठक बनाने के नए तरीके खोजने होंगे हिन्दी प्रकाशकों को – राजेन्द्र यादव

स्त्री के वस्तुकरण में विज्ञापन की भूमिका

राजनीति की पिच पर जमे खिलाड़ियों को कोई माई का लाल उखाड़ने वाला नहीं!

बुधवार, 3 अक्टूबर 2012
केंद्र का फरमान : मैला ढोने की प्रथा जल्दी खत्म करे उत्तर प्रदेश

सपा सरकार में जारी है हाई सेक्योरिटी के नाम पर जेलों में यातनाओं का दौर

दैवीय प्रतिफल नहीं है अमीरी — गरीबी ?

युवा आक्रोश का मतलब सिर्फ राजनीतिक बाजार से हक पाना या उसे राजनीति का मोहरा बन गंवाना है

दिन-व-दिन बढ़ता ही जा रहा है स्त्रियों का सीरियल-उन्माद

दिन-व-दिन बढ़ता ही जा रहा है स्त्रियों का सीरियल-उन्माद

राजनेता कोई दांव हारने के लिए नहीं खेलते, खेल जारी रहता है संसद में और संसद से बाहर भी

दिल्ली पुलिस (स्पेशल सेल) का खोखला ‘सच’
दिल्ली पुलिस (स्पेशल सेल) का खोखला ‘सच’
दिल्ली पुलिस की प्रतिष्ठित स्पेशल सेल, इन दिनों एक बार फिर काफी चर्चा में है. पर आतंकवाद माओवाद, उग्रवाद और न जाने क्या-क्या से ‘लड़ने’ के लिए चर्चित दिल्ली पुलिस का ये विशेष बल, जिसकी स्थापना सन 1946 में, “दी दिल्ली स्पेशल पुलिस एसटैबलिस्मेंट एक्ट-1946″ तहत हुयी थी. लेकिन इस चर्चा से स्पेशल सेल कुछ ज़्यादा खुश नहीं है, बल्कि परेशान नज़र आ रही है. और आये दिन अखबारों में तरह-तरह के बयान दे रही है. इसका मुख्य कारण है, पिछले दिनों दिल्ली के विभिन्न विश्वविद्यालयों में पढ़ाने वाले शिक्षको के एक मानवाधिकार संगठन, जामिया टीचर्स सोलिडरिटी असोसिऐशन (JTSA) द्वारा इस विशेष बल की करतूतों पर लायी गयी रिपोर्ट, जिसका नाम है, आरोपित, अभिशप्त और बरी: स्पेशल सेल का खोखला ‘सच’. आगे पढ़ें

राजनीति करनी है तो करो, मगर ये दोगलापन मत करो, अब अन्ना का नाम बदनाम न करो

मंगलवार, 2 अक्टूबर 2012
दिल्ली पुलिस (स्पेशल सेल) का खोखला ‘सच’

राजनीति करनी है तो करो, मगर ये दोगलापन मत करो, अब अन्ना का नाम बदनाम न करो

गोविंदाचार्य के मंच से ममता की तारीफ ?

शनिवार, 25 फ़रवरी 2012
बाढ़ त्रासदी की अनकही सुनिए
अमलेन्दु उपाध्याय
बिहार की बाढ़ त्रासदी पर पत्रकारों और समाजसेवियों की नई दृष्टि देती रिपोर्टिंग 'अनकही कहानी' हर संवेदनशील व्यक्ति को पढ़नी चाहिए। यह हमें मौतों पर होती घटिया राजनीति और भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी कार्यपालिका के नंगे यथार्थ से रूबरू कराती है
11 सितंबर को अमरीका में हवाई हमले में लगभग 5 हजार लोग मारे गए थे। आज भी उनकी याद में मोमबत्तिायां जलाई जाती हैं। भारतीय मीडिया भी इन तस्वीरों को प्रसारित करता है। क्या 18 अगस्त की याद में भी, जिसमें 50 हजार लोग मारे गए, मोमबत्तिायां जलाई जाएंगी?
यह सुलगता हुआ सवाल किया गया है 'बाढ़-2008' पर फ्री थिंकर्स की ओर से जारी 'अनकही कहानी' के मुखपृष्ठ पर ही। जाहिर है जवाब भी सवाल के माफिक सुलगता हुआ ही होगा - 'नहीं। कारण? हम-आप सब जानते हैं।'
बिहार की कोसी बाढ़ त्रासदी पर पत्रकारों और समाजसेवियों की नई दृष्टि देती रिपोर्टिंग हमें मौतों पर होती घटिया राजनीति और भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी कार्यपालिका के नंगे यथार्थ से रूबरू कराती है। 'बाढ़ की जाति' में प्रमोद रंजन बताते हैं कि किस प्रकार जदयू नेता शिवानंद तिवारी ने निहायत ही फूहड़ और घटिया बयान देकर 'भाई का दर्द भाई ही समझता है' साबित कर दिया है कि इस विकराल आपदा के समय बिहार में घृणित राजनीति ही नहीं चल रही है, बल्कि इसके पीछे एक कुत्सित जातिवाद भी चल रहा है, जो यह हुंकार भर रहा है कि 'यादवो, दलितो, अति पिछड़ो! तुम्हारे समर्थन का भी हमारे लिए कोई मोल नहीं है।'
प्रमोद रंजन की रिपोर्ट बताती है कि जाति बिहार की नस-नस में कूट-कूट कर भरी है। मेधा पाटकर के साथ आए 'घर बचाओ' आंदोलन के कार्यकर्ताओं के द्वारा लाई गई सहायता सामग्री को कैसे कैपिटल एक्सप्रेस के गार्ड उदयशंकर ने गालियां बकते हुए फिंकवा दिया, चूंकि ये कार्यकर्ता दलित थे।
रपट के अंत में प्रमोद कहते हैं कि सुशील मोदी बता रहे हैं कि केमिकल 'गुजरात' से आ रहा है (और शायद आइडिया भी)। राज्य सरकार की ओर से पहली बार व्यवस्थित ढंग से आदमियों के शवों को भी ठिकाने लगाया जाएगा। न बदबू आएगी, न आक्रोश फैलेगा.....मरे तो शूद्र हैं। भाजपा जिस मनुवाद में विश्वास करती है, उसके अनुसार शूद्र और पशु एक समान होते हैं।
अष्टावक्र कहते हैं कि ठीक उसी तरह जैसे प्रेमचंद के 'कफन' में घीसू और माधव कफन के लिए चंदा कर रहे हैं, उसी तर्ज पर नीतीश चंदा कर रहे हैं। वे कहते हैं कि सब कुछ समय से होगा। हिटलर जिंदाबाद का नारा है। भावी इतिहास हमारा है। नीतीश हिटलर के बिहारी अवतार हैं। दोनों समाजवादी। दोनों विकास-पुरुष। हिटलर ने कहा था- गर्व से कहो हम जर्मन हैं। नीतीश ने कहा है- गर्व से कहो हम बिहारी हैं। विकास की जो मिसाल हिटलर ने रखी थी, वही मिसाल नीतीश ने रखी है।
एक संवाददाता की डायरी में कितना मार्मिक चित्रण है कि दिल दहल जाए- 'बाढ़ पीढ़ितों द्वारा कहा गया हर वाक्य खबर है...अस्पतालों में गर्भवती महिलाओं की भीड़ थी। किसी के गर्भ से हाथ निकाले बच्चा चार दिनों से पड़ा था, तो कोई खून से लथपथ अस्पताल के फर्श पर पड़ी थी।....नवजात बच्चे दम तोड़ रहे थे।' आरएसएस के ऊपर टिप्पणी करते हुए यह संवाददाता कहता है- 'भाजपा के एक नेता कहते हैं कि यहां ईसाई मिशनरियों की दाल नहीं गलने दी जाएगी। बाबा रामदेव से बात हो गई है कि जितने बच्चे अनाथ हो गए हैं उन्हें गोद ले लिया जाएगा। आखिर आरएसएस जिंदा ही है इन्हीं हथकंडों के कारण। मेरा ध्यान तो रामदेव पर अटका है। बाबा रामदेव माने रामदेव यादव। वैसे ही जैसे लालू प्रसाद माने लालू यादव?' टिप्पणी बहुत गंभीर है।
कोसी के पीड़ितों की अनकही कहानी वहां से शुरू होती है, जहां से शब्द अभिव्यक्ति की सामर्थ्य खोने लगते हैं। अपने परिवार के छह सदस्यों को खोने वाले हशमत की व्यथा के लिए न 'व्यथा' शब्द पर्याप्त है न ही नाव पलटने के बाद गर्भवती पत्नी और बच्चों के लिए बिलखते हशमत को पीटकर कोसी की अथाह धारा में फेंक देने वाले सैनिकों की क्रूरता के लिए 'क्रूरता'। डायरी के अंत में संवाददाता कहता है- 'थोड़ी देर लेटता हूं। सोकर क्या करूंगा...सुबह की पहली ट्रेन से उस पटना नगरी में लौटना है, जहां सत्तााधीश बाढ़-पीढ़ितों के लिए राहत शिविर चलने नहीं देना चाहते।'
आखिरी रपट में सत्यकाम की उलाहना नीतीश के लिए काफी गंभीर है, लेकिन क्या नीतीश भी सीख लेने का समय निकालेंगे? - 'बांध 18 तारीख को टूटता है, नीतीश की खुमारी 24 को टूटती है। चिल्लाते हैं- जा रे यह तो प्रलय है।.....नीतीश कुमार!....हजारों लोग बाढ़ से निकलकर सुरक्षित स्थानों पर जा रहे हैं। आप भी उस जानलेवा बाढ़ से निकलिए, जिसमें गरदन तक डूब चुके हैं। आपके इर्द-गिर्द सांप, बिच्छुओं का और लाशों का ढेर लग गया है।'
'अनकही कहानी' को पढ़ते हुए आप सिर्फ बाढ़ की विभीषिका पर टिप्पणियां ही नहीं पढ़ते हैं, बल्कि उस संत्रास और दर्द से गुजरते हैं, जिसकी कल्पना मात्र से आप अपनी सुध-बुध खो बैठें। महाकवि धूमिल ने कहा था- 'शब्द मित्रों पर कारगर होते हैं।' इसलिए अगर आप में एक इनसान का दिल धड़कता है और आपका जमीर जिंदा है और शिराओं में खून अभी बाकी है तो इस अनकही कहानी को सुनते हुए आप के अंदर उबाल आ सकता है- सत्ताा के प्रति, धर्म के प्रति, सरकारी मशीनरी के प्रति और सबसे ज्यादा अपने बहैसियत एक इनसान होने पर हिंदुस्तान में जन्म लेने के प्रति। हर संवेदनशील व्यक्ति को अनकही कहानी अवश्य पढ़नी चाहिए। बाबा नागार्जुन के शब्दों में- अन्न पचीसी मुख्तसर, लोग करोड़-करोड़/ सचमुच ही लग जाएगी आंख कान में होड़।
बिहार की बाढ़ त्रासदी पर पत्रकारों और समाजसेवियों की नई दृष्टि देती रिपोर्टिंग 'अनकही कहानी' हर संवेदनशील व्यक्ति को पढ़नी चाहिए। यह हमें मौतों पर होती घटिया राजनीति और भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी कार्यपालिका के नंगे यथार्थ से रूबरू कराती है
11 सितंबर को अमरीका में हवाई हमले में लगभग 5 हजार लोग मारे गए थे। आज भी उनकी याद में मोमबत्तिायां जलाई जाती हैं। भारतीय मीडिया भी इन तस्वीरों को प्रसारित करता है। क्या 18 अगस्त की याद में भी, जिसमें 50 हजार लोग मारे गए, मोमबत्तिायां जलाई जाएंगी?
यह सुलगता हुआ सवाल किया गया है 'बाढ़-2008' पर फ्री थिंकर्स की ओर से जारी 'अनकही कहानी' के मुखपृष्ठ पर ही। जाहिर है जवाब भी सवाल के माफिक सुलगता हुआ ही होगा - 'नहीं। कारण? हम-आप सब जानते हैं।'
बिहार की कोसी बाढ़ त्रासदी पर पत्रकारों और समाजसेवियों की नई दृष्टि देती रिपोर्टिंग हमें मौतों पर होती घटिया राजनीति और भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी कार्यपालिका के नंगे यथार्थ से रूबरू कराती है। 'बाढ़ की जाति' में प्रमोद रंजन बताते हैं कि किस प्रकार जदयू नेता शिवानंद तिवारी ने निहायत ही फूहड़ और घटिया बयान देकर 'भाई का दर्द भाई ही समझता है' साबित कर दिया है कि इस विकराल आपदा के समय बिहार में घृणित राजनीति ही नहीं चल रही है, बल्कि इसके पीछे एक कुत्सित जातिवाद भी चल रहा है, जो यह हुंकार भर रहा है कि 'यादवो, दलितो, अति पिछड़ो! तुम्हारे समर्थन का भी हमारे लिए कोई मोल नहीं है।'
प्रमोद रंजन की रिपोर्ट बताती है कि जाति बिहार की नस-नस में कूट-कूट कर भरी है। मेधा पाटकर के साथ आए 'घर बचाओ' आंदोलन के कार्यकर्ताओं के द्वारा लाई गई सहायता सामग्री को कैसे कैपिटल एक्सप्रेस के गार्ड उदयशंकर ने गालियां बकते हुए फिंकवा दिया, चूंकि ये कार्यकर्ता दलित थे।
रपट के अंत में प्रमोद कहते हैं कि सुशील मोदी बता रहे हैं कि केमिकल 'गुजरात' से आ रहा है (और शायद आइडिया भी)। राज्य सरकार की ओर से पहली बार व्यवस्थित ढंग से आदमियों के शवों को भी ठिकाने लगाया जाएगा। न बदबू आएगी, न आक्रोश फैलेगा.....मरे तो शूद्र हैं। भाजपा जिस मनुवाद में विश्वास करती है, उसके अनुसार शूद्र और पशु एक समान होते हैं।
अष्टावक्र कहते हैं कि ठीक उसी तरह जैसे प्रेमचंद के 'कफन' में घीसू और माधव कफन के लिए चंदा कर रहे हैं, उसी तर्ज पर नीतीश चंदा कर रहे हैं। वे कहते हैं कि सब कुछ समय से होगा। हिटलर जिंदाबाद का नारा है। भावी इतिहास हमारा है। नीतीश हिटलर के बिहारी अवतार हैं। दोनों समाजवादी। दोनों विकास-पुरुष। हिटलर ने कहा था- गर्व से कहो हम जर्मन हैं। नीतीश ने कहा है- गर्व से कहो हम बिहारी हैं। विकास की जो मिसाल हिटलर ने रखी थी, वही मिसाल नीतीश ने रखी है।
एक संवाददाता की डायरी में कितना मार्मिक चित्रण है कि दिल दहल जाए- 'बाढ़ पीढ़ितों द्वारा कहा गया हर वाक्य खबर है...अस्पतालों में गर्भवती महिलाओं की भीड़ थी। किसी के गर्भ से हाथ निकाले बच्चा चार दिनों से पड़ा था, तो कोई खून से लथपथ अस्पताल के फर्श पर पड़ी थी।....नवजात बच्चे दम तोड़ रहे थे।' आरएसएस के ऊपर टिप्पणी करते हुए यह संवाददाता कहता है- 'भाजपा के एक नेता कहते हैं कि यहां ईसाई मिशनरियों की दाल नहीं गलने दी जाएगी। बाबा रामदेव से बात हो गई है कि जितने बच्चे अनाथ हो गए हैं उन्हें गोद ले लिया जाएगा। आखिर आरएसएस जिंदा ही है इन्हीं हथकंडों के कारण। मेरा ध्यान तो रामदेव पर अटका है। बाबा रामदेव माने रामदेव यादव। वैसे ही जैसे लालू प्रसाद माने लालू यादव?' टिप्पणी बहुत गंभीर है।
कोसी के पीड़ितों की अनकही कहानी वहां से शुरू होती है, जहां से शब्द अभिव्यक्ति की सामर्थ्य खोने लगते हैं। अपने परिवार के छह सदस्यों को खोने वाले हशमत की व्यथा के लिए न 'व्यथा' शब्द पर्याप्त है न ही नाव पलटने के बाद गर्भवती पत्नी और बच्चों के लिए बिलखते हशमत को पीटकर कोसी की अथाह धारा में फेंक देने वाले सैनिकों की क्रूरता के लिए 'क्रूरता'। डायरी के अंत में संवाददाता कहता है- 'थोड़ी देर लेटता हूं। सोकर क्या करूंगा...सुबह की पहली ट्रेन से उस पटना नगरी में लौटना है, जहां सत्तााधीश बाढ़-पीढ़ितों के लिए राहत शिविर चलने नहीं देना चाहते।'
आखिरी रपट में सत्यकाम की उलाहना नीतीश के लिए काफी गंभीर है, लेकिन क्या नीतीश भी सीख लेने का समय निकालेंगे? - 'बांध 18 तारीख को टूटता है, नीतीश की खुमारी 24 को टूटती है। चिल्लाते हैं- जा रे यह तो प्रलय है।.....नीतीश कुमार!....हजारों लोग बाढ़ से निकलकर सुरक्षित स्थानों पर जा रहे हैं। आप भी उस जानलेवा बाढ़ से निकलिए, जिसमें गरदन तक डूब चुके हैं। आपके इर्द-गिर्द सांप, बिच्छुओं का और लाशों का ढेर लग गया है।'
'अनकही कहानी' को पढ़ते हुए आप सिर्फ बाढ़ की विभीषिका पर टिप्पणियां ही नहीं पढ़ते हैं, बल्कि उस संत्रास और दर्द से गुजरते हैं, जिसकी कल्पना मात्र से आप अपनी सुध-बुध खो बैठें। महाकवि धूमिल ने कहा था- 'शब्द मित्रों पर कारगर होते हैं।' इसलिए अगर आप में एक इनसान का दिल धड़कता है और आपका जमीर जिंदा है और शिराओं में खून अभी बाकी है तो इस अनकही कहानी को सुनते हुए आप के अंदर उबाल आ सकता है- सत्ताा के प्रति, धर्म के प्रति, सरकारी मशीनरी के प्रति और सबसे ज्यादा अपने बहैसियत एक इनसान होने पर हिंदुस्तान में जन्म लेने के प्रति। हर संवेदनशील व्यक्ति को अनकही कहानी अवश्य पढ़नी चाहिए। बाबा नागार्जुन के शब्दों में- अन्न पचीसी मुख्तसर, लोग करोड़-करोड़/ सचमुच ही लग जाएगी आंख कान में होड़।
Dec 20, '08

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